जवाहर गोयल की हिंदी कहानी : हबीब का घर

Jawahar Goyal Hindi kahani Habib ka Ghar

Famous writer Jawahar Goyal Ki Hindi story: Habeeb ka Ghar

हम सबको उस दिन भी क्रिकेट खेलना था। क्योंकि वह छुटटी का दिन था। फिर हबीब मियां का फरमान था कि स्कूल टीम को रोज अभ्यास करना जरूरी है। लेकिन कप्तान के कहने के बावजूद हम लोगों ने मैदान देर से पहुचना तय किया था। हबीब को हमने पहले ही बता दिया था कि सुबह हम सभी उनके घर सेवैंया खाने आएंगे। फिर वहीं से खेलने के लिए स्कूल पहुंचेंगे। उस दिन ईद थी। हबीब का घर जिस इलाके में था,  उसकी सड़कें कच्ची थीं। सड़क की गिट्टियां उखड़ी रहने से साइकिल पंचर होने का भय हमेशा रहता था। तंग गलियों में उन कच्चे-पक्के मकानों के बीच में हबीब का घर था।

उस गली के ज्यादातर मकानों के दरवाजे-खिड़कियों में बोरे का फट्टा पुरानी चादर या रंगीन प्लास्टिक, आड़ के लिए पर्दों के बतौर टंगे रहते थे। वहां कौन क्या पेशा करता है,  समझना आसान नहीं था। शहर छोटा था। सभी एक-दूसरे को पहचानते थे। कोई भी एक-दूसरे के लिए पूरा अजनबी नहीं था। उस गली में दूसरे मकानों की बनिस्‍बत हबीब का मकान अपेक्षाय: संपन्न लगता था।


एक वही पूरा सीमेंट का बना पक्का मकान था। मय छत और सीमेंट के खप्परों वाले छप्पर के, खिड़कियां काठ की थीँ। बनने के बाद उन पर कभी रंग नहीं हुआ था। इस कारण खिड़कियों का काठ पुराना और काला-सा हो गया था। पर बुरा नहीं लगता था। खिड़कियां शायद कभी खुली ही नहीं या फिर हमने उन्हें कभी खुला नहीं देखा।

इसी तरह दरवाजे के निचले हिस्से का काठ भी काफी कुछ गल चुका था। दरवाजा तब भी मजबूत था। उघारे काठ का ऊपरी हिस्सा, खासकर कब्जों के पास का पूरा
भाग, पूरी तरह दुरुस्त था। भले ही धूसर काला-सा लगता था। शहर में ऐसे बहुत ही कम घर थे जिनमें बिजली की घंटी लगी हो। मेरे किसी भी मित्र के घर बिजली की घंटी नहीं लगी थी। दरअसल घरों के दरवाजे दिन में बंद नहीं किए जाते थे। जब सब सोने को हाते तब ही दरवाजों को बंद किया जाता। हम लोग तो सड़क से ही दोस्‍त को आवाज लगाते हुए, घर में सीधा भीतर तक चले जाते। जिससे मिलना चाहते थे, उसे खोजकर या फिर वहां जो भी मिला उससे बतियाकर लौट जाते थे। किंतु हबीब के घर बिजली की घंटी लगी थी। बाहर के दरवाजे की चौखट पर ऊपर की ओर बिजली की घंटी का काले प्लास्टिक का गोल बटन धूप में साफ चमकता था। इसे दबाने पर जोरों से किर्र को आवाज गूजंती..।

