बांस का इस्तेमाल घर-घर में होता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि अब से पहले की मानव सभ्यता बांस पर टिकी थी। आज भी बांस नए रंगरूप में घर-घर में अपनी पैठ नाए हुए है। बांस की खेती कम समय में अच्छी पैदावार देती है।

बांस पेड़ नहीं बल्कि घास की लंबी प्रजाति है। बांस 50 सेंटीमीटर से ले कर 40 मीटर तक लंबा होता है। वैसे, तो दुनिया में इस की तकरीबन 13 सौ प्रजातियां हैं, लेकिन महज सौ प्रजातियों का ही इस्तेमाल कारोबारी स्तर पर होता है। उत्तरपूर्वी भारत में साल 2007 में बांस पर फूल खिले थे, अब साल 2055 में फूल आने की संभावना है।

जहां मजबूती के साथ-साथ लचीलापन व हल्का वजन चाहिए, वहां बांस ही सब से सटीक है, टोकरी, चटाई, लाठी, औजारों के हत्थे, बांसुरी वगैरह बनाने में बांस का इस्तेमाल होता है। झोंपड़ियों की दीवार और छत बनाने में भी इस का इस्तेमाल किया जाता है। बांस से कागज बनाने के लिए अच्छी लुग्दी मिलती है। अचार बनाने के लिए इस की कोपलों का इस्तेमाल किया जाता है। बांस की पत्तियां बहुत अच्छा पशुचारा होती हैं।

बांस घास कुल का पौधा है। इस में भी दूसरी घासों की तरह एक जड़ से कई तने निकलते हैं। तने का कुछ हिस्सा जमीन के अंदर रहता है, जिसे राइजोम कहते हैं। हर साल बरसात में राइजोम से नए नए कल्ले निकलते हैं। जैसे-जैसे बांस की उम्र बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे राइजोम बाहर की ओर बढ़ता जाता है और नए-नए कल्ले आते जाते हैं। बांस की अनेक प्रजातियां खाने के रूप में भी इस्तेमाल की जा रही हैं।

देखभालः
बांस की पौध, रोपाई करने के बाद 6-7 साल में एक बेड़ी का रूप ले लेती है। इस के बाद इस बेड़ी से 3 साल से ज्यादा उम्र के बांस को हर साल निकाल लेना चाहिए, कुछ कल्ले बेड़ी में छोड़ देने चाहिए। इन कल्लों को बाहर की ओर छोड़ा जाता है। 1 साल से कम उम्र के छोटे कल्लों को नहीं तोड़ना चाहिए। किसी भी हालत में कल्लों को जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर से ऊपर नहीं काटना चाहिए।

जहां बांस ज्यादा घना हो गया हो, वहां से घने कल्लों को हटा देना चाहिए, भले ही इस में कत्ल रह जाएं, अगर कम उम्र के कल्ले टेढ़मेढ़े हो गए तो उन का मुड़ा हुआ भाग हटा देना चाहिए।

कंटाई छंटाईः
बांस की जड़ों के चारों तरफ मिट्टी चढ़ाते रहना चाहिए, ताकि नया राइजोम सूरज की रोशनी की चपेट में न आए। छाया में बांस की बढ़त अच्छी देखी गई है। पहले साल में 3 बार और दूसरे साल में 2 बार खेती की निराई गुड़ाई करने की जरूरत होती है। पौधों को रोपने के लिए 2 साल तक हर साल 3 बार सिंचाई करनी चाहिए। उस के बाद यह बारिश के पानी पर ही निर्भर रहता है।
मेंड़ पर लगे बांस के खेत में गेंहू, मक्का और सरसों जैसी रबी की फसलें आसानी से उगा सकते हैं। इस के अलावा हल्दी, शकरकंद व आलु वगैरह लगा कर ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है। बांस 3-4 महीने में 15-20 मीटर लंबा हो जाता है और फिर उस की शाखाओं का निकास होता है। यह वजन में हल्का, लचीला और आसानी से कटने-फटने वाला होता है।

