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कवि प्रदीप जिन्होंने अपने गीतों से लोगों को ऊर्जा दी

1931 के बाद वो दौर था जब भारत में स्वतंत्रता संग्राम का आंदोलन अपने चरम पर था. एक तरफ भगत सिंह और साथियों की शहादत के बाद लोगों ने भारत को आजाद कराने के लिए कमर कस ली थी. दूसरी तरफ लोगों का हौसला बुलंद करने का जिम्मा कई कवि निभा रहे थे.

उस समय तमाम कवियों के बीच एक और नाम लोगों की जुबान पर था. वह नाम था रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी. इन्होंने अपने देशभक्ति के गानों से लोगों को नई को ऊर्जा दी. इनको कवि प्रदीप के नाम से भी जाना जाता था. रामचंद्र द्विवेदी, कवि प्रदीप कैसे बने इसका भी एक दिलचस्प किस्सा है. यह किस्सा जानने से पहले इनके शुरुआती दिनों की बात करते हैं.

6 फरवरी 1915 को उज्जैन के बड़नगर में एक मध्यवर्गीय परिवार में रामचंद्र द्विवेदी का जन्म हुआ था. इनकी रुचि बचपन से ही कविताओं में थी. 1939 में लखनऊ यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन करने के बाद वे शिक्षक बनने की तैयारी करने लगे.

उसी दौरान कवि प्रदीप की जिंदगी में एक मोड़ आया और उनकी जिन्दगी बदल गई. दरअसल उसी दौरान उन्हें मुम्बई में एक कवि सम्मेलन में जाने का मौका मिला. इस कवि सम्मेलन में उनका परिचय बॉम्बे टॉकीज में काम करने वाले एक व्यक्ति से हुआ। वो कवि प्रदीप की कविताओं से काफी प्रभावित हुआ.

उस व्यक्ति ने बॉम्बे टॉकीज के संस्थापक हिमांशु राय को कवि प्रदीप के बारे में बताया और हिमांशु राय ने उनको बुलावा भेज दिया. बस फिर क्या था, हिमांशु राय कवि प्रदीप से इतने प्रभावित हुए कि उन्हें अपने स्टूडियो में 200 रुपए प्रति माह पर नौकरी पर रख लिया.

रामचंद्र नारायण द्विवेदी कैसे बने कवि प्रदीप

रामचंद्र नारायण द्विवेदी से कवि प्रदीप बनने का सफर भी बड़ा दिलचस्प था. रामचंद्र से प्रदीप वो हिमांशु राय के कहने पर बने. हिमांशु राय का सुझाव था कि इतना लंबा नाम होना फिल्मी जगत में ठीक नहीं है जिसके बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर प्रदीप रख लिया. लेकिन इसके बाद उनकी मुश्किलें और बढ़ गई.

दरअल उन दिनों अभिनेता प्रदीप भी काफी मशहूर थे और स्टूडियो में दो प्रदीप हो गए थे. अकसर डाकिया भी असमंजस में पड़ गलती कर बैठता और एक की डाक दूसरे को दे बैठता. इसी समस्या के हल के तौर पर प्रदीप ने अपने नाम के आगे कवि लगाना शुरू कर दिया और तब से वो कवि प्रदीप के नाम से जाने जाने लगे.

स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर लिया हिस्सा

कवि प्रदीप ने स्वतंत्रता संग्राम में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. उनका मानना था कि अगर लोगों में इर्ष्या- द्वेष ना होता तो अग्रेजों के गुलाम ना होते. चंद्रशेखर की शहादत पर भी कवि प्रदीप बदुत दुखी हुए.

कवि प्रदीप की जिंदगी के दो अहम पड़ाव

कवि प्रदीप की जिंदगी में दो बेहद अहम समय आए जो आज भी लोगों के जेहन में ताजा है. पहला समय था आजादी से पहले का जब 1943 में बॉम्बे टॉकीज की फिल्म 'किस्मत' रिलीज हुई. इस फिल्म में कवि प्रदीप ने एक गाना लिखा जिसकी वजह से उनके खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हो गया. यह गाना भारत छोड़ो आदोलन के समर्थन में माना जा रहा था जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे...

‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है दूर हटो ऐ दुनिया वालो, हिन्दुस्तान हमारा है’

ये गाना काफी मशहूर हुआ लेकिन ब्रिटिश सरकार को नागवार गुजरा. इस गाने के चलते कवि प्रदीप के खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट निकाल दिया गया. इसके बाद उन्हें काफी समय तक भूमिगत रहना पड़ा. लेकिन इस वारंट से बचने के लिए कवि प्रदीप ने जो तर्क दिया वो काफी मजेदार था. उन्होने कहा कि यह गाना अंग्रेजों के खिलाफ नहीं बल्कि उनके पक्ष में है. दरअसल इस गाने की आगे की लाइनें थी..

