Movie Review of Hindi Film Parmanu The Story of Pokharan

पिछले कुछ समय से आई देशभक्ति फिल्में जैसे राज़ी, अय्यारी या फिर नाम शबाना, जहाँ लोगों का ध्यान तो दूर की बात है, हल्का सा एटेंशन भी नहीं ले पायी, वहीं जब आप 1988 की परमाणु परिक्षण की सत्य घटना पर बनी फिल्म परमाणु देखकर सिनेमाघरों से बाहर निकलते हैं तो आप खुद को देशभक्ति के रंगों में रंगा हुआ पाते हैं। फिल्म 1998 की सत्य घटना पर आधारित है और निर्माता-निर्देशकों का दावा है कि इस मूल कहानी से कोई छेड़-छाड़ नहीं की है, हालाँकि फिल्म को थोडा आकर्षक बनाने के लिए थोड़े मसाले जरुर डाले गए हैं और उनकी मेहनत रंग भी लाती है, जिसका अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते है कि 2 घंटे 10 मिनट कब बीत जाते है आपको पता ही नहीं चलता और फिल्म खत्म होने के बाद आप अपने देश पर गर्व करने लगते हैं ।

फिल्म की कहानी वर्ष 1995 से शुरू होती है, जहाँ अनुसंधान और विश्लेषण विभाग का एक ईमानदार सिविल ऑफिसर अश्वत रैना प्रधानमंत्री के कार्यालय में भारत को न्यूक्लियर पावर बनाने की पेशकश करता है। हालाँकि पहले उसका मजाक उड़ाया जाता है, साथ ही साथ उसके आइडिये को भी उड़ा लिया जाता है। जैसा कि हम सभी जानते है कि चोरी का आईडिया और फल अभी मीठे नहीं होते, यहाँ भी वही होता है, हालाँकि इस घटना के बाद ऐसा माहोल खड़ा किया जाता है कि अश्वत को नौकरी से बर्खास्त भी कर दिया जाता है। अश्वत अपने परिवार के साथ मसूरी चला जाता है । 3 साल बाद ऐसे ही गुज़र जाते हैं । सरकार बदलती है और प्रधान मंत्री के प्रधान सचिव हिमांशु शुक्ला अश्वत को वापस बुलाकर एक सीक्रेट टीम गठित अपने इरादों को पूरा करने का जिम्मा देते हैं। इसके आगे क्या होता है, क्या अश्वत अपने इरादों में कामयाब होता है, यदि हां तो इसके लिए वो क्या करता है, यही फिल्म का क्लाइमेक्स है, जिसे देखने के लिए आपको सिनेमा घर की तरफ रुख करना होगा।

जॉन अब्राहम ने एक बार फिर साबित किया है कि वो एक अच्छे अभिनेता है यदि उन्हें अच्छे प्रोजेक्ट दिए जाए तो। इससे पहले भी जॉन दे दना दन में देशभक्ति करते हुए देखे गये है, हालाँकि इस बार वो सबका दिल छू जाते है और पूरी फिल्म का बोझ वो अपने कंधो पर लेकर चलते है। डायना पैंटी जितनी खुबसूरत है, उतनी ही अच्छी अदाकारा भी है। बोमन ईरानी हमेशा की तरह परफेक्ट हैं। मद्रास कैफ़े के बाद जॉन के हिस्से में एक फिल्म और ऐसी जुड़ गयी है जिसके लिए हमेशा जॉन को याद किया जायेगा।

फिल्म की एक बात और अच्छी है कि इसमें न तो कोई पाकिस्तान के नाम के नारे और न किसी अन्य देश को अपना दुश्मन दिखाने का प्रयास किया गया है, फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक देश अपनी ताकत बढ़ाने के लिए अन्य देशों पर हावी होने या दबदबा बनाने की कोशिश करता है, जो कि सत्य है।

 

Parmanu: The Story of Pokhran – Movie Review

 

 

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