आंवला एक मध्यम कद का पेड़ है, जिस की ऊंचाई 20-30 फुट तक होती है। इस की टहनियां मुलायम होती हैं पेड़ का हर हिस्सा फल, लकड़ी, पत्ती, छाल वगैरह कई कामों में इस्तेमाल होता है।
कृषि बागवानी तकनीक में आंवला बहुत फायदेमंद फसल है। खेत के बीच में इसे लगा कर साथ में अन्य फसलों की खेती की जा सकती है।
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, जौनपुर, रायबरेली, वाराणसी व सुल्तानपुर जिलों में आंवले की कारोबारी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। उत्तर प्रदेश के अलावा मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात व राजस्थान के सूखे इलाकों में भी आंवले की खेती की जाने लगी है।

आंवले की चकैया, बनारसी व हाथी झझूल जैसी किस्में काफी मशहूर थीं, लेकिन नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय, फैजाबाद द्वारा तैयार की गई किस्मों जैसे नरेंद्र आंवला-4, नरेंद्र आंवला-6, नरेंद्र आंवला-7 व नरेंद्र आंवला-10 की खासियतों के चलते किसानों ने इन्हें ज्यादा पसंद किया है।

मिट्टी और जलवायु:
यह ठंडे वातावरण में 1 से ले कर गरमी में 49 डिगरी सेंटीग्रेड तक में उग सकता है। आंवले को औसतन 7 सौ में 15 सौ मिलीमीटर बारिश की जरूरत होती है। यह 13 सौ मीटर ऊंचाई तक में भी होताा है। नमी वाले इलाकों में आंवले की पैदावार अच्छी होती है, लेकिन यह सूखे इलाके में भी अच्छी पैदावार देता है।

पौधे तैयार करना:
अच्छी क्वालिटी वाले पेड़ों की कम या कलिकायन लगा कर अच्छी किस्म तैयार की जा सकती है। पेड़ के बीज इकट्ठे कर उस से भी पौधे तैयार किए जा सकते हैं।

कृषि वानिकी:
इस तकनीक में आंवले के कलमी पौधों को 8×8 मीटर के अंतर पर 60×60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढों में लगाना चाहिए। गड्ढों में 15-20 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद मिलाएं और कीटों से बचाने के लिए कीटनाशक का इस्तेमाल करें।

रखरखाव:
पौधे रोपाई के बाद 2 बार निराई करें, बारिश खत्म होने के बाद पौधों के चारों और बाड़ लगा दें, जिस से मिट्टी की नमी बनी रहे। सर्दियों में महीने में 1 बार व गरमियों में 2 बार सिंचाई करनी चाहिए।

कटाई-छंटाई:
नए लगाए पौधों की काट छांट इस तरह करनी चाहिए। जिस से कम से कम 1 मीटर तक तना सीधा और बिना टहनी वाला रहें। इस के बाद 5-6 टहनियां अलग-अलग दिशाओं में निकाल दें ताकि पेड़ का ढांचा मजबूत रहे।

पैदावारः 
आंवले की अच्छी किस्म 4-5 साल बाद फल देना शुरू कर देती है। पहले साल पैदावार कम होती है। 5 साल के बाद हर साल तकरीबन 10-15 किलोग्राम फल 1 पेड़ से लिए जा सकते हैं। इसके बाद हर साल फलों की पैदावार बढ़ती रहती है। एक पेड़ 20-25 सालों तक फल देता है, लेकिन पेड़ का रखरखाव ठीक न होने पर 15 साल बाद पैदावार में कमी आ जाती है।
अक्सर आंवले के पेड़ पर फल न आने की समस्या रहती है।

आंवले न आने की खास वजह पेड़ का बांझ होना है। अगर हम बाग में केवल 1 ही किस्म के पौधे लगाते हैं और नर व मादा फूलों में किसी एक के पहले एक जाने के चलते परागण नहीं हो पाता तो फल नहीं लगते। आंवले में शुरुआती सालों में नर फूल ज्यादा आते हैं। मादा फूल टहनी के ऊपरी हिस्से में या बीच वाले हिस्से में कहीं कहीं पाए जाते हैं।

