Lady Finger farming in hindi : भिंडी की वैज्ञानिक खेती

Lady Finger farming in hindi : भिंडी की वैज्ञानिक खेती

Lady Finger farming in hindi : भिंडी की वैज्ञानिक खेती सब्जी की खेती में थोड़ी मेहनत ज्यादा है, लेकिन इस में फसल को स्टौक कर के रखने या फिर कीमतों के लिए किसान को इंतजार नहीं करना पड़ता है। आप की फसल अच्छी है और समय पर तैयार हो रही है तो खरीदारों की कमी नहीं है।

सब्जियों में बात भिंडी की करें तो इस की मांग बाजार में खूब रहती है, क्योंकि घर-घर की साधारण सब्जी होने के साथ यह 5 सितारा होटलों की भी शान है। ब्याह शादी वगैरह आयोजनों में भिंडी उसी शौक से पेश की जाती है जितना कि पनीर, भिंडी का इस्तेमाल और कामों में भी होता है।

इस का बीज कागज बनाने के काम में आता है और कुछ दवाओं में भी इस्तेमाल किया जाता है। इस के बीज के पाउडर को मंजन और काॅफी के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इस के तने और जड़ को गुड़ या खांड़ की सफाई के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है। भिंडी में विटामिन ए बी और सी भी अच्छी मात्रा में होता है।
भिंडी गरमी व बरसात की मुख्य फसल है। उत्तरी भारत में तो इस की 2 फसलें ली जाती हैं पहली अगेती यानी बसंतकालीन फसल और दूसरी पछेती यानी वर्षाकालीन फसल। इस की खेती उत्तर के पहाड़ी इलाकों की गरम घाटियों, तराई व भावर वाले इलाकों में आराम से की जाती है।


जलवायुः

भिंडी गरम मौसम की फसल होने के कारण इसे लंबा और गरम मौसम चाहिए। कोमल होने के कारण इसे पाले से बहुत नुकसान होता है। भिंडी का बीज 20 डिगरी सेंटीग्रेड के नीचे के तापमान पर नहीं जमता, लगातार बारिश इस फसल के लिए सही नहीं होती है।

खेत की तैयारीः

भिंडी की फसल के लिए सही पानी निकासी वाली बलुई दोमट और दोमट मिट्टी अच्छी होती है। कार्बनिक पदार्थ वाली दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6-6.8 तक हो, में भिंडी की अच्छी पैदावार ली जा सकती है। जमीन को 3-4 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी कर के तैयार कर लेना चाहिए।

खाद और उर्वरकः

भिंडी की अच्छी पैदावार के लिए 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी खाद बोआई से पहले खेत में अच्छी तरह मिलानी चाहिए। 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है। बोआई के समय आधी नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा इस्तेमाल करनी चाहिए और बाकी नाइट्रोजन की आधी मात्रा 2 बार में इस्तेमाल करें।

बोआई का समयः

मैदानी इलाकों में गरमी या जायद की फसल फरवरी और मार्च में बोई जाती है।

बारिश या खरीफ की फसल जून ओर जुलाई में बो दें।
गरमी की फसल के लिए बीज को बोने से पहले पानी में 24 घंटे तक भिगो लेना चाहिए। बीज को थिरम या कैप्टान दवा उपचारित कर के ही बोना चाहिए।

1 हेक्टेयर खेत में गरमी के मौसम या जायद की फसल के लिए 18-20 किलोग्राम और बारिश या खरीफ के लिए 10-12 किलोग्राम बीज बोआई के लिए इस्तेमाल करें।

वर्षाकालीन फसल में लाइनों के बीच दूरी 60 सेंटीमीटर और वसंतकालीन फसल में 30 सेंटीमीटर दूरी रखें। पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर होनी चाहिए।

सिंचाईः

भिंडी बोने के समय अगर नमी कम है तो 1 हलकी सिंचाई कर के बोआई करनी चाहिए। इस के बाद गरमियों में हर हफ्ते के अंतर पर और बारिश में जब पानी की जरूरत हो, सिंचाई करनी चाहिए।

निराईगुड़ाईः

शुरू में खरपतवार कम करने के लिए निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए। गरमी में फसल मंे 3-4 गुड़ाई और बारिश के मौसम में फसल पर 2-3 गुड़ाई करनी चाहिए। बारिश के मौसम में फसल पर 2-3 गुड़ाई करनी चाहिए, बारिश की फसल पर मिट्टी भी चढ़ा देनी चाहिए। अगर खेत में पौधे घने हैं तो शुरू में ही फालतु पौधे निकाल देने चाहिए।


