किसानों के साथी कीकर और महुआ

Bassia_latifoliaLatinMahua_Tree

शहरीकरण और लोगों की दिनों-दिन बढ़ती जरूरतों को जंगल काट कर पूरा किया जा रहा है। नतीजा सब के सामने है, धरती का फेफड़ा कहे जाने वाले पेड़ों का तेजी से कटान होने से हमारी धरती बीमार हो रही है। नतीजे और ज्यादा खतरनाक हों, इससे पहले हमें चेत जाना चाहिए।

हालांकि हमारी सरकारों की आंखें खुल चुकी हैं। मानसून के सीजन में बड़ी मात्रा में पौधोरोपण किया जाता है। लोगों को, किसानों को मुफ्त में पौधे बांटे जाते हैं।
कृषि वानिकी को बढ़ावा दे कर जंगल की कमी को पूरा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यह कोशिश ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ है।


सरकार की यह पहल भले ही जंगलों की भरपाई में महज सूरज को दिया दिखाना भर हो, लेकिन किसानों के लिए किसी वरदान से कम कतई नहीं है। कृषि वानिकी से जहां लकड़ी की जरूरत को पूरा करने की कोशिश की जा रही है, वहीं इस से रोजगार को एक नई दिशा मिली है।

हरियाणा का यमुनानगर प्लाईवुड उद्योग का एक राष्ट्रीय केंद्र बन गया है। उत्तर प्रदेश का हापुड़ लकड़ी की मंडी के तौर पर देशभर में मशहूर है। सरकार की भी योजना है कि हर राज्य में लकड़ी की मंडी विकसित की जाए।
किसानों को सरकार की इस पहल का फायदा उठाना चाहिए। कृषि फसलों के साथ ज्यादा से ज्यादा तादाद में पेड़ लगा कर इस सुनहरे मौके को हाथ से नहीं गंवाना चाहिए। खुद किसान भी अपने घरेलू जरूरतों के लिए जंगली पेड़-पौधों के भरोसे रहते हैं। कृषि वानिकी से इन तमाम जरूरतों को पूरा करने के साथ आमदनी में भी इजाफा किया जा सकता है। साथ ही कुछ ऐसे पेड़ों को हम बचा सकते हैं जो अब खत्म होने के कगार पर हैं।

यहां कुछ ऐसे ही पेड़ों की जानकारी दी जा रही है जो किसानों के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकते हैं।

महुआ:
गुजरात के बड़ौदा जिले में सवा 3 लाख से ज्यादा महुआ के पेड़ हैं। इस जिले के कुछ आदिवासी परिवार इन पेड़ांे की वजह से लखपति बन गए हैं। वे महुआ का इस्तेमाल केवल शराब बनाने में नहीं करते, बल्कि उस से बेहतरीन खाने लायक तेल बना कर रसोई का जायका भी मजेदार करते हैं।
महुआ के बारे में कहा जाता है कि इस से देशी शराब बनाई जाती है, जिस का नशा ज्यादा खराब होता है। इस सोच के चलते किसान व आम लोग महुआ की बागबानी की तरफ कदम नहीं बढ़ाते, जबकि इस के दूसरे कई फायदे भी हैं, जिन से लोग पूरी तरह वाकिफ नहीं हैं।

आदिवासियांे के लिए तो महुआ का पेड़ एक कल्पवृक्ष की तरह है। उन मंे महुआ की शराब पीने का रिवाज खूब है। वे महुआ से निकाले गए तेल को खाने के तौर पर भी इस्तेमाल करते हैं। इस की ताजा पत्तियों के पकौड़े और सब्जी बनाते हैं और इस के फूल को भी खाने के लिए इस्तेमाल करते हैं।

इस के अलावा जानवरों के लिए महुआ फायदेमंद समझा जाता है। महुए के तेल का इस्तेमाल शैंपू और साबुन बनाने में भी किया जाता है और इस की छाल से दवाएं बनाईं जाती हैं।

साल 2007 में बड़ौदा जिले के फारेस्ट एक्सटेंशन व फारेस्ट रिसर्च सर्वे के मुताबिक, इस जिले में 3 लाख, 28 हजार, 7 सौ महुआ के पेड़ लहलहा रहे हैं। इन पेड़ों के फल, फूल व लकड़ी बेच कर आदिवासी खूब पैसा कमाते हैं। अगर महुआ की बागबानी की जाए, तो खूब कमाई करने के साथ आबोहवा की भी बेहतर रखा जा सकता है।

बड़हल:

बड़हल एक ऐसा फल है, जो मुलायम व गूदेदार होता है। इस का रंग हलका पीला होता है। इस में छोटे-छोटे बीज होते हैं, जिन्हें खाया नहीं जाता। इस की तासीर गरम होती है, इसलिए यह पेट के लिए अच्छा नहीं माना जाता, इसे गरीब लोग ही खाते हैं, वैसे जायका बदलने के लिए बड़हल को खाने में गुरेज नहीं करना चाहिए।


बड़हल का पेड़ बहुत खूबसूरत लगता है, इस के पत्ते गोल, गहरे हरे, ऊपर से चिकने और नीचे से खुरदरे होते हैं। जाड़ों में इस के पत्ते झड़ जाते हैं, फिर वसंत में यह पत्तों और फूलों से भर उठता है। इस के नारंगी रंग के छोटे-छोटे फूल गुच्छों में खिलते हैं, जो देखने में बहुत खूबसूरत लगते हैं, बड़हल नमी वाले इलाकों में पाया जाता है। यह बीज से पैदा होता है और पूरा पेड़ बनने में 6 साल का समय लगता है।