उस गली के शांत,  मंद मिजाज में वह आवाज चारों ओर ऐसी गूंजती कि हम लोग थोड़ा सहम-सा जाते, कि आवाज सुनकर कोई नाराज न हो जाए। लेकिन जल्दी से कोई उत्तर भी नहीं मिलता था। थोड़ी देर के बाद ऊपर छत की तरफ से या फिर भीतर वाले कमरे से कोई खटका सुनाई देता या किसी हरकत की आवाज होती। ‘कौन’ या ‘आया’ की आवाज नहीं आती। थोड़ी देर के बाद दरवाजा खुलता। कई बार जब दरवाजा खुलता तो उसे खोलनेवाला आड़ में होता और दिखाई नहीं देता। या फिर दरवाजा खोलने के बाद, आड़ से हटकर भीतर चला गया होता, बिन कुछ कहे। दरवाजे के पीछे लोहे की एक सांकल थी। लकड़ी का एक खटका भी था। पहले सांकत खोली जाती। सांकल के झूलने से कड़-कड़ की आवाज होती। जब खटका झटकाया जाता तब लकड़ी के घिसने की आवाज के साथ दरवाजा एक खड़ी दरार में खुल जाता। बाहर धूप होने के बावजूद दरवाजे की खुली दरार के भीतर अंधेरा दिखाई देता। तब हम लोग दरवाजा ठेलकर, सड़क पर पड़े उस बड़े चौकोर पत्थर पर पैर रखकर भीतर घुस जाते, जो सीढ़ी का काम देता था। ये सारी बातें इतनी भिन्न पर सहज थीं कि कभी मन में यह उत्सुकता नहीं हुई कि दरवाजे के गल गए निचले हिस्से से हम भीतर झांककर देखते कि दरवाजा किसने खोला था।

यदि दरवाजा इफ्तिकार भाई या एजाज साब ने खोला होता तो ये दरवाजा खोलने पर अवश्य कहते ‘हबीब चला गया’ या ‘बैठो, आता है।’ इफ्तिकार भाई हबीब से तीन साल बड़े थे। वे ही हबीब के पहले स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। वे तब स्कूल की टीम में आरंभिक गेंदबाज और आरंभिक बल्लेबाज दोनों ही थे। वे ही स्कूल टीम के एकमात्र ऐसे खिलाड़ी थे जो सफेद पतलून,  सफेद कमीज व सफेद चमड़े के जूते पहनते थे। उनके पास क्रिकेट के बड़े खिलाडिय़ों के समान, क्रिकेट की एक गोल सफेद टोपी भी थी। जो मैंने पहली बार उन्ही को पहने देखी थी। उनकी पतलून में, दायीं जेब के सामने का हिस्सा, गेंद के लगातार घिसे जाने के कारण हमेशा लाल दाग लिए होता था। उन दिनों हम लोग मैदान में जाकर क्रिकेट खेलने की हिम्मत नहीं कर पाते थे। स्‍कूल के लाल बजरीवाले रास्ते पर ही मैंटिंग बिछाकर खेलते थे। दरवाजा खोलने पर इफ्तिकार भाई ओठों को एक ओर तिरछा खींचकर मुस्कुराते कहते, ‘कैसे हो’ या चौंकते ‘अरे आप।’ मुझे सुनकर बहुत अटपटा लगता। उनका लहजा नफासत लिए काफी संतुलित और नपा-तुला होता। तब तक मैंने अपने लिए ‘आप’ का संबोधन किसी और से नहीं सुना था।

तुम और तू से ही सारा काम पूरा हो जाता था। तब मेरी उम्र ही क्या थी। मुझे उनका आप, उनके घर में पहले कमरे के उस पर्दे की तरह लगता, जो भीतर जाने वाले दरवाजे पर लटका,  बाकी घर को अदृश्य करता था। वह नीली छींट का पुराना सूती परदा था। लगभग जमीन को छूता हुआ। परदा लकड़ी के गोल डंडे पर कसकर इस तरह लगा था कि उसे बिल्कुल भी सरकाया नहीं जा सकता था। हबीब के घर का यह पहला कमरा एकदम खाली था।