फलों की तुड़ाईः

भिंडी की फसल में बोआई के तकरीबन 50-60 दिन बाद फूल और फल आने लगते हैं। फलों की तुड़ाई फूल खिलने के 1 हफ्ते के अंदर कर लेनी चाहिए। अगर फलों को जल्दी न तोड़ा गया तो इस का पौधे की बढ़वार और फल लगने की कूबत पर बुरा असर पड़ता है।

पैदावारः

जायद की फसल की पैदावार 70-80 क्विंटल और बारिश या खरीफ की फसल की पैदावार 100-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो जाती है।

फसल सुरक्षाः

भिंडी नाजुक फसल है इसलिए इस पर कीट व बीमारियांे का हमला भी जल्दी होता है। फसल को दमदार बनाए रखने के लिए उसे कीट व बीमारी से महफूज रखें।

भिंडी की खेती के दौरान आबोहबा में ज्यादा नमी और ज्यादा खाद का इस्तेमाल होने से कीट बीमारी के हमले में बढ़ोत्तरी होती है। जिस से पैदावार में 35-40 फीसदी तक गिरावट आ जाती है।


कीट बीमारी की रोकथाम के लिए जहरीले कीटनाशकों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया जाता है। यहां तक कि भिंडी की फसल पर कीटनाशक के 10-12 छिड़काव करना आम बात हो चुकी है। इस से खेती की लागत तो बढ़ती ही है। साथ ही लोगों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है।

इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी तकनीकें अपनाने की जरूरत है जिन से ज्यादा पैदावार मिले और सब्जी खाने लायक बनी रहें।

भिंडी बेधक कीट:

इस कीट की सूंडियां कलियों के पास से टहनियों में छेद करती हैं जिस से टहनियां मुरझा कर झुक जाती हैं। सूंडियां भिंडी में घुस कर उसे खराब कर देती हैं। ऐसी भिंडी की बाजार में काफी कम कीमत मिलती है।

पर्ण फुदकाः

यह कीट हल्के हरे रंग का बिना पंख वाला होता है। इस कीट के बच्चे व जवान दोनों पत्तियों से रस चूसते हैं। इन के असर से पत्तियां पीली हो कर अंदर की ओर मुड़ जाती हैं। इस कीट का ज्यादा हमला होने पर पत्तियां लाल हो कर सिकुड़ जाती हैं।

सफेद मक्खीः
यह सफेद रंग का कीट होता है। यह पत्तियों का रस चूसता है। यह कीट भिंडी में यैलो वैन मोजेक वायरस बीमारी को भी बढ़ावा देता है।

लाल मकड़ी:

इस कीट के बच्चे काफी छोटे व गुलाबी रंग के होते हैं। जबकि जवान कीट अंडे के आकार के लाल रंग के होते हैं। ये पत्तियांे की निचली सतह पर जाला बना कर रस चूसते हैं। पत्तियां पीली हो कर सूख जाती हैं।

मिली बगः

यह कीट सफेद रंग का होता है और पत्ती के नीचे झुंड में फूल और पत्ती का रस चूसते हैं। इस कीट के हमले से पौध मुरझा कर सूख जाता है।

नेमटोडः

नेमेटोड यानी सूत्र कृमि का हमला पौधों की जड़ों पर होता है। इस से जड़ें फूल जाती हैं, पौधे कमजोर हो जाते हैं और पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं।

जड़ गलन:

यह बीमारी नर्सरी में ज्यादा लगती है। बीमार बीज मुलायम, भूरा या काले रंग का हो जाता है। अगर बीज से फुटाव हो रहा है तो वह जमीन से बाहर निकलने से पहले ही सड़ जाता है। इस बीमारी में मिट्टी की सतह के पास पौधे के तने पर भूरे रंग के नरम धब्बे बनते हैं। बीमार हिस्सा सिकुड़ जाता है और पौधा उस जगह से मुड़ कर सिकुड़ जाता है और पौधा उस जगह से टूट कर गिर जाता है।

पीली शिरा बीमारीः

पौधों की नई पत्तियों की शिराएं यानी नसें पीली पड़ जाती हैं। शुरू में यह पत्तियांे की नसों पर असर करती हैं। धीरे-धीरे पूरी पत्तियों में फैल जाती हैं।

इस बीमारी से भिंडी छोटी होना, कम व पीली बनती है। यह बीमारी भिंडी में सफेद मक्खी से फैलती है।

