चेतन आनंद : मेरी परवाज़ जब-जब भी कभी अम्बर में होती है

चेतन आनंद : मेरी परवाज़ जब-जब भी कभी अम्बर में होती है Chetan anand Hindi Gazal: Meri parwaaj jab jab bhi kabhi ambar mai hoti hai

मेरी परवाज़ जब-जब भी कभी अम्बर में होती है

कोई उलझी हुई क़ैंची भी मेरे पर में होती है।


 

भले कुछ भी करो लेकिन हमेशा याद ये रखना

पड़ोसी भांप लेते हैं जो अनबन घर में होती है।

 

तू इक छोटी-सी मछली है, तू बचना ऐसे बगुलों से

जो उड़ते हैं फ़लक में और नज़र सागर में होती है।

 

ग़लत हैं वो] जो कहते हैं नसीहत है क़िताबों में

मैं कहता हूं] नसीहत तो सदा ठोकर में होती है।


 

उसे भाता नहीं है चांदनी का क़ीमती बिस्तर

गुज़र जिसकी हमेशा धूप की चादर में होती है।

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