उसे कमरे में सादे काठ की एक पुराने बेंच के अलावा और कुछ भी नहीं था। यहां घुसने पर हम लोग पैर हिलाते उस बेंच पर बैठ जाते और हबीब के बाहर निकलने की प्रतीक्षा करते। खाली कमरे की दो दीवालों में दो खिड़कियां भी थीं। उनके लोहे के काले सींखचे अपनी खास मौजूदगी बताते लगते। ये दोनों ही खिड़कियां सदा से बंद थीं। इनका सादा काठ पुरानेपन के कारण काली-सी लकीरों से पट गया था। पहले कमरे का दरवाजा खुलते ही खाली कमरे में वह बेंच सामने दिखती। उस बेंच के पीछे की दीवार पर एक आलमारी बनी हुई थी। आलमारी के पल्ले लकड़ी के बने थे। उनमें कांच भी लगा था। आलमारी सदा खाली रहती आई। उसकी ताकों पर अखबार भी नहीं बिछाया गया। वह भी खड़ी दरार में अधखुली-सी रही। यदि दरवाजा एजाज साब ने खोला होता तो हम अतिरिक्त अदब के साथ उन्हें नमस्‍ते कहा करते। एजाज साब,  इफ्तिकार भाई से काफी बड़े थे। वे सदा ही बहुत गंभीर दिखाई देते। अब सोचाता हूं तो ऐसा लगता है कि वह गंभीरता से अधिक उदासी थी। उस उम्र में तो उदासी शब्द का अर्थ भी पूरी तरह समझ में नहीं आता था। एजाज साब क्या करते हैं,  यह हम लोगों को मालूम नहीं था। ऐसा कम ही हुआ कि दरवाजा उन्हें खोलना पड़ा हो। या तो वे घर के भीतर ही रह आते होंगे या फिर घर या शहर के बाहर। सुना था कि बहुत साल पहले जब वे स्कूल के छात्र थे तब हमारे स्कूल की क्रिकेट टीम के कप्तान थे। बल्ले लाने के लिए एक बार जब हम लोग हबीब के घर गए, तब बल्ला देते हुए उन्होंने बल्ला पकडऩे के हमारे ढंग को जांचा था और समझाया था कि उंगलियों की पकड़ व हथेलियों का फासला कैसा होना चाहिए। शायद उसी वजह से,  उसके बाद मेरा डिफेंस पक्का हो गया और पांच फीट से भी नाटा होने के बावजूद मुझे स्‍कूल की टीम में पक्की जगह मिल गई। तब मेरे लेटकट और लेग ग्लांस पक्के हो गए थे।

हबीब के घर,  उस कमरे का पलस्‍तर पानी से भगकर कई जगह पर फूल गया था जिसे ठक-ठकाने पर पोली आवाज आती थी। पानी जरूर खिड़कियों से भीतर आता होगा। छत काठ की मोटी बल्लियों पर, बिना टूट-फूट के दुरुस्‍त फैली थी। कमरे की दीवार दो-तीन जगह रेत-सीमेंट के गारे से सुधारी गई थी। जिसमें वहां बडे़-बडे़ पुराने गाढ़े रंग के धब्‍बे पड़ गए थे। उन पर कभी पुताई नहीं हुई। घर में भी शायद पुताई कभी नहीं हुई। उस गली के मकानों में पुताई तभी होती जब कोई दीवार तोड़कर नया कुछ बनाया जाता। यहां के कच्ची मिट्टी के बने घरों में छुई या गोबार से लिपाई जरूर हो जाती थी- खासकर तीज-त्‍योहार आने पर। उस गली से गुजरने पर अक्‍सर लहुसन के तेज बघार की महक आती जो उसके मिजाज की हिस्सा थी।

हम जब बाहर के कमरे में बैठे हबीब का इंतजार करते होते, तब भी घर के भीतर किसी के बातचीत करने की आवाज कभी नहीं आती थी। हां, हबीब जब बल्ला लिए बाहर आता, तब उसका चेहरा खिला और मुस्कुराता हुआ होता। लगभग हमेशा ही वह कप्तानी आवाज में ‘चलो’ कहता,  और बाहर निकलकर सड़क पर खड़ा हो जाता। हम उसके बाद ही उसके घर के बाहर निकलते। फिर यह दरवाजा बंद हो जाता और सांकल लगने की आवाज आती।