म्लानि बीमारीः

इस बीमारी से पौधे मुरझा जाते हैं। और पीले पड़ जाते हैं। उन की बढ़वार रुक जाती है। बीमारी ज्यादा बढ़ने पर पूरा तना काला हो जाता है।
पत्तीदाग बीमारी
इस बीमारी का असर पत्तियों पर होता है। पत्तियों पर भूरे रंग के दाग बन जाते हैं।
इन बीमारियों की रोकथाम के लिए समय-समय पर वैज्ञानिकों से सलाह लेते रहें और फसल पर किसी भी बीमारी या कीट का हमला दिखाई दे तो फौरन वैज्ञानिकों को फसल दिखा कर कारगर इलाज करें।

भिंडी को कीट व बीमारियों से ऐसे बचाएं

  • खाली पड़े खेतों की मईजून महीने मेें गहरी जुताई कर के खुला छोड़ दें । ऐसा करने से नुकसानदायक कीड़े धूप में मर जाते हैं।
    कीट की निगरानी के लिए टेप लगाएं। उन में लगने वाले ल्योर को 15-20 दिन के अंतर पर बदलते रहे।
  • प्ररोह व फलबेधक कीट से फसल को बचाने के लिए फेरोमेन टेप का इस्तेमाल पौधों में फल आने के समय करें।
  • तना व फल बेधक कीट को रोकने के लिए भिंडी की फसल के चारों ओर मक्का व ज्वार की फसल लगाएं
  • चिड़ियों को खेत में बैठने के लिए स्टैंड लगाएं, क्योंकि ये पक्षी नुकसानदायक कीटों को खा जाते हैं।
  • तना व फलबेधक की रोकथाम के लिए 30-35 दिन बाद अंडा परजीवी ट्राइकोग्रामा चिलेनिस की डेढ़ लाख संख्या प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत में छोड़ें।
  • तना व फलबेधक कीट का ज्यादा हमला होने पर डेढ़ एमएल मेलाथिन को 1 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें।
    तना व फलबेधक कीट से प्रभावित पौधों व भिंडी को खत्म कर दें।
  • लाल मकड़ी की रोकथाम के लिए एनएसकेई के 2-3 छिड़काव करें या प्रोपजाइट की 3 सौ मिलीलीटर मात्रा का प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें।
  • सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोपरिड की 50 मिलीलीटर मात्रा को प्रति एकड़ के हिसाब से छिड़काव करें मिली बग की रोकथाम के लिए स्टिक बैंड लगाएं।
    मेलाथियान की 2 सौ मिलीलीटर मात्रा को सौ लीटर पानी में घोल बना कर मिली बग की रोकथाम के लिए छिड़काव करें।
  • नेमेटोड की रोकथाम के लिए नीमागोन की 30 लीटर मात्रा प्रति हेकटेयर सिंचाई पानी के साथ मिला कर छिड़काव करें और सही फसल चक्र अपनाएं। जिस खेत में नेमेटौड का हमला हो उसमें 2-3 साल तक भिंडी की फसल न लें।
  • जड़गलन बीमारी की रोकथाम के लिए पानी का ठहराव न होने दें।
    जड़गलन का ज्यादा हमला होने पर 2 सौ ग्राम काॅपर आक्सीक्लोराइड को 100 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें। नीम की खली 5 सौ ग्राम प्रति 10 वर्ग मीटर खेत में बोआई से 15-20 दिन पहले मिट्टी में मिला दें।
  • बीज की बोआई से पहले प्रति 10 वर्ग मीटर रकबे में ट्राइकोडरमा हरजियानम की 50 ग्राम मात्रा सडी गोबर की खाद में अच्छी तरह मिला कर 1 हफ्ते के लिए छोड़ दें बाद में इसे क्यारी में मिला दें।
  • ट्राााइकोडरमा हरजियानम की 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के अनुसार 10-15 मिलीलीटर पानी में मिला कर पेस्ट बनाएं और फिर बीज उपचार करें।
    पीला शिरा बीमारी प्रतिरोधी संकर किस्मों का बीज ही होना चाहिए। जैसे अनुपमा, तुलसी, मखमली व सन 40 वगैरह
  • पीला शिरा बीमारी वाले पौधों को उखाड़ कर खत्म करते रहना चाहिए।
    म्लानि बीमारी से बचाव के लिए जीरम फफूंदी मार दवा के 0.3 फीसदी वाले घोल बना कर बीजोपचार करें।
    पत्ती दाग बीमारी से बचाव के लिए कापर आक्सीक्लोराइड के 0.3 फीसदी या मैंकोजेव के 0.25 फीसदी वाले घोल का छिड़काव करें।

 

 

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Title: how to good cultivation of lady finger in Hindi  | In Category: खेत खलिहान khet khalihan

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