नरेंद्र आंवला-4, 6, 7 व 10 किस्मों में मादा फूलों की तादाद 4 से 10 तक हर टहनी पर पाई जाती है, जबकि बनारसी किस्म में केवल आधा फीसदी मादा फूल एक टहनी पर पाए जाते हैं। यह पाया गया कि जहां बागों में केवल बनारसी, चकैया व हाथीझझूल किस्म के ही पेड़ लगाए जाते हैं, वहां फल न लगने की समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती है।

नर्सरी से खरीदे गए पौधों की वंशावली की जानकारी न होने से भी पेड़ों के फल लगने की जानकारी नहीं हो पाती, क्योंकि नर्सरी में तैयार किए गए पौधों की कलम अगर फल न लगने वाले पौधों से ली गई है, तो उन में भी अफलन की समस्या बनी रहेगी।

जब पौधों पर पतझड़ होता है और उन में किसी तरह की बढ़वार नहीं होती है, उस दौरान सिंचाई करने या पौधों में मार्च महीने में जब फूल आने लगे तो सिंचाई कर देने से या फिर बारिश होने से भी फूल झड़ जाते हैं, जिस से पैदावार पर बुरा असर पड़ता है।

माहू, स्केल कीट और शूट गाल कीट का हमला, आंवले को काफी नुकसान पहुंचाता है जिस से पौधों की पैदावारी कूवत घट जाती है।

समस्या का हल:
फल न लगने की समस्या को दूर करने के लिए बागों में कम से कम 2-3 किस्मों के पौधे लगाएं। नरेंद्र आंवला-4, 6, 7 व 10 या चकैया किस्म के पौधे लगाने चाहिए। इन किस्मों से तीसरे साल से फल मिलने शुरू हो जाते हैं। बनारसी किस्म का इस्तेमाल कारोबारी खेती के लिए न करें। पौध भरोसेमंद नर्सरी से ही खरीदें। पौध खरीदने से पहले पौधों की वंशावली की जानकारी जरूर हासिल करें।

बाग में जब भी पतझड़ हो, तो सिंचाई कतई न करें। ऐसे में सिंचाई करने से या बारिश से पौधों को पतझड़ खत्म हो जाता है और उन में दोबारा बढ़वार होने लगती है, जिस से पौधों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इसी तरह फूल आने के दौरान सिंचाई करने या बारिश हो जाने में पेड़ों में हार्मोंस का हिसाब बिगड़ जाता है, जिस से फूल झड़ जाते हैं।

पौधों की उम्र के हिसाब से सही समय व जगह पर खाद का इस्तेमाल करना चाहिए। सौ ग्राम नाइट्रोजन, 50 ग्राम फास्फोरस व 75 ग्राम पोटाश प्रति पौधा हर साल के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिए और यह मात्रा 10 साल तक बढ़ाते रहें। फिर जो मात्रा 10 वें साल आती हैं-यानी 1 किलो नाइट्रोजन, 5 सौ ग्राम फास्फोरस व साढ़े 7 सौ ग्राम पोटाश, उसे 10 माल के बाद हर साल देते रहें। गोबर की सही खाद या कंपोस्ट खाद 8-10 किलो हर साल दे कर 10 वें साल यह मात्रा 80 किलोग्राम कर दें।
पेड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट व बीमारियों की रोकथाम के लिए समय-समय पर बागों की जांच-पड़ताल करें और दवाओं का छिड़काव करें।

ध्यान रखें कि फूल आते समय दवाओं का छिड़काव नहीं करना चाहिए, क्योंकि परागण करने वाले कीट या तो आना बंद कर देते हैं या वे मर जाते हैं। केमिकलों का इस्तेमाल फूल की कलियां बनने से पहले या फल बन जाने के बाद करना चाहिए।