हबीब इतना ऊंचा और दुबला था कि आश्चर्य होता, उसमें इतना दम खम कहां से आता था। उसे हर तरह की गेंदबाजी में महारत थी। खासकर उसकी स्पिन हवा में
उछाल के साथ इतनी अचूक और कारगर होती थी कि हम सभी को विश्वास था कि आने वाले सालों में वह टेस्ट नहीं तो रणजी के मैच में तो जरूर खेलेगा। स्कूल की टीम का प्रमुख बल्लेबाज भी वही था। उसके रहते हमारी टीम दूसरी टीम से हार भी सकती है, सोचा नहीं जा सकता था। हबीब के लिए क्रिकेट से बढ़कर और कुछ भी नहीं था। पढ़ाई के बारे में हम लोगों में बातचीत कम ही होती। कापी-किताबों का लेन-देन भी नहीं करते थे। कभी-कभार साथ में सिनेमा देखने जरूर चले जाते थे। खासकर उस टाकीज में जो नई मस्जिद के पास थी। जहां टाकीज के बगल से कतार में लोहे की जाली बनाने वालों की दुकानें थीं, जिनमें लोहे की वैल्डिंग का काम होता रहता, जिसकी चिंगारियों का उचटना-चटखना देखते मन नहीं थकता था। इन्हीं दुकानों के बीच में कुछ खुली-सी खपरैली चाय की दुकानें भी थीं। जिनमें अक्सर लुंगी-बनियान पहने कुछ लोग बैठे चाय पीते रहते या अखबार पढ़ते होते। रेडियों में उर्दू खबरें सुनते रहते। ये होटल चौड़ी नाली के ऊपर बांस का रपटा बिछाकर, उस पर बेंच रखकर बनाए गए थे। इनके खंभों पर काबा का चित्र या किसी पीर-फकरी वाले कैलेंडर लगे होते थे। हबीब वहां चाय नहीं पीता था।


हबीब में गजब का आत्मविश्वास था। वह बहुत कम बोलता था। अपनी तरफ से बातों की शुरुआत भी कम ही करता था। उसके घर ईद के दिन हमें कांसे के बड़े से साफ कटोरेभर सेवैंया खाने को मिलती। गाढ़ा दूध ऊपर तक भरा होता। हमारे घर सेवैंया बनती नहीं थीं,  क्योंकि बनने पर वह केंचुआनुमा दिखती थी। हम लोग शाकाहारी थे। संस्कार इतने पक्के थे कि फुआ अक्सर झिड़कतीं- ‘मलेच्छ मत हो जाओ’, ‘मांस खाने वालों के घर मत खाया करो।’ चमकता,  दूध सेवैंयाभरा कटोरा कभी खराब नहीं लगा। न ही कोई हिचक हुई। न शाकाहारीपने पर ही कोई खरोंच आई।

उसके घर के बाहर वाले कमरे की उसी अकेली बेंच पर बिठलाकर हम सबको वहां सेवैंया खिलाई जातीं। उसके घर के भीतरी हिस्से में हम कभी नहीं गए, न ही झांका। न कभी हबीब की अम्मीजान को देखा। न ही कभी उनकी आवाज सुनी। हबीब का घर भीतर से एक अनजाने रहस्‍य की तरह हमारे लिए अबूझा रहा। उसके घर के बारे में हम सब कुछ भी नहीं जाते थे,  सिवाय इस बात के कि थोड़ा अलग तरह का होते हुए भी उसका घर,  हम सबके घरों सा एक घर था। कभी ऐसा नहीं लगा कि वे अभाव मे टूटते हैं। न ही कभी उस घर में संपन्नता का ही कोई सबूत दिया। सिवाय इसके कि हबीब मियां जब घर के बाहर निकलकर आते तब उनका चेहरा खिला हुआ व ताजा होता। उनके कपड़े साफ सुथरे रहते जिन्‍हें वे खुद ही धोते और इस्त्री करके पहनते थे। उनकी साइकिल भी साफ-सुथरी और दुरुस्त होती थी। सीट पर रेक्सीन का काला कवर।

स्कूल की पढ़ाई के बाद हबीब से मिलना नहीं हो सका। मैं शहर के बाहर पढऩे चला गया था और उसने उसी शहर के एकमात्र कॉलेज में दाखिला ले लिया। कई
सालों बाद की बात है, एक बार जब शहर लौटा तब बस स्‍टैंड में ही कारदार भाई से मुलाकात हो गई। बड़ी अजीब-सी मुलाकात थी वह। जिस बस में मैं अपने शहर लौट रहा था, उसका एक चक्‍का रास्ते में पंचर हो गया था। बस सीधी वर्कशाप के टिन के शेड में जाकर लगी थी। बस से उतरकर टहलने लगा तो देखा कि जो मिस्त्री बस में जैक लगा रहा था, वह कोई और नहीं भाई अब्दुल कारदार ही थे। कारदार भाई हम लोगों से काफी बड़े थे। उम्र में तो इफ्तिकार भाई से भी अधिक के थे। शहर में एक मशहूर खिलाड़ी रह चुके थे। एक जमाने में हाकी टीम के गोलकीपर थे, फुटबाल टीम के फुलबैक थे और क्रिकेट टीम में विकेटकीपर और धुआंधार बल्‍लेबाज थे। राज्‍य की टीम में भी खेल चुके थे। मैंने बचपन में उनके कई मैच देखे थे। एक बार तो हाकी के फाइनल मैच में अपनी हारती टीम को बचाने के लिए उन्होंने एक अजीब काम किया। मैच के आखिरी पांच मिनट बचे थे। उनके टीम को एक गोल से पिछड़ रही थी। वे गोलकीपर थे। उन्होंने पैड उतारकर, लगभग जुनून में तेजी से दौड़कर आगे आकर, सेंटर फारवर्ड की भूमिका निभाई। पांच मिनट में उन्होंने दो गोल दागे। हजारों दर्शक स्तब्ध रह गए। हारती टीम को जिताकर वे लौटे। शहर में उन्हें कंधे पर उठाकर जुलूस निकला। उसके बाद जब कीनिया के साथ भारत के हाकी टेस्ट मैच देखे, तब मुझे लगा कि कारदार भाई, भारत के गोलकीपर शंकर लक्ष्मण से कम नहीं हैं।

