स्त्री और आभूषण

भारतीय लोक साहित्य में अगर देखा जाए तो इनका प्रयोग एक-दूसरे के पूरक और पर्याय की तरह हुआ है। लोकगीतों में तो इनके ऐसे-ऐसे अतिशयोक्ति से भरे उदाहरण मिलते हैं कि सोच कर हंसी आने लगती है। भारत की लगभग सभी बोलियों की लोककथाओं में भी ऐसे सैकडों उदाहरण भरे मिल जाएंगे। भारत में ऐसी शायद ही कोई लोकभाषा हो जिसमें किसी राजा के पास नौलखा हार होने, उस हार के चोरी होने और फिर किसी निर्दोष व्यक्ति पर चोरी का इल्जाम लगने तथा उसके चलते विपत्तियों का पहाड टूट पडने की कहानी न हो। मुझे नौलखा मंगा दे रे ओ सैयां दीवाने.. जैसे नए जमाने के फिल्मी गाने भी इन्हीं लोककथाओं और लोकगीतों से प्रेरित हैं।

सवाल सौंदर्यबोध का

अब चाहे लोककथाएं हों या फिर लोकगीत या नए दौर के फिल्मी गाने, जहां कहीं भी हार या किसी अन्य आभूषण का जिक्र आया है, वहां इसका संकेत एक ही है और वह है आभूषणों की चाह। आम तौर पर लोक और आधुनिक हर तरह के साहित्य में इसे जोडा गया है स्त्री से। यह अलग बात है कि प्राचीन और मध्यकालीन दौर के साहित्य में ऐसे किसी सम्राट, श्रेष्ठि या अन्य गणमान्य व्यक्ति का जिक्र मिलना मुश्किल है, जिसका जिक्र गहनों के बगैर आया हो। जहां कहीं भी राजाओं के रूप का वर्णन आया है, वहां उनके सुदर्शन व्यक्तित्व की कल्पना आभूषणों के बिना की ही नहीं जा सकती है। संस्कृत से लेकर अंग्रेजी साहित्य तक में कई तरह के महंगे रत्नों से जडे सोने-चांदी के आभूषण राजाओं के व्यक्तित्व के अभिन्न हिस्से के रूप में दिखाए गए हैं।

woman_jewellry-5

इसके बावजूद आभूषण किसी ऐसी कहानी या गीत के कथानक का केंद्र नहीं बन सके हैं, जिसका मुख्य पात्र पुरुष हो। जहां भी किसी कहानी या गीत में आभूषण कथावस्तु के केंद्रीय तत्व बने हैं, उसकी मुख्य पात्र स्त्री रही है। इसकी वजह शायद यह हो कि आभूषण के प्रति अतिशय आकर्षण स्त्री की ही स्वभावगत विशिष्टता मानी जाती है। पुरुष अगर ऐसी किसी कहानी का केंद्रीय पात्र कभी बना भी है तो उसका कारण आभूषण नहीं, उसका मूल्य रहा है। आभूषण के प्रति उसकी ललक नहीं रही है, उसकी ललक उसकी कीमत में रही है। अगर रत्न के प्रति पुरुष का आकर्षण रहा है या उसने कहीं इसका प्रयोग किया है, तो भी उसकी रुचि रत्न के बजाय भाग्य पर उसके प्रभाव में होती है। सीधे आभूषण के प्रति पुरुष की कोई खास ललक नहीं देखी जाती है।

आभूषण के प्रति स्त्री की ललक और पुरुष की चाह के बीच अंतर है। यह फर्क है सौंदर्यबोध का। स्वभावत: भौतिक सफलता और स्वतंत्रता का आग्रही पुरुष आभूषण या तो अपना भाग्य चमकाने के लिए लेता है, या फिर समृद्धि दर्शाने और बढाने के लिए। वैसे समृद्धि दर्शाने और बढाने की बात तो स्त्रियों के साथ भी है, पर यह उनके लिए दूसरे दर्जे की प्राथमिकता है। उनकी पहली प्राथमिकता सौंदर्यबोध से ही जुडी मानी जाती है। इसके मूल में कहीं न कहीं उनका यह विश्वास भी है कि गहने पहन कर वह ज्यादा सुंदर दिखती हैं। लगभग वैसे ही जैसे कि अन्य सौंदर्य प्रसाधनों के प्रति।

रचनात्मक प्रसंग

साहित्य में गहनों की चर्चा सबसे पहले आती है शूद्रक के रूपक मृच्छकटिकम में। लिखित साहित्य में यह संभवत: पहली रचना है जिसमें गहने ही कथानक के केंद्र बने हैं और यह गहने हैं एक गणिका वसंतसेना के। वसंतसेना एक गरीब व्यक्ति से प्रेम करती है, जिसका नाम चारुदत्त है। चारुदत्त का बच्चा अपने पडोसी बच्चे के साथ खेलता है। उस बच्चे के पास सोने की गाडी है, जबकि इसकी गाडी मिट्टी की है।

चारुदत्त का बालक सोने की गाडी के लिए जिद करता है। यह जानकर कि यह चारुदत्त का बच्चा है, वसंतसेना अपने सभी जेवर निकाल कर उसकी गाडी में भर देती है और कहती है कि जाओ अब तुम इससे सोने की गाडी बनवा लेना।

