• संक्रमण को रोकने के उद्देश्य से लक्ष्मी गेट को बंद किया गया

  • इतिहास में ये तीसरा मौका था जब इस गेट को बंद किया गया

  • 1857 की क्रांति के दौरान सर्वप्रथम इस गेट को बंद किया गया था

झांसी, 29 अप्रैल (एजेंसी)। कोरोना संक्रमण को रोकने के उद्देश्य से राज्य व उनके जिले काफी सतर्क हो चुके है जिसके चलते बुंदेलखंड की हृदयस्थली वीरांगना नगरी झांसी में इसका असर देखने को मिला, जहाँ एक बार फिर लक्ष्मी गेट को बंद किया गया है । बताया जा रहा है रानी लक्ष्मीबाई के समय से ये तीसरी बार ऐसा मौका था जब लक्ष्मी गेट को बंद किया गया है । लॉकडाउन के दूसरे चरण के 13वें दिन ओरछा गेट इलाके में संक्रमित महिला के मिलने के बाद इस इलाके को पूरी तरह सील कर देने के साथ साथ प्रशासन ने शहर के अन्य क्षेत्रों में संक्रमण रोकने के उद्देश्य से ऐतिहासिक लक्ष्मीगेट के दोनों दरवाजों को पूरी तरह बंद करवा दिया है । साजोसामान मुहैया कराने की प्रक्रिया के उद्देश्य से सागर गेट का एक ही दरवाजा बंद किया गया है जबकि लोगों की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए प्रभावित क्षेत्र में गैर जरूरी आवाजाही पर पूरी तरह से रोक लगा दी गयी है ।

कोरोना महामारी ने एक ओर पूरी दुनिया में मौत का कहर तो बरपाया है साथ ही मानवजाति को कई सबक भी सिखाये हैं इन्हीं में एक बड़ा सबक है अपनी पुरानी धरोहरों को संजोकर और संभालकर रखना बेहद जरूरी है। यह सबक झांसी की जनता और प्रशासन को भी इस महामारी ने सिखाया है। किले और किले के चारों ओर बने परकोटे में बने दस दरवाजों और 12 खिड़कियों को दुश्मनों से अपने लोगों की रक्षा के लिए बनाया गया था और निर्माण काल से ही इन संरचाओं ने अपने महत्व को साबित भी किया है।

सबसे पहले 1857 में झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों से अपने लोगों की रक्षा के लिए किले में बने इन दरवाजों और खिडकियों को बंद करने का फैसला किया था और इसी के तहत लक्ष्मीगेट भी बंद किया गया था। उसके बाद क्षेत्र में पनपी बिजली की जबरदस्त समस्या से निजात पाने के लिए आंदोलनकारियों ने लक्ष्मी गेट को बंद किया था और आज कोरोना महामारी की शहर में दस्तक देने के बाद ज्यादा से ज्यादा लोगों को एक क्षेत्र विशेष में पनपे संक्रमण के खतरे से बचाने के लिए इस ऐतिहासिक गेट को बंद करने का फैसला किया गया है।

इन तीनों उदाहरणों से साफ है कि जब भी नगर पर संकट के बादल मंडराये हैं तो दुश्मन चाहें वह अंग्रेजों जैसे प्रत्यक्ष हो या फिर कोरोना जैसा अप्रत्यक्ष से अपने लोगों को बचाने के लिए शहर की सुरक्षा के मजबूत प्रहरी रहे इन दरवाजो और खिड़कियों ने अपनी प्रासंगिकता साबित की है लेकिन आधुनिकता की ओर अंधी दौड़ में कहीं न कहीं शासन,प्रशासन और लोग भी अपनी इन धरोहरों का महत्व भूलते जा रहे थे। इसी कारण किले का परकोटा अतिक्रमण की मार झेलते हुए अपने अस्तित्व को निरंतर खोता जा रहा है इसी तरह दस दरवाजे लक्ष्मी गेट, दतिया गेट, ओरछा गेट, सैंयर गेट, दतिया गेट, झरना गेट,बडागांव गेट, भांडेरी गेट, सागर गेट, उन्नाव गेट और खिड़कियां गनपत खिड़की, सूजेखां की खिड़की, सागर खिड़की, पचकुईयां खिड़की, बिलैया खिड़की,अलीगोल खिड़की और भैंरो खिड़की सहित बारह खिड़कियां भी जर्जर और क्षतिग्रस्त हालत में हैं। पहले नगरपालिका और अब नगरनिगम की अनदेखी इन ऐतहासिक धरोहरों को नष्ट होने की कगार पर पहुंचा रही है।

इन बेजान संरचनाओं ने नगरवासियों के लिए अपने दायित्व को हमेशा निभाया है और आज जब नगर पर कोरोना संकट के बादल मंडराये हैं तो भी इन्हीं दरवाजों में से लक्ष्मी गेट जो अन्य गेटों की तुलना में आज भी काफी अच्छी स्थिति में है और सागर गेट लोगों की सुरक्षा के दायित्व को पूरी मजबूती से निभाता सामने आये हैं। कोरोना संकट ने प्रशासन और लोगों को यह अच्छी तरह समझाया है कि हमारे पूर्वजों ने जो चीजें सुरक्षा के लिए बनायीं वह आज भी संकटकाल में उतनी ही प्रासंगिक हैं। इनको संभालना और संरक्षित करना शासन और प्रशासन के साथ साथ हर नागरिक का कर्तव्य है।

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