• रविवार सुबह से सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहा है हनुमान अकेला ही काफी है
  • बेनीवाल के राजनीति में प्रवेश करने के समय कांग्रेस व भाजपा उन्हें अपने साथ जोडऩे को बेताब थी

जयपुर। केन्द्रीय कृषि कानूनों के खिलाफ एनडीए गठबंधन से अलग होने का ऐलान करने के बाद राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के इकलौते सांसद हनुमान बेनीवाल रविवार सुबह से ही सोशल मीडिया पर छाए रहे। सोशल मीडिया पर हनुमान अकेला ही काफी है ट्वीट से शेयर की गई पोस्ट लगातार ट्रेंड हो रही है। इसे यूजर्स हजारों बार शेयर कर चुके हैं। यूजर्स इससे जुडक़र भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार के साथ उनकी किसान विरोधी नीतियों की निंदा कर रहे हैं।

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बेनीवाल ने रविवार सवेरे ट्वीट किया कि राजस्थान का किसान भी देश के किसान आन्दोलन में साथ खड़ा है, किसान का मान और सम्मान ही हमारी सबसे बड़ी पूंजी है! जब हम किसान की बात करते है तो किसान के सम्मान की बात पहले होनी चाहिए। राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष चुने जाने से लेकर बेनीवाल ने अपने आक्रामक तेवर के दम पर शुरू से ही अलग छवि बनानी शुरू कर दी थी। राजनीति में प्रवेश करने के समय तक उनके गृह जिले नागौर में नाथूराम मिर्धा व रामनिवास मिर्धा का अवसान हो चुका था। नागौर ने हमेशा से दबंग नेता का साथ दिया, चाहे वह किसी पार्टी का हो। नागौर की राजनीति में बरसों तक एकछत्र राज करने वाले नाथूराम मिर्धा की छवि मतदाताओं को हनुमान बेनीवाल में नजर आई।

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बेनीवाल के राजनीति में प्रवेश करने के समय कांग्रेस व भाजपा उन्हें अपने साथ जोडऩे को बेताब थी। नाथूराम मिर्धा के निधन के बाद उत्तर भारत में कांग्रेस का सबसे मजबूत गढ़ नागौर ढहने के कगार पर था। वर्ष 1977 की जनता लहर में जब इंदिरा व संजय गांधी जैसे नेता भी चुनाव हार गए थे, तब एकमात्र नागौर के लोगों ने नाथूराम मिर्धा को संसद में भेज कांग्रेस की लाज रखी थी। नागौर में पांव जमाने की फिराक में जुटी भाजपा को एक प्रभावशाली नेता की दरकार थी। आखिरकार हनुमान ने भाजपा के साथ जाने का फैसला किया और खींवसर से विधायक चुने गए।

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भाजपा में जाने के बावजूद विधानसभा से लेकर बाहर तक बेनीवाल तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के मुखर आलोचक के रूप में उभरे। इस दौरान दोनों के बीच भाषा की मर्यादा को लेकर कटुता काफी बढ़ गई और पार्टी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। नागौर की राजनीति में मिर्धा परिवार का विरोध कर अपनी छवि बनाने वाले हनुमान पर कांग्रेस ने भी काफी डोरे डाले, लेकिन मिर्धा परिवार से व्यक्तिगत अनबन के कारण उन्होंने कांग्रेस में जाना उचित नहीं समझा।

 

 

 

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