आभूषणों के ऐसे प्रयोग की वास्तविक घटनाएं इतनी हैं कि उन सबका जिक्र करना मुश्किल है। यह बात लोकजीवन के यथार्थ की है। इसके बावजूद साहित्य में इसे स्थान कम ही मिल सका है। ऐसे अवसर कम नहीं रहे हैं जब परिवार, समाज या देश पर संकट के समय में किसी स्त्री ने अपने सारे गहने उतार दिए हों। इसलिए ताकि उन्हें बेचकर काम में लाया जा सके। मृच्छकटिकम के बाद साहित्य में इसका जिक्र न आया हो, ऐसा भी नहीं है। यहां तक कि हिंदी की फिल्मों में भी ऐसे कुछ प्रसंग आए हैं, जब स्त्रियों ने परिवार के मान-सम्मान की रक्षा के लिए अपने सभी जेवर दे दिए हों। भले ही जेवरों को सौंदर्य के एक साधन और प्रतिष्ठा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, पर इसका इससे ज्यादा रचनात्मक उपयोग और क्या हो सकता है? फिर भी, कारण चाहे जो भी रहा हो, ऐसी घटनाएं या ऐसे साहित्यिक प्रसंग भी चर्चा के केंद्र में बने नहीं रह सके हैं।

त्रासदी से भरी कहानियां

चर्चा के केंद्र में ज्यादातर ऐसी कहानियां रही हैं जिनका या तो अंत त्रासद रहा है, या फिर पूरे कथानक की विकासयात्रा त्रासदी से भरी रही है। वैसे हिंदी-अंग्रेजी और अन्य भाषाओं में भी ऐसी कहानियां हैं, जिनमें गहनों को लेकर लिखी कहानी, नाटक या प्रबंध काव्य का अंत सुखद रहा, लेकिन उनके नायक या नायिका का पूरा जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण और त्रासदी से भरा रहा है।

woman_jewellry-4

कहा जा सकता है कि ऐसी कथाओं की शुरुआत भी संस्कृत से ही हुई है। महाकवि कालिदास के महाकाव्य अभिज्ञान शाकुंतलम की कथा कुछ ऐसी ही है। स्वर्ग की अप्सरा मेनका की पुत्री शकुंतला की मुलाकात शिकार के लिए वन में आए राजा दुष्यंत से होती है। दोनों एक-दूसरे से इतने प्रभावित होते हैं कि वहीं दोनों का गंधर्व विवाह हो जाता है। कुछ ही दिनों बाद अपनी पहचान के तौर पर शकुंतला को एक अंगूठी देकर दुष्यंत वापस राजधानी चले जाते हैं। शकंतुला कुछ दिनों बाद दुष्यंत से मिलने राजधानी जाती है। इस बीच वह एक तालाब से पानी पीती है और उसी दौरान उसकी अंगूठी तालाब में गिर जाती है। वह अंगूठी एक मछली निगल लेती है। फलत: जब वह दुष्यंत के पास पहुंचती है तो दुष्यंत उसे पहचान नहीं पाते हैं।

शकुंतला और दुष्यंत का मिलन वर्षो बाद फिर तभी संभव हो पाता है जब संयोगवश वह मछली मारी जाती है और उसके पेट से वह अंगूठी निकलती है। इस बीच लंबे समय तक दोनों को अलग ही रहना पडा। हालांकि इस कहानी को लेकर स्त्री अस्मिता से जुडे कई सवाल उठाए जा सकते हैं, पर वह एक अलग बात है। यहां मूलभूत मुद्दा एक अंगूठी को लेकर शुरू हुई त्रासदी का है और इस मामले में शकुंतला की कहानी अपने ढंग की अनूठी और कालक्रम के अनुसार शायद पहली हो।

आभूषणों की ललक

कहानी चाहे मृच्छकटिकम की हो या अभिज्ञान शाकुंतलम की, इन दोनों की ही कथावस्तु के केंद्र में आभूषण और स्त्री जरूर हैं, लेकिन ऐसा बिलकुल नहीं है कि स्त्री में आभूषण के प्रति बेतरह ललक दिखाई गई हो। इनमें एक स्त्री के आत्मोत्सर्ग की कहानी है तो दूसरी एक आभूषण के ही चलते एक स्त्री के भयावह त्रासदी की शिकार होने की कथा है। आश्चर्य की बात है कि इन कहानियों की चर्चा प्रेम और अन्य भावनात्मक संदर्भो में जरूर होती है, लेकिन आभूषणों को लेकर स्त्री के त्याग और उसकी संवेदनशीलता या स्त्री अस्मिता के सवालों की ओर आधुनिक चेतना संपन्न साहित्यकारों का ध्यान भी नहीं गया है।

