आपसी सदभाव व प्रेम सदा एक दूसरे के कष्टों को हर लेते है प्राचीन काल में एक नदी के किनारे बसा नगर व्यापार का केन्द्र था। फिर आए उस नगर के बुरे दिन, जब एक वर्ष भारी वर्षा हुई। नदी ने अपना रास्ता बदल दिया। लोगों के लिए पीने का […]

 Premchand Story : Mata Ka Hriday : माँ का ह्रदय नामक कहानी बेहद ही मार्मिक है। इस कहानी के माध्यम से मुंशी प्रेमचंद से एक गरीब माँ की व्यथा को ज़ाहिर किया है। गरीबी के उस हाल में जब उसके पास दो जून की रोटी भी न होती थी उसने […]

Munshi premchand ki kahani Qatil मुंशी प्रेमचंद की कहानी कातिल: जाड़ों की रात में धर्मवीर अपनी माँ से बात कर रहा होता है कि यहाँ लोग कितनी जल्दी सो जाते है जबकि यूरोप जैसे देशों में तो इस वक़्त सैर सपाटा किया जा रहा होता है। इसी तरह की बातें […]

लैला: प्रेमचंद | Laila : Premchand’s Hindi story: मुंशी प्रेमचंद ने लैला को जिसके गीत सुन कोई भी मन्त्र मुग्ध हो जाता था अपनी कहानी का मुख्य पात्र चुना। एक दिन जब शहजादा नादिर ने लैला को गाते हुए सुना तो वो खुद को उसके समक्ष जाने से रोक न […]

Nirvaasan Munshi Premchand ki Kahani : कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद ने समाज में महिलाओं की स्थिति और उनको लेकर बनाये गए नजरिये पर जमकर प्रहार किया है जिसका सटीक उदहारण उनकी कहानी निर्वासन (Nirvaasan) में पढने के लिए मिलता है। कहानी के माध्यम से पुरुष का एक महिला को […]

दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उत्तरी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली […]

मझगाँव ‘प्रियतम, प्रेम पत्र आया। सिर पर चढ़ाकर नेत्रों से लगाया। ऐसे पत्र तुम न लख करो ! हृदय विदीर्ण हो जाता है। मैं लिखूं तो असंगत नहीं। यहॉँ चित्त अति व्याकुल हो रहा है। क्या सुनती थी और क्या देखती हैं ? टूटे-फूटे फूस के झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, […]

आज तीन दिन गुजर गये। शाम का वक्त था। मैं यूनिवर्सिटी हाल से खुश-खुश चला आ रहा था। मेरे सैंकड़ों दोस्त मुझे बधाइयॉँ दे रहे थे। मारे खुशी के मेरी बॉँछें खिली जाती थीं। मेरी जिन्दगी की सबसे प्यारी आरजू कि मैं एम0ए0 पास हो जाउँ पूरी हो गयी थी […]

उस दिन जब मेरे मकान के सामने सड़क की दूसरी तरफ एक पान की दुकान खुली तो मैं बाग-बाग हो उठा। इधर एक फर्लांग तक पान की कोई दुकान न थी और मुझे सड़क के मोड़ तक कई चक्कर करने पड़ते थे। कभी वहां कई-कई मिनट तक दुकान के सामने […]

संध्या का समय था। डाक्टर चड्ढा गोल्फ खेलने के लिए तैयार हो रहे थे। मोटर द्वार के सामने खड़ी थी कि दो कहार एक डोली लिये आते दिखायी दिये। डोली के पीछे एक बूढ़ा लाठी टेकता चला आता था। डोली औषाधालय के सामने आकर रूक गयी। बूढ़े ने धीरे-धीरे आकर […]

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