• कांग्रेस से विदाई लेने से पहले भी सिंधिया ने ट्विटर अकाउंट से कांग्रेस शब्द हटाया था

  • सिंधिया ने ट्विटर अकाउंट में बीजेपी हटाकर पब्लिक सर्वेंट लिखा

  • उपचुनाव से पहले सिंधिया द्वारा बड़े राजनीतिक फैसला लेने का अंदेशा

भोपाल, 07 जून (एजेंसी)। हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया के ट्विटर अकाउंट से बीजेपी शब्द को हटाने पर खूब बवाल मचा था, जिसके बारे में सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने अपने ट्विटर प्रोफाइल में कोई बदलाव नहीं किया है, ऐसे में इस बारे मीडिया में जो भी खबरें चल रही है उनमे कोई सच्चाई नहीं है। मध्य प्रदेश की राजनीति में इस बात को लेकर काफी चर्चाएँ जोर पर है, क्योंकि कांग्रेस से विदाई लेने से पहले भी उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट से कांग्रेस शब्द को हटा लिया था। इस मामले में सिंधिया ने फेसबुक पेज पर इस बारे में बयान जारी करते हुए इस अफवाहों के लिए कांग्रेस को जिम्मेदार बताया है, साथ ही उन्होंने कहा कि कांग्रेस मेरी चिंता न करे। मैं राजनीतिक लाभ, पद या महत्वाकांक्षा के लिए बीजेपी में शामिल नहीं हुआ हूं।

सिंधिया ने ट्विटर अकाउंट में बीजेपी हटाकर पब्लिक सर्वेंट लिखा

सिंधिया की ओर से उनके प्रतिनिधि कृष्णा राठौर ने भी सोशल मीडिया पर इस बारे में स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने बताया है कि महाराज के ट्विटर प्रोफाइल में कोई बदलाव अभी नहीं किया गया। उन्होंने अपने प्रोफाइल में कभी बीजेपी जोड़ा नहीं था, इसलिए उसे हटाने का कोई सवाल नहीं उठता। इससे पहले शुक्रवार शाम को प्रदेश की राजनीति में अचानक भूचाल आ गया जब सिंधिया के प्रोफाइल से बीजेपी हटाने की खबरें आईं। इनमें बताया गया था कि प्रोफाइल में पहले बीजेपी लिखा था, जिसे बदलकर पब्लिक सर्वेंट कर दिया गया है। इसको लेकर रहस्य गहरा हो रहा था, लेकिन सिंधिया की ओर से आई सफाई के बाद चर्चाओं को विराम लग गया है।

उपचुनाव से पहले सिंधिया द्वारा बड़े राजनीतिक फैसला लेने का अंदेशा

अटकलों का दौर शुरू होने के पीछे दो बड़ी वजहें थीं। पहली बीजेपी आलाकमान द्वारा सिंधिया से किए वादों की अनदेखी और कांग्रेस छोड़ने से पहले सिंधिया के प्रोफाइल में बदलाव। सिंधिया के साथ गए 22 पूर्व विधायकों को प्रदेश कैबिनेट में शामिल करने का वादा अब तक पूरा नहीं हुआ। मंत्रिमंडल विस्तार की अटकलें कई बार लगीं, लेकिन आंतरिक खींचतान में शपथ ग्रहण अब तक नहीं हुआ। सिंधिया को केंद्रीय कैबिनेट में शामिल करने की बातें भी अब कमजोर पड़ने लगी हैं जबकि विधानसभा उपचुनाव में उनके समर्थक विधायकों को टिकट मिलने में भी दिक्कतों की खबरें आ रही हैं। ऐसे में कयास लगने लगे थे कि कहीं उपचुनाव से पहले सिंधिया फिर कोई बड़ा राजनीतिक फैसला तो नहीं लेने जा रहे।

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