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निगेटिव किरदार के पीछे दरियादिल इन्सान थे प्राण

दमदार अभिनय की बात की जाए और प्राण का नाम न लिया जाए ऐसा तो हो ही नहीं सकता। हिन्दी फिल्मों के जाने माने एक्टर प्राण अपने अभिनय से हर किरदार में 'प्राण' डाल देते थे। ये प्राण के अभिनय का कमाल ही था कि वे पचास से सत्तर के दशक के बीच फिल्म इंडस्ट्री में अपने अभिनय का लोहा मनवाते रहे।

पुरानी दिल्ली के बल्लीमारन में हुआ जन्म

12 फरवरी, 1920 को पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके के एक संपन्न परिवार में जन्में प्राण का पूरा नाम प्राण कृष्ण सिकंद था, जिन्हें बचपन से ही अदाकारी का शौक था। उन्होंने मोहल्ले की रामलीला में एक बार सीता का किरदार निभाया था।

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पटकथा लेखक वली मोहम्मद ने दिया मौका

एक बार प्राण साहब की मुलाकात लाहौर के मशहूर पटकथा लेखक वली मोहम्मद से एक पान की दुकान पर हुयी तथा वली मोहम्मद ने प्राण को फिल्मों में काम करने का प्रस्ताव दिया। उस वक़्त प्राण ने इस प्रस्ताव पर ध्यान नही दिया लेकिन उनके बार-बार कहने पर प्राण मान गए।

1948 में आई जिद्दी में पहली बार किया विलेन का काम

प्राण ने लगभग 22 फिल्मों में बतौर मुख्य अभिनेता अभिनय किया, सफल भी हुईं लेकिन प्राण को लगता था मुख्य अभिनेता की बजाय खलनायक के रूप में फिल्म इंडस्ट्री में उनका भविष्य सुरक्षित रहेगा। फिल्म जिद्दी, जो वर्ष 1948 आयी थी, में बतौर खलनायक काम करने का मौका मिला । इस फिल्म के बाद प्राण ने पलट कर कभी नही देखा। प्राण एकलौते ऐसे कलाकार है जिन्होंने कपूर खानदान की हर पीढ़ी के साथ काम किया है ।

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2001  में मिला पद्मभूषण

50 के दशक में प्राण की अपनी फुटबॉल टीम 'डायनॉमोस फुटबॉल क्लब' भी उन्ही की तरह काफी लोकप्रिय रही है। प्राण साहब को साल 2001 में भारत सरकार ने कला क्षेत्र में पद्मभूषण से सम्मानित किया। फिल्म 'उपकार' (1967), 'आंसू बन गए फूल' (1969) और 'बेईमान' (1972) के लिए प्राण को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार तथा 1997 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफ टाइम अचीवमेंट खिताब से भी नवाजा गया। साल 2013 में उन्हें फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान दादा साहेब फाल्के सम्मान प्रदान किया गया।

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अच्छे कलाकार के साथ दरियादिल शख्सियत

फिल्मी पर्दे पर नेगेटिव छवि वाले इस इंसान के पीछे एक दरियादिल इन्सान रहता था, ये बात बहुत ही कम लोग जानते है । कहा जाता है कि साल 1972 में प्राण साहब ने फ़िल्म 'बेइमान' के लिए मिले बेस्ट सपोर्टिग का फिल्मफेयर अवार्ड लौटा दिया था, क्योंकि फ़िल्म 'पाकीजा' को एक भी पुरस्कार नहीं मिला था, ऐसे अभिनेता आज के समय में दुर्लभ है।

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बॉबी में अभिनय के लिए सिर्फ एक रुपया

फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ की असफलता के बाद शो-मैन राज कपूर अपनी आगामी फिल्म ‘बॉबी’ में प्राण को लेना चाहते थे, परन्तु उन दिनों बॉलीवुड में प्राण सर्वाधिक पैसे लेने वाले कलाकारों में से एक थे। मेरा नाम जोकर की विफलता ने राज कपूर की आर्थिक हालत को प्रभावित किया था, इसलिए वह चाहकर भी प्राण को अपनी फिल्म के लिए अप्रोच नहीं कर पा रहे थे। जब ये बात प्राण को पता चली, उन्होंने राज कपूर की 'बॉबी' में काम करने के लिए हामी भर दी और पारिश्रमिक के रूप में सिर्फ एक रुपया शगुन के  तौर पर लिया। प्राण की सिफारिश पर ही प्रकाश मेहरा ने अमिताभ को ‘जंजीर’ के लिए साइन किया था और इस फिल्म ने अमिताभ को सदी के महानायक के तौर पर स्थापित कर दिया।

 

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वीडियो में देखिए महानायक प्राण की बायोग्राॅफी

 

 

 

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