इस भावभूमि को लेकर आधुनिक चेतना को झकझोरने वाली पहली कहानी फे्रंच कथाकार गाय दे मोपासां की द नेकलेस है। यह एक ऐसी सुंदर लडकी की कहानी है जिसे गहनों का बहुत शौक है, लेकिन उसकी शादी एक गरीब व्यक्ति से हो जाती है। वह दूसरी स्त्रियों को सुंदर गहने पहने देखकर कुढती रहती है, लेकिन साधनहीनता के कारण कुछ कर नहीं पाती। सुंदर आभूषण पहनने की उसकी चाह पूरी नहीं हो पाती। इसी बीच उसके पति को एक पार्टी में जाने का निमंत्रण मिलता है। वह यह बात बताता है तो पत्नी और ज्यादा दुखी हो जाती है। कारण पूछने पर वह बताती है कि मेरे पास सुंदर कपडे तो हैं नहीं और ये साधारण कपडे पहन कर पार्टी में जाने का कोई अर्थ नहीं है। पत्नी को उदास देखकर पति किसी तरह कपडों की व्यवस्था कर देता है। लेकिन वह फिर उदास हो जाती है। यह सोच कर कि उसके पास गहने तो हैं नहीं। थोडी देर में उसे याद आता है कि उसकी एक अमीर सहेली के पास हीरे का नेकलेस है। वह उसके पास पहुंचती है और उससे एक दिन के लिए नेकलेस उधार मांगती है। सहेली खुशी से अपना नेकलेस उसे दे देती है। जिसे पहन कर वह पार्टी में जाती है और सबके आकर्षण का केंद्र बनती है। लेकिन लौटने पर वह पाती है कि नेकलेस गायब है।

यहीं से इस जोडे की त्रासदी शुरू होती है। दोनों दिन-रात खटकर कई साल की कडी मेहनत के बाद वैसा ही दूसरा नेकलेस बनवाते हैं और फिर उसे लेकर उस स्त्री के पास जाते हैं जिससे उन्होंने वह नेकलेस लिया था। जब वे उसे हीरे का नेकलेस लौटाते हैं तो पता चलता है कि उसने जो नेकलेस उन्हें दिया था, वह तो नकली था। इस तरह सिर्फ एक दिन के सुख के लिए कर्ज चुकाने में पूरी िजंदगी बिता देने की कहानी बनते-बनते यह कहानी अचानक एक सुखद अंत पर पहुंचती है। लेकिन इसमें तो कोई दो राय नहीं कि बीच की उनकी पूरी िजंदगी सिर्फ त्रासदी से भरा सफर बन कर रह गई। संभवत: आधुनिक साहित्य में यही पहली कहानी है जिसमें आभूषण के प्रति स्त्री की ललक को ऐसी त्रासदी का जिम्मेदार ठहराया गया। एक दौर में बहुचर्चित और बहुप्रशंसित रही यह कहानी आज भी अकसर चर्चा में आ जाती है। हालांकि आज अगर स्त्रीवादी नजरिये से इसका विश्लेषण किया जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर यह साहित्य की दुनिया में एक बडे तबके की आलोचना की पात्र बने।

ललक से जुडी त्रासदी

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बहुत ज्यादा ललक किसी भी चीज की खतरनाक होती है। क्योंकि आकांक्षाओं की अति मनुष्य को गलत साधन अपनाने के लिए बाध्य करती है और यह अंतत: त्रासद साबित होता है। इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास है मुंशी प्रेमचंद का गबन। सच तो यह है कि इस उपन्यास के बहाने प्रेमचंद के निशाने पर मध्यवर्ग की कुछ कुप्रथाएं हैं, लेकिन इसकी कथावस्तु आभूषणों के इर्द-गिर्द ही घूमती है। कहानी की शुरुआत एक मुंशी जी के बेटे के विवाह से होती है। परंपरा के अनुसार बहू को चढावे में ढेर सारे गहने भेजे जाते हैं। उनमें एक चंद्रहार होता है और वह उसे बहुत पसंद भी आ जाता है। विवाह के बाद बहू जब ससुराल आती है तो कुछ ही दिनों बाद सास उससे वह चंद्रहार वापस ले लेती है। तब उसे मालूम होता है कि वह तो किसी दूसरे का था। उसे तो सिर्फ दिखावे के लिए भेज दिया गया था। इससे बहू को बहुत धक्का लगता है। वह उदास रहने लगती है। तब उसका पति यह संकल्प करता है कि वह उसके लिए चंद्रहार जरूर बनवाएगा। हालांकि वह एक छोटा और ईमानदार मुलाजिम है। उसके लिए ईमानदारी से चंद्रहार बनवाना आसान नहीं है। आखिरकार चंद्रहार बनवाने के लिए वह गबन करता है और पकडा जाता है। यह कहानी दुखांत ही है। दिखावे और लोभ के चलते एक परिवार तबाह होकर रह जाता है। काफी पहले इसी कथानक पर एक फिल्म भी बन चुकी है, जिसका गाना मैंने सपने में देखा था एक चंद्रहार/आज बालम ने पहना दिया.. खासा लोकप्रिय रहा है। मुंशी प्रेमचंद की ऐसी ही दो और कहानियां हैं। इनमें एक तो है जेवर का डिब्बा और दूसरी कौशल। इन कहानियों के जरिये भी मुंशी प्रेमचंद यही संदेश देते हैं।

