Story of premchands life in his own words in hindi: कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के अपने जीवन की यह कहानी 1932 में हंस के आत्मकथा अंक में प्रकाशित हुई थी मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं खड्ढे तो हैं पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों […]

इस्लामी सभ्यता पर मुंशी प्रेमचंद का यह लेख सबसे पहले 1925 में ‘प्रताप’ में प्रकाशित हुआ था। हिंदू और मुसलमान दोनों एक हज़ार वर्षों से हिंदुस्तान में रहते चले आये हैं लेकिन अभी तक एक-दूसरे को समझ नहीं सके। हिंदू के लिए मुसलमान एक रहस्य है और मुसलमान के लिये […]

घरों में काम करने वाली मामूली-सी नौकरानी बेबी हालदार (Baby Haldar) कैसे लेखिका बन गई, इसकी बेहद प्रेरणादायक और संघर्षपूर्ण दास्तान है। खुलासा डॉट इन में हम बेबी हालदार के संघर्षमय जीवन की दास्तान आप लोगों के सामने रखेंगे। जिसे पढ़कर आप भी एक बार जरूर हैरान हो जाएंगे कि […]

घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफेद गमछा। मंच पर मुशायरों के दौरान जब वह ठेठ गंवई अंदाज में हुंकारते थे तो सुनने वालों का कलेजा चीर कर रख देते थे। जाहिर है कि जब शायरी में आम आवाम का दर्द बसता हो, शोषित-कमजोर लोगों को […]

दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उत्तरी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली […]

मझगाँव ‘प्रियतम, प्रेम पत्र आया। सिर पर चढ़ाकर नेत्रों से लगाया। ऐसे पत्र तुम न लख करो ! हृदय विदीर्ण हो जाता है। मैं लिखूं तो असंगत नहीं। यहॉँ चित्त अति व्याकुल हो रहा है। क्या सुनती थी और क्या देखती हैं ? टूटे-फूटे फूस के झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, […]

आज तीन दिन गुजर गये। शाम का वक्त था। मैं यूनिवर्सिटी हाल से खुश-खुश चला आ रहा था। मेरे सैंकड़ों दोस्त मुझे बधाइयॉँ दे रहे थे। मारे खुशी के मेरी बॉँछें खिली जाती थीं। मेरी जिन्दगी की सबसे प्यारी आरजू कि मैं एम0ए0 पास हो जाउँ पूरी हो गयी थी […]

उस दिन जब मेरे मकान के सामने सड़क की दूसरी तरफ एक पान की दुकान खुली तो मैं बाग-बाग हो उठा। इधर एक फर्लांग तक पान की कोई दुकान न थी और मुझे सड़क के मोड़ तक कई चक्कर करने पड़ते थे। कभी वहां कई-कई मिनट तक दुकान के सामने […]

संध्या का समय था। डाक्टर चड्ढा गोल्फ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखायी दिये। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था। डोली औषाधालय के सामने आकर रूक गयी। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर […]

रोगी जब तक बीमार रहता है उसे सुध नहीं रहती कि कौन मेरी औषधि करता है, कौन मुझे देखने के लिए आता है। वह अपने ही कष्ट मं इतना ग्रस्त रहता है कि किसी दूसरे के बात का ध्यान ही उसके हृदय मं उत्पन्न नहीं होता; पर जब वह आरोग्य […]

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