• रंजन गोगोई का जन्म 18 नवंबर 1954 को असम में हुआ था
  • उन्होंने 1978 में बतौर एडवोकेट अपने कार्यकाल की शुरुआत की थी
  • राफेल डील की जांच के लिए दाखिल रिव्यू पिटिशन को तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ ने खारिज कर दिया था

नई दिल्‍ली, 17 मार्च (एजेंसी)। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनित किया है। केंद्र सरकार ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया और गृह मंत्रालय ने सोमवार को इस आशय की अधिसूचना जारी की। जारी अधिसूचना के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 80 के खंड (1) के उपखंड (ए) और इसी अनुच्छेद के खंड (3) के तहत राष्ट्रपति राज्यसभा के नामित सदस्यों में से एक के रिटायरमेंट की वजह से रिक्त हुई सीट पर रंजन गोगोई को नामित करते हैं।’ यह सीट केटीएस तुलसी के रिटायरमेंट की वजह से रिक्त हुई है।

 

ऐतिहासिक फैसले और बेदाग छवि

मालूम हो कि गोगोई सुप्रीम कोर्ट की उस पांच सदस्यीय पीठ के अध्यक्ष थे जिसने पिछले साल नौ नंवबर को संवेदनशील अयोध्या विवाद पर फैसला सुनाया था। बाद में वह उसी महीने रिटायर हो गए थे। यह इतिहास में दूसरी सबसे लंबी सुनवाई रही थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की उन पीठों की भी अध्यक्षता की थी जिन्होंने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और राफेल लड़ाकू विमान सौदे जैसे मसलों पर फैसले सुनाए थे। गोगोई सुप्रीम कोर्ट में बैठे 25 न्यायाधीशों में से उन 11 न्यायाधीशों में शामिल रहे जिन्होंने अदालत की वेबसाइट पर अपनी संपत्ति का विवरण दिया था।

दिए आदेश से हुई थी लोकायुक्त की नियुक्ति

जस्टिस गोगोई का 16 दिसंबर 2015 को दिया गया एक आदेश उन्हें इतिहास में खास मुकाम पर दर्ज कराता है। देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश के जरिए किसी राज्य का लोकायुक्त नियुक्त किया था। जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सेवानिवृत न्यायाधीश जस्टिस वीरेन्द्र सिंह को उत्तर प्रदेश का लोकायुक्त नियुक्त करने का आदेश जारी किया था। न्‍यायमूर्ति गोगोई ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि सर्वोच्च अदालत के आदेश का पालन करने में संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का नाकाम रहना बेहद अफसोसजनक और आश्चर्यचकित करने वाला है। कोर्ट को लोकायुक्त की नियुक्ति का स्वयं आदेश इसलिए देना पड़ा था क्योंकि कोर्ट के बार बार आदेश देने के बावजूद लोकायुक्त की नियुक्ति पर प्रदेश के मुख्यमंत्री, नेता विपक्ष और हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश में सहमति नहीं बन पाई थी।

काटजू को होना पड़ा था शीर्ष अदालत में पेश 

गोगोई के कार्यकाल की दूसरी ऐतिहासिक घटना 11 दिसंबर 2016 की है। इसमें केरल के चर्चित सौम्या हत्याकांड के फैसले पर ब्लाग में टिप्पणी करने पर जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के ही सेवानिवृत न्‍यायमूर्ति मार्कडेय काटजू को अदालत में तलब कर लिया था। देश के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था कि कोई सेवानिवृत न्‍यायमूर्ति सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ हो और उसने बहस की हो। इतना ही नहीं बहस के बाद शीर्ष अदालत उसको अवमानना का नोटिस जारी कर दे। न्‍यायमूर्ति गोगोई की अध्‍यक्षता वाली पीठ ने काटजू को अवमानना नोटिस जारी करते हुए कहा था कि ब्लाग पर की गई टिप्पणियां प्रथम दृष्टया अवमाननापूर्ण हैं।