woman_jewellry-3

आकर्षण का सच

भारत तथा विदेशों की अन्य भाषाओं में भी ऐसी कई कहानियां हैं जिनमें गहनों के प्रति स्त्री की अतिरिक्त ललक दिखाई गई है। बांग्ला साहित्य में शरत चंद्र और बंकिम चंद्र की भी कुछ कहानियां इस भावभूमि पर आधारित हैं। लेकिन यह सच है कि चाहे भारतीय रहे हों या विदेशी, साहित्यकारों ने उन स्थितियों को समझने की कोशिश कभी नहीं की जिनके कारण गहनों के प्रति स्त्री की ललक है। यह समझने की कोशिश ही नहीं हुई कि आभूषणों के प्रति स्त्री का ऐसा आकर्षण अगर है तो उसका कारण क्या है। इसका एक कारण तो यह भी है कि अकसर इन मुद्दों पर लेखकों की ही कलम चली और लेखिकाएं मौन रहीं। अगर उन्होंने इसका विश्लेषण किया होता तो शायद कुछ और बातें सामने आतीं। धन के सुरक्षित निवेश और अच्छे रिटर्न को देखते हुए आज का सच तो यह है कि आभूषणों की खरीद-फरोख्त में पुरुषों की रुचि भी स्त्रियों से कुछ कम नहीं है। फिर भी गहनों के प्रति आकर्षण स्त्रियों का ही माना जाता है। यह कहते हुए लोग यह भूल जाते हैं कि स्वतंत्रता की लडाई के दौरान तमाम स्त्रियों ने अपने गहने उतार कर क्रांतिकारियों और सत्याग्रहियों को दे दिए थे, ताकि वे देश के लिए लड सकें। आजादी के बाद भारत-चीन युद्ध के दौर में भी तमाम स्त्रियों ने ऐसी ही त्याग भावना का परिचय दिया था। परिवारों के लिए तो कितने अवसरों पर स्त्रियों के गहने काम आए हैं, इसकी ठीक-ठीक गिनती कर पाना तो शायद भारत के किसी परिवार के बस की बात न हो। जीवन में आभूषणों की उपयोगिता स्पष्ट करने के लिए इतना काफी है। फिर भी आभूषणों के प्रति केवल स्त्रियों के आकर्षण को लेकर इतनी नकारात्मक धारणाएं क्यों है, इस मुद्दे पर विचार किया जाना चाहिए।

कोई खास लगाव नहीं

काजोल, अभिनेत्री

मैं बचपन में काफी हद तक टॉमबॉइश थी। मेरी पढाई-लिखाई विदेश में होने के कारण शायद इसका सीधा असर मेरे व्यक्तित्व पर हुआ होगा। फेमिनिन चीजों से मेरा आम तौर पर वास्ता कम ही पडा। मैं जिस हॉस्टल में रहती थी, वहां लंबे बाल तक एलाउड नहीं थे। लंबे बालों की भारतीय महिलाओं के लिए क्या अहमियत है और यह हमारे सौंदर्यबोध से किस हद तक जुडे हैं, यह बात पश्चिमी देशों के लोग तो समझने से रहे। उन्हें सिर्फ यह मालूम था कि लंबे बाल रखना छात्र-छात्राओं के लिए ठीक नहीं है। बहरहाल, उस वक्त वहां के अनुशासन के अनुसार मुझे फेमिनिन चीजों से दूर रहने की आदत पडी। इसका असर यह हुआ कि आगे भी मुझे फैशन, गहने, सौंदर्य-प्रसाधन इनसे कोई खास लगाव नहीं रहा। मैं जब भारत वापस आई तो मेरी धीरे-धीरे एक स्टाइल बनती गई, जिसे मैंने कभी आग्रहपूर्वक नहीं बनाया। तात्पर्य यह है कि ज्यादातर भारतीय महिलाओं की तरह मुझे जेवरात-गहने या आभूषणों के प्रति कोई खास लगाव नहीं है और न पहले ही था।

वैसे, हीरों की ज्यूलरी इस मामले में अपवाद है। मुझे जो भी आकर्षण है, वह डायमंड्स की ज्यूलरी का है, मैं अस्मी डायमंडस ज्यूलरी की ब्रैन्ड एम्बेसडर भी हूं। मैं खुद भी ज्यूलरी कम पहनती हूं। मैंने अपनी शादी में जरूर ढेर सारे आभूषण पहने थे और वे पारंपरिक महाराष्ट्रियन जेवरात थे।

कभी-कभी मुझे ज्यूलरी को लेकर भारतीय स्त्रियों के आकर्षण पर ताज्जुब भी होता है। जब हम यह आम तौर पर कहते-पढते हैं कि महंगाई बढती ही जा रही है, पर ज्यूलरी की दुकानों पर हम महिलाओं की बडी भीड भी देखते हैं। यह कैसा आकर्षण है, मैं नहीं समझ पाती। सच कहूं तो मैं ज्यूलरी खरीदने के बजाय उतने ही समय में बुक शॉप चली जाऊंगी। मैं नहीं समझती कि विदेशों में भी इस हद तक महिलाओं में आभूषणों का प्रेम होगा। मैं इस बात को मानती हूं कि सोने की ज्यूलरी इनवेस्टमेन्ट का अच्छा जरिया है। सोने की रिटर्न वैल्यू तो दिन दूनी रात चौगुनी बढती ही जा रही है। इसलिए मेरी समझ से सोना निवेश का सबसे सुरक्षित साधन है।

आर्थिक सुरक्षा का मसला

संगीता गुप्ता, चित्रकारकवयित्री

आभूषणों के प्रति स्त्रियों का आकर्षण तो होता ही है। यह भारत ही नहीं, दुनिया भर की स्त्रियों के संदर्भ में सच है। इसके पहला कारण तो मुझे स्त्री के सौंदर्यबोध से जुडा लगता है। आम तौर पर स्त्रियों को सजने-संवरने का शौक तो होता ही है। तो जैसे तरह-तरह के कपडों या श्रृंगार की कई और चीजों के प्रति उनका आकर्षण होता है, वैसे ही आभूषणों के प्रति भी होता है।

