•  मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जब हम जल की बात करते हैं तो हमें इसके दोनों रूपों को ध्यान में रखना होगा
  • पहला ग्राउंड वॉटर, जिसका उचित संरक्षण व नियोजन आवश्यक है
  • जब देव शांति, पृथ्वी शांति की बात होती है तो इसका जिक्र होता है

लखनऊ। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि जब हम जल की बात करते हैं तो हमें इसके दोनों रूपों को ध्यान में रखना होगा। पहला ग्राउंड वॉटर, जिसका उचित संरक्षण व नियोजन आवश्यक है। दूसरा सरफेस वॉटर, जिसके लिए हमें अपनी पवित्र नदियों, ताल-तालाबों की स्वच्छता को बनाए रखना है। उन्होंने शनिवार को एक जल गोष्ठी कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि जल के इस महत्व को समझते हुए हमारे शास्त्रों ने जो स्त्रोत, मंत्र लिखे हैं, वह जल की स्तुति के साथ ही प्रारंभ किए हैं।

जब देव शांति, पृथ्वी शांति की बात होती है तो इसका जिक्र होता है। उन्होंने कहा कि मानवता,प्राणी मात्र के कल्याण के लिए जल संरक्षण आवश्यक है। इस दृष्टि से भारतीय ऋषि परम्परा इस बात पर जोर देते रही है। उन्होंने कहा कि वहीं इस सम्बन्ध में ईमानदारी के साथ इसके बहुआयामी पक्ष को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम प्रारंभ किए गए हैं। इनमें पिछले छह वर्षों के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश के अंदर जिस प्रकार के कार्यक्रम प्रारंभ हुए उनमें नमामि गंगे परियोजना देश की पवित्र नदियों की अविरलता, निर्मलता को बनाए रखने वाली है।

इस अभियान की शुरुआत गंगा और उसकी पवित्र नदियों से होती है। लेकिन यह भारत की नदी संस्कृति के पुनरुद्धार का एक नया कदम है।  मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को अपने वाराणसी दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि इस दौरान उन्होंने महसूस किया कि पांच, सात वर्ष पहले जहां गंगा में डुबकी लगाने के कुछ ही देर में पूरे शरीर में लाल लाल चकत्ते पड़ जाते थे। जलीय जीव समाप्त हो चुके थे, वहीं कल उन्होंने डॉल्फिन को वहां देखा। मुख्यमंत्री ने कहा कि यह वाराणसी की स्थिति है।

गंगोत्री से लेकर गंगासागर तक गंगा की लगभग ढाई हजार किलोमीटर के दायरे में जो सबसे क्रिटिकल प्वाइंट कानपुर था। कानपुर के जाजमऊ में आज से तीन वर्ष पहले कोई भी जलीय जीव नहीं बचा था। 2019 में जब कुम्भ को दुनिया के ‘यूनिक इवेंट’ के रूप में प्रस्तुत करके कुम्भ को वैश्विक मानचित्र पर प्रस्तुत करने का प्रधानमंत्री मोदी ने मार्गदर्शन दिया, तो हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि कुम्भ में गंगा की अमृता निर्मलता वहां देखनी भी चाहिए।

प्रयागराज आने वाले श्रद्धालुओं के मन में इसका विश्वास होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके लिए नमामि गंगे परियोजना के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर जो कार्य प्रारंभ किए उसका परिणाम देखने को मिला कि दशकों के बाद संतों, श्रद्धालुओं और कुम्भ में आने वाले सभी लोग इस आयोजन में भागीदार बने थे। उन्होंने इस आस्था को सम्मान देते हुए देखा कि वास्तव में गंगा अविरल और निर्मल हुई है।

प्रयागराज कुम्भ एक अपने आप में इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा आयोजन बना। उन्होंने कहा कि जाजमऊ में फिर से मछलियां और जलीय जीव देखने को मिल सकते हैं। सीसामऊ नाले में 14 करोड़ लीटर सीवर प्रतिदिन गिरता था। जब विगत वर्ष प्रधानमंत्री ने नमामि गंगे परियोजना की राष्ट्रीय परिषद की बैठक कानपुर में ली, तो उस समय हम लोगों ने स्वयं उस नाले के मुहाने पर खड़े होकर सेल्फी लेकर सबके सामने इस बात को प्रदर्शित किया कि  कि गंगा में एक भी बूंद सीवर का पानी नहीं गिरेगा।

यह बात एक नदी संस्कृति की अविरलता और निर्मलता के प्रति केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इसी प्रकार से हर प्रकार की नदियों के पुनरुद्धार का काम किया जा रहा है। प्रदेश के अंदर गोमती नदी अपने मुहाने पर सूख चुकी थी। लखनऊ में गोमती नदी में लगभग 36 किलोमीटर तक का कार्य मनरेगा के अंतर्गत एवं शासन की अन्य योजनाओं के माध्यम से किया गया, इन कार्यों के चलते ही आज गोमती नदी की अविरल धारा प्रवाहित हो रही है। उन्होंने कहा कि इस प्रकार लगभग 15 से ज्यादा नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए प्रदेश के अंदर शासन की कन्वर्जन स्कीम लागू की गई।

इनके माध्यम से नदी संस्कृति को पुनर्जीवित करने का कार्य तो हो ही रहा है। जितने बड़े ताल, तलैया, पोखर हैं, इन सब के संरक्षण का कार्य तो करेंगे ही साथ ही हम ग्राउंड वाटर की शुद्धि और उसके उचित नियोजन पर भी ध्यान देंगे। मुख्यमंत्री ने कहा इसके लिए प्लास्टिक मुक्त अभियान प्रदेश में चला गया। प्लास्टिक को प्रतिबंधित किया गया।

प्रदेश के अंदर माटी कला बोर्ड कार्य करता है। इसके गठन के पीछे का उद्देश्य था कि यदि हम प्लास्टिक को प्रतिबंधित कर रहे हैं तो उसका कोई विकल्प उपलब्ध कराए जाए। इससे लोग स्वयं इसके प्रति आकर्षित होंगे। उन्होंने कहा इसके लिए व्यवस्था शहरों, गांवों में जितने भी तालाब हैं, वहां अप्रैल से जून के मध्य के बाद कुम्हारों को नि:शुल्क मिट्टी उपल्बध कराई गई।

इलेक्ट्रिक चाक हर कुम्हार को उपलब्ध कराए गए तो उसने बर्तन भी सस्ते बनाने प्रारंभ किए और प्लास्टिक का एक विकल्प देना प्रारंभ किया। प्लास्टिक प्रतिबंध होने से पर्यावरण की रक्षा हुई। मिट्टी के बर्तन बनने से हमारे तालाब साफ-सुथरे हुए। इसके साथ ही जल संरक्षण के लिए फिर से ताल-तलैया मिलना हम लोगों प्रारंभ हुए। जल संरक्षण का एक उदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ।

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