एनआरसी पर अपनाया था सख्‍त रुख

गोगोई ने उस बेंच का नेतृत्व किया, जिसने यह सुनिश्चित किया कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया निर्धारित समय सीमा में पूरी हो जाए। पब्लिक फोरम में आकर उन्होंने एनआरसी की प्रक्रिया का बचाव करते हुए उसे सही बताया था। गोगोई एक ऐसे मुख्य न्यायाधीश के रूप में भी याद किए जाएंगे जो सुप्रीम कोर्ट की पवित्रता की रक्षा करने के लिए अपनों के खिलाफ भी आवाज उठाने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आंतरिक कामकाज का विरोध करने के लिए तीन अन्य वरिष्‍ठ जजों के साथ प्रेस कांफ्रेंस की थी।

समयसीमा से पहले सरकारी आवास छोड़ पेश की थी मिसाल

यही नहीं भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में 17 नवंबर को सेवानिवृत्त हुए न्यायमूर्ति रंजन गोगोई ने अपने एक महीने की समयसीमा से काफी पहले ही 5 कृष्णा मेनन मार्ग पर मिले अपने सरकारी घर को खाली करके एक मिसाल पेश की थी। सेवानिवृत्ति के महज तीन दिन बाद ही अपने आधिकारिक निवास को खाली करने वाले गोगोई देश के पहले मुख्य न्यायाधीश रहे। हालांकि इससे पहले पूर्व चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने भी अपने रिटायरमेंट के एक हफ्ते बाद आधिकारिक आवास को छोड़ करके एक मिसाल पेश की थी।

पूर्वोत्तर से आने वाले पहले सीजेआई

रंजन गोगोई का जन्म 18 नवंबर 1954 को असम में हुआ था। गोगोई पूर्वोत्तर के पहले व्यक्ति बने जिन्हें भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। उनके पिता केशब चंद्र गोगोई असम के मुख्यमंत्री रहे। उन्होंने 1978 में बतौर एडवोकेट अपने कार्यकाल की शुरुआत की थी। अपने कॅरियर के शुरुआती दिनों में उन्होंने गुवाहाटी होईकोर्ट में वकालत की। 28 फरवरी 2001 को गुवाहटी हाईकोर्ट में उन्हें स्थायी न्यायमूर्ति के तौर पर नियुक्त किया गया। वह 12 फरवरी 2011 को पंजाब और हरियाणा के चीफ जस्टिस बने। फिर पदोन्‍नत‍ि के बाद वह 23 अप्रैल, 2012 में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति बने। तत्‍कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा के रियाटर होने के बाद गोगोई को चीफ जस्टिस का पद मिला था। शपथ लेने के साथ ही उन्होंने अयोध्या मामले की सुनवाई के लिए एक संवैधानिक बेंच का गठन किया था और खुद पीठ की अगुवाई की थी।

पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के राम मंदिर समेत बड़े फैसले जानिए

अयोध्या विवाद पर सुनाया था फैसला

तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से अयोध्या के 70 साल पुराने केस पर बहुप्रतीक्षित फैसला सुनाते हुए 2.77 एकड़ की विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण का फैसला दिया था। सुन्नी वक्फ बोर्ड को दूसरी जगह पर 5 एकड़ वैकल्पिक भूमि दिए जाने आदेश दिया गया था। कोर्ट ने राम मंदिर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार को तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट के गठन का आदेश दिया था। फैसला देते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने अहम सवालों के सिलसिलेवार जवाब भी दिए थे। अयोध्या पर फैसला जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस एस. ए. बोबडे (अब चीफ जस्टिस), जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नजीर की पीठ ने सुनाया था।

