October movie review in hindi

फिल्में 2 प्रकार की होती हैं, पहली वो जो मनोरंजन करती हैं, जिन्हें हम कुछ ही दिनों में भूल जाते हैं और दूसरी वो जो मनोरंजन भले ही न करे हमारे मगर अपनी थीम के कारण सदियों तक हमारे बीच बनी रहती हैं, शूजित सरकार निर्देशित अक्टूबर की श्रेणी दूसरे टाइप की है।  कभी कभी इंसान के जीवन की एक घटना मनुष्य को बदल कर रख देती है, इस फिल्म की भी यही थीम है, जिसे पर्दे पर दिखाने में सरकार जीत गए।  मद्रास कैफे, विकी डोनर और पीकू जैसी अलग विषयों पर फिल्म बना चुके शूजित यहाँ भी एक अलग और नया विषय लेकर आये हैं, एक अनकहे प्यार की दास्तान, जिसे सिर्फ दिल से महसूस किया जा सकता है, लफ्जों में बयां नहीं किया जा सकता।

फिल्म की कहानी दानिश वालिया उर्फ़ डैन की है, जो कि एक फाइव स्टार होटल में इंटर्नशिप कर रहा है, परन्तु वो अपने काम और स्टाफ के रवैये से खुश नहीं है। डैन का सपना रेस्तरां खोलने का है, परन्तु  उसके लिए उसे इंटर्नशिप करनी होगी, जिसके प्रति वो बेहद उदासीन है । फिल्म का दूसरा मुख्य पात्र है शिवली अय्यर, जो कि डैन की बैचमेट होने के साथ साथ मिजाज में भी डैन के एकदम विपरीत है । कही कही पर आपको लगेगा कि शिवली और डैन के बीच प्रेम है, परन्तु आप ऐसा होता पाएंगे नहीं। कहानी अपना रुख तब बदलती है जब उनके होटल में एक पार्टी होती है, जिसमे डैन के अलावा सब होते हैं । इस पार्टी में एक हादसा होता है, जिसका शिकार शिवली होती है । शिवली कोमा की गिरफ्त में चली जाती है, परन्तु कोमा की पकड़ मजबूत होने से पहले वो अपने साथियों से पूछती है कि डैन कहाँ है ? जब डैन को शिवली के बारे में पता चलता है तो उसके आगे कई सवाल आते हैं और साथ में उसके जीवन में बदलाव भी । वैसे भी फिल्म का अंत अन्य फिल्मों से एकदम अलग है, इसलिए आपने ऐसे अंत की उम्मीद भी नहीं की होगी। यदि आप जानना चाहते है तो जानने के लिए फिल्म देखे तो ज्यादा बेहतर होगा ।

1970 में आई फिल्म खामोशी, जिसका निर्देशन असित सेन ने किया था और मुख्य भूमिका में राजेश खन्ना और वहीदा रहमान थे। यदि आपने इस फिल्म को देखा है तो पाएंगे कि यह फिल्म भी एक अनकहे प्यार की दास्तान थी, जिसमे फिल्म का गीत “हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू”, जितना सटीक ख़ामोशी फिल्म के लिए था, उतना ही सटीक शूजित सरकार की अक्टूबर के लिए भी है। यह फिल्म भी एक अनकहे प्यार की दास्तान है। फिल्म की शुरुआत काफी धीमी है, परन्तु जब फिल्म रफ़्तार पकडती है तो आप इस फिल्म के किरदारों से खुद को जोड़ना शुरू कर देंगे। अविक मुखोपाध्याय की सिनेमटोग्राफी काबिलेतारीफ है ।

फिल्म में वरुण धवन का काम आपको तारीफ करने से रोक नहीं पायेगा, कही से ऐसा नहीं लगता कि ये वही वरुण है जिनकी कुछ समय पहले टपोरीछाप जुड़वाँ 2 आयी थी। बदलापुर के बाद एक बार फिर वरुण ने खुद को साबित किया है और इसी तरह की फिल्में उन्हें गोविंदा-सलमान स्टाइल से आगे ले जाकर वर्टी स्टाइल कलाकार संजीव कुमार की कैटेगरी में स्थापित करने का काम कर सकती है। बनिता संधू ने अपनी आँखों का इस्तेमाल बातें करने में जिस तरह से किया है उसे देखकर ऐसा लगता है कि यदि इन्होने सही फिल्मों का चयन किया तो जल्द ही बॉलीवुड को एक नयी स्मिता पाटिल मिल सकती है। कुल मिलाकर इतना ही कहा जा सकता है कि आप इस फिल्म को जरूर देखें।

 

Film Review of Varun Dhawan’s ‘October’

 

 

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