‘शुरू हुआ है जंग तुम्हारा जाग उठो हिन्दुस्तानी, तुम न किसी के आगे झुकना जर्मन हो या जापानी’

दुसरे विश्व युद्ध के दौरान 1942 में जब सिंगापुर और बर्मा लड़खड़ाने लगे तो भारत पर जापानी आक्रमण की संभावना और बढ़ गई. बस कवि प्रदीप ने इसी मुद्दे का फायदा उठाया. उन्होनें इस गाने की आगे की पंक्तियों से ब्रिटिश सरकार को ये मानने पर मजबूर कर दिया कि ये गाना उनके नहीं बल्कि जर्मनी और जापान जैसे शत्रु राष्ट्र के खिलाफ है. और इस तरह वो गिरफ्तार होने से बच गए.

इसके बाद कवि प्रदीप ने 'दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल' और 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं' जैसे कई देशभक्ति से भरे गाने गए. जो काफी लोकप्रिय भी हुए. इसके बाद कवि प्रदीप की कलम ने वो गीत लिखा जिसे सुनकर जवाहर लाल नेहरू की आंखें नम हो गई थी. वो गीत था 'ऐ मेरे वतन के लोगों' जो कवि प्रदीप ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद सैनिकों के लिए लिखा था.

इस गाने को 26 जनवरी 1963 में लता मंगेशकर ने दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में गाया. इस अवसर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन सहित सभी मंत्री और लगभग पूरी फिल्म इंडस्ट्री मौजूद थी. इस गाने को सुनकर सभी की आंखें नम थीं. पर हैरानी की बात ये थी कि इस अवसर पर कवि प्रदीप को आमंत्रित नहीं किया गया. हालांकि इस कार्यक्रम के तीन महीने बाद जवाहरलाल नेहरू कवि प्रदीप से मिले और उनकी अवाज में ये गाना भी सुना. इस बात की पुष्टि खुद कवि प्रदीप की बेटी मितुल ने बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में की.
इस गाने से जुड़ी कवि प्रदीप की एक और याद मितुल ने इस इंटरव्यू में साझा की. वो याद थी कवि प्रदीप की लड़ाई की जिससे शायद कई लोग अनजान थे. मितुल बताती हैं कि कवि प्रदीप ने ये गाना सैनिकों की विधवाओं के नाम कर दिया था ताकि इस गाने से होने वाली कमाई विधवाओं को मिले. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

कवि प्रदीप आजीवन पूछते रह गए कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को ये गाना बजाया जाता है तो इसकी कमाई सैनिकों की विधवाओं तक क्यों नहीं पहुंचती. इस पर न तो म्यूजिक कंपनी ने कोई जवाब दिया और ना ही आर्मी ने. बाद में मुंबई हाई कोर्ट ने 25 अगस्त 2005 में इस पर फैसला सुनाया और एचएमवी म्यूजिक कंपनी को विधवा कोष में 10 लाख जमा करने का आदेश दिया.

राज कपूर को दिया सहारा

कवि प्रदीप जाने-अनजाने राज कपूर को भी सहारा दे गए थे. राज कपूर के निर्देशन में बनी एक मात्र फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ उस समय बड़ी फ्लॉप साबित हुई थी. राज कपूर ने इस फिल्म पर काफी पैसा लगाया था. इस फिल्म के फ्लॉप होने से राज कपूर को बहुत बड़ा झटका लगा और वह दुखी रहने लगे.

ऐसे में उनके बुरे दिनों का सहारा बना कवि प्रदीप का एक गाना जिसके बोल थे 'कोई लाख करे चतुराई, करम का लेख मिटे ना भाई.. कवि प्रदीप का ये गाना ना सिर्फ उनका सहारा बना बल्कि इससे उन्हें मन को नियंत्रित करने की कला आ गई.

कवि प्रदीप ने अपने जीवन में 71 फिल्मों में 1700 गाने लिखे जिनमें देशभक्ति सहित धार्मिक गाने भी शामिल थे. इन गानों में से कई गाने कवि प्रदीप ने खुद भी गाए जो काफी लोकप्रिय हुए. इनमें 'आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की' आज भी लोगों की जुबान पर रहता है. कवि प्रदीप को 1998 में दादा साहब फालके पुरस्कार से सम्मानित किया गया. अपने गीतों से फिल्मी जगत का एक स्तर और बढ़ाने वाले कवि प्रदीप का 11 दिसंबर 1998 को निधन हो गया.

अनिल जनविजय जी  की फेसबुक  वॉल से साभार

वीडियो में देखिए कवि प्रदीप के गीत का वीडियो

 


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Title: kavi pardeep indian poet and songwriter who is best known for his patriotic song in Hindi  | In Category: आलेख bollywood article

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