सबरीमाला मामले को बड़ी बेंच को भेजा था

तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे को लेकर दाखिल की गई पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए इसे 7 जजों की संविधान पीठ के पास भेज दिया था। 5 जजों की पीठ ने सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला 3-2 के बहुमत से हुआ। अभी इस मामले सुनवाई 9 जजों की संविधान पीठ में चल रही है। पुनर्विचार याचिका पर फैसला देते हुए तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा था कि याचिकाकर्ता इस बहस को फिर से शुरू करना चाहता है कि धर्म का अभिन्न अंग क्या है? जस्टिस गोगोई ने यह भी कहा कि धार्मिक प्रथाओं को सार्वजनिक आदेश, नैतिकता और भाग 3 के अन्य प्रावधानों के खिलाफ नहीं होना चाहिए। सबरीमाला पुनर्विचार याचिका में 5 जजों की में से जस्टिस रंजन गोगोई जस्टिस इंदु मल्होत्रा और जस्टिस खानविलकर ने बहुमत में फैसला दिया था, जबकि जस्टिस फली नरीमन और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अलग से इस निर्णय के खिलाफ अपना फैसला दिया था। सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले में सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी गई थी। इस फैसले के खिलाफ 50 से ज्यादा पुनर्विचार याचिकाएं शीर्ष अदालत में दाखिल की गई थीं।

राफेल मामले पर फैसला

राफेल डील की जांच के लिए दाखिल रिव्यू पिटिशन को तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ ने खारिज कर दिया था। केंद्र सरकार को बड़ी राहत देते हुए जस्टिस गोगोई की अगुआई वाली बेंच ने सरकार को क्लीन चिट दी। संविधान पीठ ने कहा कि मामले की अलग से जांच करने की कोई आवश्वयकता नहीं है। सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार की दलीलों को तर्कसंगत और पर्याप्त बताते हुए मानते हुए कहा था कि केस के मेरिट को देखते हुए फिर से जांच के आदेश देने की जरूरत नहीं है। शीर्ष अदालत ने14 दिसंबर 2018 को राफेल खरीद प्रक्रिया और इंडियन ऑफसेट पार्टनर के चुनाव में सरकार द्वारा भारतीय कंपनी को फेवर किए जाने के आरोपों की जांच की गुहार लगाने वाली तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

‘चौकीदार चोर है’ पर फैसला

राफेल डील की जांच की मांग वाली रिव्यू पिटिशन खारिज करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ‘चौकीदार चोर है’ वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बयान पर उन्हें नसीहत दी थी। कोर्ट ने राहुल गांधी की माफी को स्वीकार करते हुए अवमानना याचिका तो खारिज कर दी थी, पर यह भी कहा था कि वह भविष्य में ऐसी बयानबाजी से बचें। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और जाने-माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने न्यायालय का आभार जताया था। उन्होंने कहा कि कई बार हमारी जुबान से ऐसे शब्द फिसल जाते हैं, लेकिन उद्देश्य अवमानना का नहीं होता। आपको बता दें कि बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गांधी के ‘चौकीदार चोर है’ बयान को सुप्रीम कोर्ट से जोड़ने पर अवमानना याचिका दाखिल की थी। दरअसल, राफेल मामले में मोदी सरकार पर हमला करने के लिए राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर टिप्पणी की थी। सारा विवाद इसी पर था। तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने राहुल गांधी के खिलाफ अवमानना कार्यवाही के लिए लंबित इस मामले पर 10 मई को सुनवाई पूरी की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, ‘मिस्टर राहुल गांधी को भविष्य में संभलकर बोलने की जरूरत है।

चीफ जस्टिस का ऑफिस आरटीआई का दायरे में

तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का ऑफिस भी कुछ शर्तों के साथ सूचना के अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे लाने का फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि सीजेआई का ऑफिस भी पब्लिक अथॉरिटी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सभी जज आरटीआई के दायरे में आएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह से साल 2010 के दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पारदर्शिता के मद्देनजर न्यायिक स्वतंत्रता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस एनवी रमन्ना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की पीठ ने यह फैसला सुनाया था।

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