बड़हल की लकड़ी काफी मजबूत होती है। इस की लकड़ी की खासियत यह है कि इस में दीम नहीं लगती। यह टिकाऊ भी खूब होती है, लिहाजा इस का इस्तेमाल घर की चैखट और कड़ी बनाने में किया जाता है। इस की जड़ से एक तरह का पीला रंग भी तैयार किया जाता है। इस की छाल से त्वचा की बीमारी की दवा बनाई जाती है और बीज से कब्ज की दवा बनाते हैं।

बबूल:
राजस्थान के मरुस्थल में झुलसाने वाली गरमी और पानी की कमी का मुकाबला कर के छायादार पेड़ का रूप लेने वाले इजरायली कीकर यानी बबूल को पंजाब में भी उगाया जा रहा है।

ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि पंजाब में पुराना कीकर खत्म होता जा रहा है। तमाम कोशिशों के बावजूद पंजाब का सरकारी अमला इस पुराने और किसान के परम दोस्त कीकर को बचा पाने में नाकाम रहा है।


कीकर का हर हिस्सा काम का होता है। यह भरपूर मात्रा में आक्सीजन देता है। इस की कच्ची फलियों का आचार बनाया जाता है। इसे कई तरह की दवाओं में भी इस्तेमाल किया जाता है। पत्ते का हरा चारा बनता है, तो पेड़ की लकड़ी फर्नीचर बनाने के काम में आती है। टहनियों को सुखा कर लकड़ी जलाने का काम में ली जाती है। इस की दातुन भी बहुत फायदेमंद होती है।

इजरायली कीकर उत्तरी अफ्रीका और मध्यपूर्व की पैदावार है। इस का 2 साल का पौधा हर तरह की सर्दी और गरमी को सहन करने की कूवत रखता है।
राजस्थान में इस की 56 किस्में उगाई जाती हैं, उन्हीं में से अच्छी किस्मों को पंजाब के खेतों की शान बनाया जा रहा है।

इजरायली कीकर का पौधा 50 डिगरी सेंटीग्रेड तक गरमी को आसानी से सहन कर लेता है, भारी बरसात और अकाल में भी यह खड़ा रहता है, नमकीन मिट्टी में भी यह पल जाता है।
इस की बीजाई के लिए बीज को पहले आधा घंटे तक सल्फयूरिक एसिड में डुबोना पड़ता है। इस के पौधे नर्सरी से भी हासिल किए जा सकते हैं।


गरम पानी में बीज को रखने से खराब बीज अलग हो जाते हैं। इसलिए बीजों को पूरी रात गरम पानी में रखना पड़ता है। इस की बीजाई या नर्सरी से लिए पौधों की रोपाई 3-3 मीटर दूरी पर करनी चाहिए।

जब पेड़ 4 से 15 मीटर तक बढ़ जाए तो इस के तने के साथ-साथ टहनियों का भी फैलाव हो जाता है। कांटे भी निकल आते हैं। इस कीकर के फूल रंगबिरंगे होते हैं। जैसे ही पेड़ पर पत्तों की भरमार होती है, उन्हें काट कर चारे में इस्तेमाल कर सकते हैं।

7 साल का पेड़ 5 मीटर ऊंचाई तक चला जाता है। इस पर 6 किलो फलियां और 3 किलो बीज निकल आते हैं। सालभर में औसतन 14 किलो फलियां 1 पेड़ से हासिल हो जाती हैं। इस की फलियां और पत्ते सूखे इलाकों में पशु आहार का काम देते हैं।

जब पेड़ 12 साल पुराना हो जाता है, तो उस से भारी मात्रा में जलाने के लिए लकड़ी मिल जाती है।

पारंपरिक कीकर जैसी मजबूती तो इस कीकर में नहीं होती और न ही इस की लकड़ी गुणों में देसी कीकर जैसी होती है, फिर भी अब पंजाब में इस इजरायली कीकर को अपनाने के सिवा कोई चारा नहीं है।

दरअसल पारंपरिक कीकर को एक तरह की बीमारी लग चुकी है और भरसक कोशिश करने के बावजूद पंजाब के वन अधिकारी बबूल को बचा पाने में नाकाम रहे है। इसलिए जो पेड़ काट जाता है या आंधी में टूट कर गिर जाता है, वह हमेशा के लिए खत्म हो जाता है।

 

Read all Latest Post on खेत खलिहान khet khalihan in Hindi at Khulasaa.in. Stay updated with us for Daily bollywood news, Interesting stories, Health Tips and Photo gallery in Hindi
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और गूगल प्लस पर ज्वॉइन करें
Title: acacia and mahua good helper for farmers in Hindi  | In Category: खेत खलिहान khet khalihan

Next Post

अदरक को रखें महफूज ऐसे करें प्रोसेसिंग

Sun Jun 12 , 2016
अदरक केवल भारत में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की एक खास मसाला फसल है। निर्यात के नजरिए से सभी मसाला फसलों में अदरक का तीसरा स्थान है, भारत में अदरक केरल, मेघालय, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, कर्नाटक वगैरह राज्यों में उगाया जाता है। […]
Ginger-Cultivation-600x330

All Post


Leave a Reply