इसके अलावा यह सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा से भी जुडा हुआ प्रश्न है। खास तौर से हमारे भारतीय परिवेश में कहने को तो उसका हर जगह बराबर का अधिकार है, पर यह अधिकार सिर्फ कागजों में है। वास्तविकता यही है कि संपत्ति के अधिकार का कोई सार्थक उपयोग वह आज भी नहीं कर पाती हैं। स्त्री आज भी दोयम दर्जे की नागरिक है। हमारे ऋषि-मुनियों ने यह व्यवस्था तो दी कि पूजा-पाठ में स्त्री का साथ होना जरूरी है, लेकिन वह भी एक रस्म से ज्यादा कुछ नहीं है। ऐसी स्थिति में सामाजिक सुरक्षा की उसकी जो जरूरत है, उसे पुरुष कभी पूरा नहीं कर पाता है। जब किसी को रिश्तों में संतोष नहीं मिलता तो वह दूसरी चीजों में उसकी तलाश करती है। यह एक तरह का पलायन है। रिश्तों में सुख नहीं पाती है तो वह इन्हीं चीजों में सुख ढूंढती है।

संपत्ति के वास्तविक अधिकार से वंचित होने के कारण यह उसकी आर्थिक सुरक्षा से भी जुडा हुआ है। कोई और तो संपत्ति उसे मिलती नहीं है, तो इसे ही वह अपनी संपत्ति मानती है। यही ऐसी चीज है, जिसमें पुरुष का कुछ खास दखल नहीं होता है। निवेश का भी यह अच्छा माध्यम है। हालांकि आज की कामकाजी स्त्री के लिए इस कारण का कोई खास महत्व नहीं रह गया है। वह गहनों के बजाय रियल एस्टेट या शेयरों में निवेश ज्यादा उपयुक्त समझती है।

लेकिन भारत में ऐसी कितनी स्त्रियां हैं? ज्यादा से ज्यादा 10 प्रतिशत। 90 प्रतिशत स्त्रियां तो ऐसी ही हैं जो अभी भी 18वीं शताब्दी वाली स्थिति में ही जी रही हैं। इसलिए हमारे देश में स्त्री के लिए गहने आज भी महत्वपूर्ण हैं और वे हमेशा बने रहेंगे।

 

होता है आकर्षण

शेरॉन प्रभाकर, पॉप सिंगर

मेरे खयाल से अधिकतर भारतीय स्त्रियों का ज्यूलरी के प्रति बहुत ज्यादा आकर्षण होता है। हमारी परंपरा में ऐसा देखा जाता है कि आभूषणों के प्रति स्त्रियों ही नहीं, पुरुषों का भी बहुत आकर्षण रहा है। हमने शायद ही कभी कोई ऐसा चित्र देखा हो जिसमें भारतीय देवी-देवताओं ने आभूषण न पहने हों। आभूषणों के प्रति यह प्रेम या आकर्षण पीढी दर पीढी बढता ही गया है। मैं अपनी बात करूं तो मुझे ज्यूलरी बहुत पसंद नहीं है। मुझे उतनी ही ज्यूलरी पसंद है, जितनी मैं सहज ढंग से पहन सकती हूं। मुझे दीवानगी की हद तक ज्यूलरी के संग्रह का शौक नहीं है। मैं खास तौर पर ज्यूलरी खरीदती भी नहीं। मेरे पास चुनी हुई ज्यूलरी है, जिसे मैंने काफी जतन से संभाला है। उन्हें एथनिक ज्यूलरी कहा जा सकता है। यह ज्यूलरी ज्यादातर डायमंडस की है।

मुझे कट डायमंड ज्यूलरी अच्छी लगती है। दैनिक जीवन में गोल्ड चेन विद डायमंड पेंडेंट, डायमंड ईयर रिंग मैं पहनती हूं। मेरे पास चंद चोकर्स भी हैं, जो वाकई ज्यूलरी का बेमिसाल नमूना है। मुझे रूबी, सैफायर या कलर्ड स्टोंस से कोई खास लगाव नहीं है। मैं ज्यूलरी के मामले में खासी चूजी हूं। मेरी राय में हमें ज्यूलरी का सम्मान भी करना चाहिए। इस मामले में इसका अति लोभ करना कोई अच्छी बात नहीं है। मैं अकसर देखती हूं कि तमाम महिलाएं इमिटेशन ज्यूलरी की भी खरीदारी करती हैं। वे अक्सर फैशन कॉन्शस होती हैं। इस तरह की आर्टिफिशियल ज्यूलरी की खरीदारी में बहुत ज्यादा पैसा ब्लॉक नहीं होता। जहां तक सवाल ज्यूलरी के इनवेस्टमेंट वाले पक्ष को लेकर है, इस बारे में मैंने कभी बहुत गंभीरतापूर्वक सोचा नहीं है। मैं खुद इनवेस्टमेंट के लिए रियल इस्टेट और स्टॉक एक्सचेंज को ही सबसे अच्छा समझती हूं। खास तौर से स्टॉक एक्सेंचेज के तौर-तरीकों और इसकी व्यवस्था के बारे में अगर सही जानकारी हो तो इनवेस्टमेंट का इससे बेहतर विकल्प कोई और नहीं है।

