• अलग अलग देशों से आए करीब एक लाख से अधिक पक्षियों ने डाला है चंबल सेंचुरी में डेरा

  • चंबल सेंचुरी करीब 425 किलोमीटर क्षेत्र में फैला है जहां हर वर्ष विदशों से पक्षी आते हैं

  • दशकों तक चंबल को डाकूओं की शरणस्थली के तौर पर जाना और पहचाना जाता रहा है  

इटावा, 19 नवंबर (एजेंसी)। वैश्विक महामारी कोविड-19 से बेपरवाह मीलों लम्बा सफर तय करके आये प्रवासी पक्षियों ने चंबल की हसीन वादियों में अपना डेरा जमाना शुरू कर दिया है। बार हैडेड गीज, ग्रे लेग गीज, पिनटेल, शालवर, स्पाटबिल, ब्रहमनीडक, स्पूनबिल, मर्गेजर, वेडर, गार्गेनी, पेनीकल, पाइड, एवोसिट, रिवर टर्न, सीगल, प्रेटीन कोल जैसे दुलर्भ प्रजाति के पंक्षियों की मौजूदगी प्रकृति प्रेमियों को गदगद कर रही है।

एक अनुमान के मुताबिक कम से कम पूरी की पूरी चंबल मे कम से कम एक लाख के आसपास प्रवासी पक्षी चंबल पहुंच हुए है। चंबल सेंचुरी के डीएफओ दिवाकर श्रीवास्तव ने बताया कि नवंबर से ही पक्षियों के आने की शुरुआत एक अच्छा संकेत है। सेंचुरी में अफगानिस्तान, पाकिस्तान, श्रीलंका तथा म्यांमार से विदेशी पक्षी आ रहे हैं। इनकी उचित देखभाल की व्यवस्था की गई है। ऐसे इंतजाम किए गए हैं कि इन्हें कोई परेशानी न हो। कैसे जलते-बुझते हैं जुगनू…| Why do fireflies glow at night in hindi

राष्ट्रीय चंबल सेंचुरी की वादियों में विदेशी पक्षियों का करलव गूंज रहा है। 425 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैली इस सेंचुरी में प्रवासी पक्षियों के आने का सिलसिला शुरू हो गया है। अब हवासीर (पेलिकन), राजहंस (फ्लेमिंगो), समन (बार हेडेटबूल) जैसे विदेशी पक्षी चार महीने मार्च तक यहीं डेरा जमाए रहेंगे। इन आकर्षक पक्षियों को देखने वालों की तादात भी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। दशकों तक चंबल को डाकूओं की शरणस्थली के तौर पर जाना और पहचाना जाता रहा है लेकिन चंबल में दूरस्थ से आने वाले हजारों प्रवासी पक्षियों ने चंबल की छवि को बदल दिया है।

चंबल सेंचुरी का महत्व सर्दी के मौसम में अपने आप ही बढ़ जाता है क्योंकि चंबल सेंचुरी में कई लाख प्रवासी पक्षी सर्दी के मौसम में सालों दर साल से आ रहे है। दुर्लभ जलचरों के सबसे बड़े संरक्षण स्थल के रूप में अपनी अलग पहचान बनाये चंबल सेंचुरी को इटावा आने वाले पर्यटक देख पाने में कामयाब होगे। चंबल सेंचुरी से जुड़े बड़े अफसर ऐसा मान करके चल रहे हैं कि तीन राज्यों में फैली चंबल सेंचुरी का महत्व इतना है कि चंबल सेंचुरी में डाल्फिन, घड़ियाल, मगर और कई प्रजाति के कछुए तो हमेशा रहते ही साथ ही कई ‘माईग्रेटी बर्ड’ भी साल भर रह करके चंबल की खूबसूरती को चार चाँद लगाती रहती है।

कश्मीर में ये पक्षी ज्यादातर चीन, यूरोप और सेंट्रल एशिया से आते हैं। पक्षियों का कलरव रोमांचित करने के साथ उर्जा देने वाला होता है और यदि यह कलरव चंबल सेंचुरी के अलावा आसपास के इलाकों में भी प्रवासी पक्षियों की अठखेलियां मन को खूब भा रही है। यहां प्रवासी पक्षी बरबस पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर खींच लेते हैं। इन स्थलों पर प्रवासी पक्षियों का डेरा सुंदरता व दृश्य को और भी मनोरम बना देता है।

सोसायटी फॉर कंजरवेशन आफ नेचर के महासचिव डा.राजीव चैहान ने आशा जताई कि इस बार चंबल में प्रवासी पक्षियों की संख्या में काफी वृद्धि होने की संभावना है। उन्होंने बताया कि इस बार अब तक प्रवासी पक्षियों में कामनटील, नार्दन शिवेलर, ग्रेट कारमोरेंट, पोचार्ड आदि दर्जनों प्रजातियों के सुंदर संवेदनशील पक्षी यहां पहुंच चुके हैं। इसके अलावा इटावा के छोटे-छोटे वेटलैंडों के अलावा खेत खलिहानों व यमुना क्वारी, सिंधु जैसी नदियों में भी प्रवासी पक्षियों के झुंड आकर्षण बने हुए हैं।

चंबल सहसों सेतु, डिभौली सेतु, पचनदा, बाबा सिद्धनाथ मंदिर आदि घाटों पर इन प्रवासी मेहमानों ने डेरा जमा रखा है। चंबल क्षेत्र में भरेह तथा यमुना क्षेत्र में कसौआ इन प्रवासी पक्षियों के आने के प्रमुख स्थान हैं। हालांकि पूरे चम्बल क्षेत्र में प्रवासी पक्षी आते जाते हैं लेकिन इन दो स्थानों पर ज्यादा संख्या में प्रवासी प्रक्षियों को देखा जा सकता है। चंबल में भरेह तथा यमुना क्षेत्र में कसौआ इन प्रवासी पक्षियों के आने के प्रमुख स्थान हैं। कौन थे बाबा जय गुरुदेव (Jai GuruDev)

हालांकि पूरे चंबल में प्रवासी पक्षी आते-जाते हैं,लेकिन इन दो स्थानों पर ज्यादा संख्या में प्रवासी प्रक्षियों डेरा रहता है। यहां आने वाले पक्षियों में ब्रामनीडक को सबसे ज्यादा खूबसूरत माना जाता है। इसे अपने देश की भाषा में सुरखाव भी माना जाता है। इसके अलावा लार्ज कारमोरेन, स्माॅल कारमोरेन और डायटर (स्नेक वर्ड) आकर्षण का केंद्र बने हैं।

 

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