हिंसक होते बच्चे : अनुराग

why child are aggressive in hindi

फर्रुखाबाद के एक गांव में प्राइमरी स्कूल की तीसरी और पहली क्लास के बच्चों में किसी बात को लेकर मारपीट हो गई। तीसरी के छात्र ने पहली के छात्र को प्लास्टिक की बोरी में बंदकर लात-घूंसों से जमकर पीटा। इससे उसको अस्पताल ले जाना पड़ा। वहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। दिल्ली के जामिया नगर में रहने वाली 15 वर्षीय किशोरी घर से 38 लाख रुपये चोरी कर देहरादून घूमने-फिरने के लिए तीन सहेलियों के साथ रफूचक्कर हो गई। दिल्ली के ही एक स्कूल छात्रों के बीच झगड़ा होने पर छठी कक्षा के एक छात्र के साथ उसके छह सहपाठियों ने कुकर्म किया।

पहले इस तरह की घटनाएं कभी-कभी सुनाई देती थीं, लेकिन अब आए दिन समाचार-पत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं। बच्चों में बढ़ रही हिंसक प्रवृत्ति चिंता का विषय है। आने वाला समय इन्हीं बच्चों का होगा, तो हम भला कैसे समाज का निर्माण कर रहे है। बच्चों में बढ़ रही इस हिंसक प्रवृत्ति को क्या केवल कठोर सजा देकर रोका जा सकेगा? बिल्कुल नहीं।


बच्चा सबसे अधिक अपने चारों ओर चल रही गतिविधियों और जो बार-बार देख व सुन रहा है, उनसे सीखता है। बच्चे के सबसे नजदीक है, परिवार। जिन परिवारों में पति-पत्नी में आए दिन बात-बात पर तू-तू मैं-मैं होती है या उनमें से किसी में भी चारित्रिक दुर्बलताएं हैं, उनके बच्चों में दुष्प्रवृत्तियां पनपने की आशंकाएं बहुत अधिक रहती हैं। बच्चे के पहले आदर्श उसके मां-बाप होते हैं और वह सबसे अधिक उन्हीं के निकट रहता है। फिर उनका प्रभाव बच्चे पर न पड़े, यह कैसे हो सकता है।

टेलीविजन घर के सदस्य की तरह हो गया है, जिससे बच्चों का सीधा संपर्क रहता है। टेलीविजन पर जो कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं, उनमें से अधिकांश में पारिवारिकता, सामाजिकता, राजनीतिक विमर्श, मानवीय सरोकार जैसे गुणों का अभाव है। इनकी जगह पारिवारिक षड्यंत्र, अनैतिक संबंध, विवाहेतर संबंध, हिंसा का बोलबाला है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि बच्चों के नाम पर प्रसारित होने वाले अधि‍कांश कार्यक्रम भी स्तरीय नहीं हैं। इन कार्यक्रमों में बाल प्रवृत्तियों को विकृत रूप में पेश किया जा रहा है। दिन-रात टेलीविजन देख रहे बच्चों के मनमस्तिष्क पर नि‍श्‍चि‍तरूप से इनका कोई प्रभाव पड़ेगा।

फिल्मों खासतौर पर हिंदी फिल्मों के दर्शकों की संख्‍या करोड़ों में है, जिनमें बच्चों की भी अच्छी-खासी संख्‍या है। आजकल की फिल्मों में सेक्स और हिंसा का मसाला बहुत अधिक पड़ता है। द्विअर्थी संवाद तो फिल्म के लिए जरूरी जैसे हो गए हैं। कलात्मकता का स्थान हिंसा और नग्नता ने ले लिया है। दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कुछ तथाकथित कला समीक्षक इस हिंसा और नग्नता का सिनेमा के विकास और प्रगति‍शीलता के रूप में पेश कर रहे हैं। कुछ साल पहले तक शहरों में मुख्‍यधारा की फिल्मों के अलावा सी-ग्रेड फिल्में लगती थीं, जिन्हें लोग चोरी-छिपे देखने जाते थे। उन फिल्मों में बीच-बीच में मिनट-दो मिनट के सेक्स के दृश्य होते थे और इनमें मुख्‍यधारा के कलाकार काम नहीं करते थे। अब उन सी-ग्रेड फि‍ल्‍मों से ज्‍यादा फूहड़ता, अश्‍लीलता और हिंसा तो धारावाहि‍कों में दि‍खाई जा रही है, फि‍ल्‍मों की क्‍या बात करें। आज की फिल्मों के सफल नायक का डॉक्टर, इंजीनियर, लेखक, पत्रकार या वैज्ञानिक न बन पाने का अफसोस नहीं होता, उसकी इच्छा पोर्न फिल्मों में काम करने की होती है। पोर्न फिल्मों के कलाकारों पर चर्चा होती है।

पहले फिल्मों एक खलनायक और दूसरा नायक होता था, लेकिन अब नायक ही खलनायक है। वह वर्षों पहले फख्र से घोषणा कर चुका है- नायक नहीं खलनायक हूं मैं। वह हिंसक है, छिछोरा है, लंपट है, फूहड़ है, द्विअर्थी संवाद बोलता है, लेकिन फिर भी नायक है। वह हर हाल में अपनी मंजिल (नायिका) पाना चाहता है। वह इसके लिए नायिका को परेशान करता है तथा हर गलत-सही तरीके अपनाता है। और फिर ना-ना करके प्यार तुम्‍हीं से कर बैठे की तर्ज पर नायिका मान जाती है। अब तो आधुनिकता के नाम फिल्मों में नायिका की भूमिका भी सड़क-छाप मवाली जैसे गढ़ी जा रही है।

टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले विभिन्न उत्पादों के विज्ञापनों की हाल भी जुदा नहीं है। जूते-जुराब से लेकर कंघी तक और पेन से लेकर कार देकर हर विज्ञापन का मकसद है- लड़की या लड़के को रिझाना। क्या दुनिया में यही एक गम बचा है।

राजनीति‍ का हाल भी कोई अच्‍छा नहीं है। हर बार लोकसभा और वि‍धानसभाओं में बड़ी संख्‍या में दागी जनप्रति‍नि‍धि‍ चुनकर आते हैं। इनमें आथिर्क अपराध से लेकर खूनी तथा बलात्‍कार तक के आरोपी होती हैं। लोकसभा और वि‍धानसभाओं में हंगामे आए दि‍न देखने को मि‍लते हैं। नेताओं के बेहूदे बयान और एक-दूसरे के प्रति‍ हलके शब्‍दों को प्रयोग भी उनकी छवि‍ को दागदार ही बनाते हैं।

बच्चों में बड़ रही हिंसक प्रवृत्ति के लिए उन्हें दोष देने के बजाय हमें अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जैसे नायक हम उनके लिए गढेंगे, वैसा ही वह खुद को ढाल लेंगे।

साभार: लेखक मंच

 


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