अहमियत असली की ही

गुरप्रीत कोहली, टीवी कलाकार

स्त्रियां आभूषण क्यों पहनती हैं, इसकी ठीक-ठीक वजह बताना मुश्किल है। क्योंकि प्राचीन काल से अब तक हमेशा ही स्त्री की कल्पना से आभूषण का ख्याल आता है। आभूषण पहनकर कोई भी स्त्री सुंदर दिखती है। सोलह श्रृंगार की कल्पना भी स्त्रियों को लेकर ही की गई है। मुझे भी आभूषण अच्छे लगते हैं, परंतु वह पोशाक और अवसर के अनुसार होने चाहिए। मैं अधिकतर डायमंड के आभूषण पहनती हूं। खासकर असली जेवर मुझे अच्छे लगते हैं।

आजकल टीवी सीरियलों में भी ज्यूलरी का प्रयोग अधिक से अधिक किया जा रहा है। स्त्रियों में ज्यूलरी का क्रेज बढने का यह भी एक प्रमुख कारण है। लेकिन आर्टिफिशियल ज्यूलरी असली आभूषणों का स्थान नहीं ले सकती। मेरे हिसाब से अगर आभूषण खरीदना है तो असली जेवर ही खरीदे जाने चाहिए। भले ही वह छोटा हो पर उसकी अहमियत अधिक होती है। देखने वाले या आभूषणों की परख करने वाले को आसानी से पता चल जाता है कि जेवर असली है या नकली।

अगर आभूषण एक्सक्लूसिव हो तो उसकी अहमियत होती है कि इसे किसी डिजाइनर ने बनाया है, लेकिन उसकी डुप्लीकेट निकल जाने पर कोई मोल नहीं रह जाता। आजकल बाजारों में तो किसी के भी नाम का टैग लगाकर उसे ऊंचे दाम पर बेचा जाता है, जिसकी वैल्यू नहीं रहती। इसलिए इसे परखकर ही खर्च करना उचित होता है।

आभूषण पूरे विश्व में सभी स्त्रियां पसंद करती हैं। चाहे विदेशी स्त्री हो या भारतीय, गहने सभी को अच्छे लगते हैं। परंतु उसमें अंतर यह होता है कि भारतीय संस्कृति में भारी गहने, वह भी सोने के अधिक प्रचलित हैं। जबकि विदेशों में हलके और रत्नजडित गहनों का प्रयोग अधिक होता है। इसकी एक वजह यह भी है कि वहां का पहनावा हमारी संस्कृति से अलग है। इसलिए उनके आभूषणों का चुनाव भी अलग होता है। परंतु भारत के गहने विदेशों में भी काफी लोकप्रिय रहे हैं।

 

प्राचीन काल से है चलन

रागेश्वरी, गायिकाअभिनेत्री

आभूषणों का प्रयोग तो प्राचीन काल से ही होता आ रहा है। आभूषण केवल स्त्री ही नहीं, हमारे वेदों-पुराणों के अनुसार राजा-महाराजा और देवता तक पहनते रहे हैं। फिर भी आभूषणों की बात चलने पर नारी का ही खयाल सबसे पहले मस्तिष्क में आता है। यह सही भी है कि स्त्रियों को गहने ज्यादा आकर्षित करते हैं। इसकी वजह यह है कि आभूषण उनकी सुंदरता को और अधिक बढाते हैं। ये बात बचपन से ही लागू होती है क्योंकि बेटी को कंगन, कान की बाली आदि छोटे-छोटे जेवर बचपन से ही पहनाए जाते हैं। वैसे तो कई पुरुष भी गहने पहनते हैं। इनमें बप्पी लहरी और सलमान खान को देखा जा सकता है। पर उनके लिए कुछ सीमित प्रावधान हैं। इससे अधिक उन्हें पहनाया नहीं जा सकता। स्त्रियां कुछ भी पहन सकती हैं और सब उन्हें अच्छे लगते हैं।

अगर पैसा है तो असली जेवरों की जगह नकली जेवर नहीं ले सकते। लेकिन मुझे खुशी इस बात की है कि कई बार नकली जेवर असली के जैसे दिखते हैं और उन्हें कम पैसे वाली स्त्रियां भी खरीद सकती हैं। उन्हें अपने पोशाक के अनुसार पहन सकती हैं, जो पहले मुमकिन नहीं था। पहले केवल धनी स्त्रियां ही जेवर पहनती थीं। परंतु अब हर वर्ग की स्त्रियां इन्हें पहन सकती हैं। खुश रह सकती हैं। क्योंकि अगर एक महंगे सेट के पैसे से सात-आठ कम महंगे वाले सेट खरीदे जा सकते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। कभी-कभी मैं भी कोई चीज अगर एक्सक्लूसिव हो तो नकली भी खरीदती हूं। साधारणत: मुझे रत्न जडे हुए, खास तौर से हीरे वाले डेलीकेट आभूषण पसंद हैं। क्योंकि हमें आभूषण पहनना चाहिए, न कि आभूषण हमें पहनें। मैं अपने पास मोती के कट या कान की हीरे की बाली, जो मेरी मां ने मुझे दिया है, उसे अधिकतर पहनती हूं।

मेरी कुछ ऐसी फ्रेंड्स हैं जो ज्यूलरी की डिजाइनिंग पर खास ध्यान देती हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके जैसे जेवर सिर्फ उनके ही पास हों। वे कई बार कारीगर से डिजाइनिंग के पेपर तक ले लेती हैं। परंतु मुझे ऐसा नहीं लगता कि जो आभूषण मैं पहनूं, वह कोई और न पहने। अगर किसी और ने मेरी इस डिजाइन के गहने पहने हैं तो मुझे अपनी पसंद पर गर्व ही होता है कि मेरी पसंद किसी और व्यक्ति की भी पसंद है।

