चेतन आनंद : उजाले की हुई पत्थर सरीखी पीर को तोड़ें

Chetan anand Hindi Gazal Ualae ki hui pathar sarkhee peer ko taode

उजाले की हुई पत्थर सरीखी पीर को तोड़ें

उठो, उठकर अंधेरे की कड़ी प्राचीर को तोड़ें।


 

नहीं टूटी तो आंखों का समन्दर सूख जाएगा

हृदय के पर्वतों से दर्द की तासीर को तोड़ें।

 

खुले माहौल की खुशबू पे हक़ हम सबका बनता है

अगर हम दायरे के पांव की जंजीर को तोड़ें।

 

सुनहरे कल के पल हासिल हमें हो सकते हैं, लेकिन

पसीने की इबारत से जो हम तक़दीर को तोड़ें।


 

बनें मजबूत हम इतने कि अब अपनी ही गरदन से

अलग करती हुई नफ़रत की हर शमशीर को तोड़ें।

 


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