छाल खाने वाला कीट:
जिन बागों की ठीक से देखभाल का हमला ज्यादा पाया जाता है। इस कीट की इल्ली तने व शाखाओं में घुस कर छाल को खा कर उस में छेद करती है। टहनियां सूख कर मर जाती हैं, जिस से पेड़ बीमार सा दिखाई देता है।

इस कीट को रोकने के लिए छेदों में बारीक तार डाल कर कीट को मार दें। जयादा हमला होने पर छेदों को साफ कर के उन में रुई को डाइक्लोरवौस के घोल में भिगो कर डालें।

शूट गाल मेकर:
इस की छोटी इल्लियां छोटे पौधों व पुराने फलदार पेड़ों की टहनियां के ऊपरी हिस्से में छेद कर अंदर घुस जाती हैं, जिस से वह हिस्सा फूल कर गांठ की तरह दिखाई देने लगता है। इस में काले रंग का कीड़ा पाया जाता है। हमले की शुरुआत में तनों व टहनियों के आगे हिस्सों में सूजन आ जाती है, जो बाद में गाल का आकार ले लेती है। शूट गाल मेकर कीट का ज्यादा हमला होने पर पेड़ की शाखाओं का बढ़ना बंद हो जाता है, जिस से फूलों पर बुरा असर पड़ता है।
इस कीट को रोकने के लिए मार्च के महीने में जब पेड़ की पत्तियां झड़ जाएं, उस समय गाल वाली टहनियां को काट कर कीड़ों के साथ जला देना चाहिए।

इस कीट की मादा मई महीने में रात के समय अंडे देती है। ऐसे में 3 मिलीलीटर डाइमेक्रान को 10 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव कर देने से अंडे और गिडारें मर जाती हैं। जिन बागों में इस का लगातार हमला होता है, वहां मौसम की शुरुआत में मोनोक्रोटोफास दवा का छिड़काव करना चाहिए।

शल्य कीट:
आंवले की पत्तियों में फरवरी-मार्च में शल्य कीट हमला करता है। इस के हमले वाले पत्तों पर चीटें लगने लगते हैं। शल्य कीट हल्के पीले रंग के होते हैं। इसके झंुड पत्तियों, टहनियों व फूलों पर चिपक कर उन का रस चूसते हैं। सफेद रुई से ये कीट ढके रहते हैं और एक तरह का मीठा रस निकालते हैं, जिस से काली फफंूदी से पत्तियों की रोशनी रुक जाती है और पौधों की बढ़वार रुक जाती है। कीट का ज्यादा हमला होने पर पौधे सूख जाते हैं।
इस की रोकथाम के लिए डेमाक्रान या मोनोक्रोटोफास दवा की 10-20 मिलीलीटर मात्रा 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। इस से यह कीट जमीन पर गिर जाता है। यह फिर दोबारा तनों पर चढ़ जाता है, इसलिए दवा का छिड़काव करते समय पौधों के थालों के पास भी छिड़काव करें और आसपास खरपतवार न उगने दें।

दीमक:
दीमक बहुत बड़ी समस्या है। पौधे लगाते समय अच्छी तरह से सड़ीगली गोबर की खाद इस्तेमाल करना चाहिए। गड्ढा भरते समय पौधे लगाने से पहले 50 मिलीलीटर क्लोरोपाइरीफास दवा को 5 लीटर पानी में मिला कर प्रति गड्ढा डालें।
दवा डालने से पहले हर गड्ढे में 2-3 बाल्टी पानी डाल दें। नए पौधे लगाने के बाद पौधों में एक लीटर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी प्रति एकड़ सिंचाई करते समय डालें।

आंवले की बागवानी करने वाले किसान अगर इन सभी बातों का ध्यान रखते हैं, तो निश्चित ही अच्छी क्वालिटी वाली ज्यादा पैदावार लेने में कामयाब होंगे।

 

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