गहने हर देश की स्त्रियां पसंद करती हैं। भले ही कुछ स्त्रियां कहती हों कि उन्हें ज्यूलरी अधिक पसंद नहीं, पर अगर उन्हें उपहार में आभूषण मिलें तो खुश होती हैं। इसके अलावा भले ही वे उसे खरीदें भी न, पर कहीं प्रदर्शनी या मेले में जाना पसंद करती हैं। देखना पसंद करती हैं। भारत के गहने अब विदेशों में काफी लोकप्रिय हैं। आजकल ऑस्कर एवार्ड में आने वाली हीरोइनें या स्त्रियां काफी बडे-बडे गहने पहनती हैं। इस संदर्भ में चुटकुला दिलचस्प है। अलग-अलग वेष बदलने वाला एक चोर तभी पकडा गया जब वह बुरका पहन कर एक आभूषण की दुकान में घुसा और बिना जेवर देखे ही बाहर निकल गया। पुलिस ने तुरंत उसे पकड लिया कि यह स्त्री नहीं हो सकती।

संपत्ति भी हैं आभूषण

शहनाज हुसैन, ब्यूटीशियन एवं कॉस्मेटोलॉजिस्ट

आभूषण सिर्फ सौंदर्य के प्रतीक ही नहीं होते हैं, बल्कि आर्थिक सुरक्षा भी देते हैं। भारतीय स्त्रियों के लिए यह बहुत अहमियत रखते हैं। कुछ गहने तो सुहाग के प्रतीक होते हैं, जिन्हें पहनना उनके लिए निहायत जरूरी होता है। इसके अलावा आज भी भारतीय स्त्रियों का आकर्षण सोने-चांदी के आभूषणों की तरफ ज्यादा देखा जाता है। मैं तो यही मानती हूं कि लगभग सभी स्त्रियां सोने को आर्थिक रूप से धन संचय के लिहाज से खरीदती हैं। अब उसमें सौंदर्य को बढाना भी छिपा होता है। सुरक्षा की दृष्टि से भले ही अब वे आर्टीफिशयल ज्यूलरी पहनें लेकिन इनवेस्टमेंट खालिस सोने के आभूषणों पर ही करती हैं। मुझे खुद भी सोने के पारंपरिक आभूषण पसंद हैं। घरानों की बात करें तो अलग-अलग घरानों की ज्यूलरी भी अलग-अलग होती थी। बात चाहे निजाम के हीरों की करें, या फिर जयपुर घराने की खालिस सोने के बने संदूक और रानी हार की करें। आभूषण एक ऐसी संपत्ति हैं जो मुश्किल समय में काम आते हैं। प्राचीन काल में भी घर की स्त्रियां कर्ज उतारने या कोई नया काम कराने के लिए अपने जेवर बेचकर परिवार का सहयोग करती थीं। पहले तो गहने गिरवी रखकर लोग बडे-बडे काम करवा लेते थे। कुछ मिलाकर देखा जाए तो सोने, चांदी, रत्‍‌नजडित गहने स्त्री का धन रहे हैं, जो आज भी हैं। हां आजकल स्त्रियां डायमंड की तरफ ज्यादा ही आकर्षित हो रही हैं। ऐसा नहीं है कि पहले वे हीरा पसंद नहीं करती थीं। बल्कि हीरा इतना कीमती होता था कि हर किसी के बजट में आ नहीं पाता था और अब डायमंड के कई रूप बाजार में हैं। दस हजार का भी अमेरिकन डायमंड बाजार में मौजूद है और लोग खरीद भी रहे हैं। यह बात सच है कि ऐसे आभूषणों की कोई रीसेल वैल्यू नहीं होती। इसके बावजूद फैशनपरस्त स्त्रियां इनकी ओर आकर्षित हो रही हैं और ऐसे आभूषण खरीद भी रही हैं। हालांकि भारत में ग्रामीण स्त्रियां आज भी सोने और चांदी के गहनों के अलावा किसी और प्रकार के गहनों पर खर्च नहीं करती हैं।

ज्यूलरी की फैन

अभिनेत्रीमॉडल ऋषिता भट्ट

यह कहना कोई गलत नहीं होगा कि मैं ज्यूलरी की फैन हूं। मैं बार-बार ज्यूलरी खरीदती नहीं, पर इसके प्रति मेरा मोह तो लगा रहता है। अब इसमें भी मैं दूसरे टाइप में आती हूं। मुझे काफी हेवी ज्यूलरी सिर्फ देखने में ही अच्छी लगती है, उन्हें पहनना नहीं सुहाता। मेरी पर्सनल चॉइस है, सिंपल, लाइटर और वेअरेबेल ज्यूलरी। इसमें कोई दो राय नहीं है कि हम भारतीयों को आभूषणों से प्रेम है। भारतीयों का आभूषण प्रेम पूरी दुनिया में मशहूर है, मुझे तो लगता है, दुबई का सालाना गोल्ड फेस्टिवल भारतीयों के बलबूते पर ही ज्यादा चलता होगा।