बांस की कटाईः
बांस का विकास दूसरे पेड़ों की तरह नहीं होता है। सब से पहले जमीनी गांठ से राइजोम के द्वारा निकला तना बढ़ता है, उस के बाद तेजी से इसकी ऊंचाई बढ़ती है। बारिश से पहले बांस के चारों तरफ मिट्टी चढ़ाई जाती है।
अच्छी पैदावार के लिए बांस की कटाई समय पर करनी चाहिए। टोकरी बनाने के लिए 3-4 साल की उम्र का बांस सही होता है। मजबूती के लिए 6 साल के बांस का इस्तेमाल होता है। 7 साल से ज्यादा उम्र का बांस कोई चीज बनाने के लायक नहीं रहता है। अक्तूबर के दूसरे हफ्ते से दिसबंर तक बांस की कटाई करनी चाहिए, गरमी के मौसम में बांस नहीं काटना चाहिए।
बांस की जमीनी गांठें राइजोम के द्वारा नए बांस पैदा करती हैं। समय बीतते के साथ गांठों की बढ़वार किसी एक तरफ से ज्यादा होती है। ऐसे में जहां बांस की बढ़वार कम हो, उस जगह से बांस काटना शुरू करना चाहिए। उस के बाद बाहर की ओर बांस को वैसा ही रहने देना चाहिए और अंदर की ओर से बांस काटना चाहिए। इस तरह बांस को हरेक झुंड के बीच से काटने के कारण घोड़े की नाल की आकृति बाकी रह जाती है। हर एक झुंड में जितने बांस 1 साल की उम्र के होते हैं, उस से 3 गुना ज्यादा बिना कटे हुए रखने चाहिए।

मिट्टी और आबोहबाः
आमतौर पर बांस हर जगह पाया जाता है। मध्य और दक्षिणी पठार के सूखे ढालों पर भी यह पाया जाता है। बांस अधिकतम 46 डिगरी सेल्सियस और न्यूनतम 5 डिगरी सेल्सियसस तापमान सह सकता है। 1 हजार मिलीमीटर से ज्यादा बारिश वाला इलाका इस के लिए ज्यादा अच्छा है। बांस के लिए नालीनाले, खाइयों और नमी वाली जमीन ज्यादा अच्छी है। नरम या उपजाऊ जमीन में भी बांस अच्छा होता है। क्षार वाली जमीन में बांस नहीं होता है।

बीजः
बांस में हर साल फूल नहीं आते। इस के पूरे जीवन काल में केवल 1 बार ही फूल आते हैं। इलाके के छोटे बड़े सभी बांसों में एक ही समय में फूल आते हैं। इसे ग्रिगेरियस फ्लावरिंग कहा जाता है।
फूल आने के बाद बांस सूख जाता है। बांस के बीज गेहूं की तरह होते हैं। एक किलोग्राम में तकरीबन 4 हजार बीज होते हैं, बीज बोने से पहले उन्हें ठंडे पानी में 24 घंटे तक भिगोया जाता है। इस दौरान 1 बार पानी बदलना जरूरी है।

पौधे तैयार करनाः
बांस की पौध बीज, राइजोम व कलम द्वारा तैयार की जाती है, बांस के कंद को रोपने के लिए 1 साल पुराने कंद का इस्तेमाल किया जाता है। 1 मीटर ऊंचे कंद को जड़ के साथ खोद कर निकाल लिया जाता है और खेत में रोप दिया जाता है। मानसून का मौसम यात्रा जुलाई से सितंबर के महीने इस की रोपाई के लिए अच्छे रहते हैं।
60-60 सेंटीमीटर का गड्ढा खोद कर हर गड्ढे में 5 किलोग्राम कंपोस्ट मिट्टी के साथ डालें। लाइन से लाइन की दूरी 5 मीटर होनी चाहिए। 1 हेक्टेयर में 5 पौधे लगाए जा सकते हैं। रोपाई के बाद पौधों की अच्छी तरह से सिंचाई करें। साल में 2 बार पोटाश और नाइट्रोजन का इस्तेमाल करने से फसल अच्छी होती है। जरूरत के हिसाब से चूने का इस्तेमाल करने से बांस की खेती में अम्लीयता खत्म हो जाती है।

पैदावार व फायदा:
बांस के कल्लों की उपज 5वें साल से मिलनी शुरू हो जाती है। 5 से 10 साल के बीच हर साल औसतन 10 कल्लों का उत्पादन होता है। 11 से 15वें साल के उत्पादन बढ़ कर औसतन 15 कल्ले हो जाता हैं। बाजार में 1 कल्ले की कीमत 5 रुपए है।

1 हेक्टेयर रकबे में बांस के 275 पौधे लगाने में तकरीबन 5 हजार रुपए का खर्च आता है। 5वें साल से 22वें साल तक कम से कम 25 सौ कल्लों से हर साल साढ़े 12 हजार रुपए की आमदनी होती है।

 

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