मुझे रियल ज्यूलरी से ही प्रेम है। मुझे लगता है कि उसी ज्यूलरी को खरीदना बेहतर होता है, जिसकी रिटर्न वैल्यू होती है। महिलाएं ज्यूलरी की खरीदारी अधिक करती हैं। उसके प्रति उनका आकर्षण है, इसलिए करती होंगी। आर्थिक सुरक्षा का मुद्दा तो बाद में आता है। शायद ही कोई ऐसी भारतीय शादी होगी जिसमें ज्यूलरी का आदान-प्रदान न हुआ हो। आजकल की ज्यूलरी में इतनी वेरायटी आई है कि इतनी विविधता पिछले 50 वर्षो में नहीं आई होगी। एलीट क्लास की महिलाएं अपने परिधानों के अनुसार ज्यूलरी पहनना पसंद करती हैं। उनके लिए सेमी प्रेशियस स्टोंस की ज्यूलरी काफी लोकप्रिय हो चुकी है। मेरे शरीर को आर्टिफिशिल ज्यूलरी सूट नहीं करती। इसलिए मैं इसे पसंद करते हुए भी दूर ही रहती हूं। मैं गोल्ड और डायमंड की सिंपल ज्यूलरी पसंद करती हूं। उन्हें इस्तेमाल भी करती हूं। गोल्ड में मुझे तनिष्क और टिफनीज ब्रैंड्स काफी पसंद हैं। आजकल लोकप्रिय हो चुका व्हाइट गोल्ड मुझे पसंद है। मैं व्हाइट गोल्ड कीज्यूलरी पहनती हूं। सोने में निवेश भी हम भारतीय सदियों से करते आए हैं। पर इधर जिस तरह स्त्रियों का आर्थिक उदात्तीकरण हुआ है, वे खुद-ब-खुद यह समझने लगी हैं कि उन्हें आर्थिक सुरक्षा के लिए किन चीजों में निवेश करना अधिक फायदेमंद है। अब वे इसी हिसाब से ज्यूलरी खरीदना पसंद करती हैं।

फैशन स्टेटमेंट है

अभिनेत्रीदीया मिर्जा

पहनावा और ज्यूलरी सुंदरता को नया आयाम देते हैं। आभूषणों के प्रति स्त्रियों का आकर्षण और लगाव सदियों पुराना है। हर स्त्री किसी न किसी तरह की धातु खास तौर पर सोने के आभूषण पहनने की कामना रखती है। इसके पीछे न सिर्फ उसका आभूषण प्रेम होता है बल्कि यह उसकी आर्थिक संपन्नता का प्रतीक और बुरे दिनों में काम आने वाली जमा पूंजी भी होती है। हमारी बुजुर्ग दादी-नानी भी जो खालिस सोने और पर्ल के गहने पहनती थीं वह उनकी धरोहर और जमानत होती थी। गहनों के पीछे एक कंसेप्ट और भी होता है कि यह आपको जब उपहार में मिलते हैं उसके पीछे उससे जुडी यादें आपके साथ हमेशा रहती हैं। इनसे जुडी संवेदनाएं अलग ही होती हैं। मैंने भी सुना था कि जब बुजुर्ग लोग हमसे दूर चले जाते हैं तो उनकी कोई ज्यूलरी जितने भी घर में लोग होते थे उससे छोटा-छोटा कुछ बनवाकर आशीर्वाद के रूप में सबको बांट दिया जाता था। तो कहीं न कहीं गहनों के साथ स्त्री की संवेदना भी जुडी है। आज के दौर में अब यह जरूरी एक्सेसरीज बनते जा रहे हैं। डिजाइनर ज्यूलरी आज फैशन स्टेटमेंट होती है। इसे एक तरह का निवेश माना जा सकता है, पर उससे भी अधिक फैशन का पर्याय है। एक सदाबहार ज्यूलरी होती है जिसे आप हर उत्सव या पार्टी में पहन सकती हैं और एक कॉस्टयूम ज्यूलरी जो आपकी ड्रेस से मेल खाती होती है। ऐसा नहीं है कि कॉस्टयूम ज्यूलरी की कीमत नहीं होती। आधुनिक स्त्रियां उसे अधिक पहन रही हैं। जाहिर है वे आर्थिक सुरक्षा की दृष्टि से ज्यूलरी नहीं, बल्कि ट्रेंड और फैशन सिबंल बनने के लिए पहन रही हैं। अगर मैं अपनी बात करूं तो मैं ड्रेस और ज्यूलरी दोनों के मामले में काफी चूजी हूं। एक्सेसरीज कोई भी हो इस बात का ध्यान रखना जरूरी होता है कि वह आपको सूट करनी चाहिए। मुझे पारंपरिक ज्यूलरी पसंद है। इसके अलावा मुझे डायमंड ज्यूलरी बहुत पसंद है। मैं एक बात कहना चाहूंगी कि आज स्त्रियां भले ही कॉस्टयूम ज्यूलरी पसंद करती हों, लेकिन हर स्त्री के पास खालिस सोने और डायमंड के गहने भी जरूर होते हैं। ऐसे आभूषण वे सिर्फ घर के विशेष अवसरों पर ही पहनती देखी जाती हैं।

 

 

Read all Latest Post on खेल sports in Hindi at Khulasaa.in. Stay updated with us for Daily bollywood news, Interesting stories, Health Tips and Photo gallery in Hindi
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और ट्विटर पर ज्वॉइन करें