वर्कशाप में बस के पंचर को सुधारते हुए  कारदार भाई ने मुझे उस दिन बताया था कि हबीब मियां दो सौ मील दूर, सतपुड़ा के जंगलों के बीच, किसी कागज बनाने वाली फैक्टरी में स्टोरकीपर हैं। शादी कर ली है और बच्‍चे भी हैं। उसके बाद बस स्टैंड से घर जाते हुए जब हबीब के घर के सामने से गुजरा, तब लगा कि वह गली पहले से अधिक संकरी हो गई है। सड़क व मकानात पहले से अधिक कमजोर हो गए थे। हबीब के घर का पलस्तर बुरी तरह झड़ चुका था। दरवाजे और खिड़कियां सदा की तरह बंद थीं। लगता था जैसे अब वहां कोई नहीं रहता हो। उसी यात्रा के दौरान,  अपने एक मित्र से वह बात पता लगी जिससे हबीब के घर का रहस्‍य कुछ-कुछ समझ में आने लगा।


आज इस बैसाखी दुपहरी में जाने क्‍यों हबीब मियां इस कदर यादों में आ रहे हैं? अपने शहर से हजारों मील दूर और अपने बचपने से अनेकों वर्षों बाद, इस कदर हबीब के यादों में उमड़ने का रहस्‍य क्‍या हो सकता है? मैं हबीब के घर के रहस्य को छोड़,  उनकी इस याद के रहस्य को समझने में उलझता चला गया। दरअसल एक वारदात हुई थी। अखबारों से रोजाना यह ज्ञान तेजी से बढ़ रहा था कि हमारी जात क्या है और दूसरे की जात क्या है। हमारा धर्म क्या है और दूसरों का धर्म क्या है। इसी सब में मेरा मन कुछ उचाट रहने लगा था। इसी दौरान तमाम हादसों के बीच रोज सुबह आफिस जाते हुए, मेरी गाड़ी के हमसफर साथी बहुत उत्तेजित रहने लगे थे। मेरे ये साथी खुले मिजाज और खुली जबान के आदमी थे। सरकारी कंपनी में काम करते थे। उन्हें बराबर यह ध्यान रहता कि वे एक बड़े पद पर हैं। दर्जे के हिसाब से वे देश की चुनिंदा एक प्रतिशत जनसंख्या में गिने जाते।

उन दिनों सुर्खियों में दंगों की खबरें थीं। सरकार के कमजोर पैर डगमगा रहे थे। गाड़ी में बैठते ही थोड़े से समय में वे अपने आप ढेर से बयान दे देते। उनकी भाषा बेबाक और बेलाग थी। साफ और आम गालियों से सज्जित थी। स्‍वभाव खरा और हरा था। वे ऐसा समझते थे कि अपनी बात कह देने से निजी कर्तव्‍य पूरे हो जाते हैं। मन में जो आता बेहिचक कह डालते।

गाड़ी संकरी गली से गुजरती और सामने अगर उघारा खेलता बच्‍चा बीच सड़क में होता तो बुरी तरह चिड़चिड़ा जाते थे। उन दिनों उनके मन में यह विश्वास पक्का-सा हो गया था कि लोगों को एक बार में ही पूरा सबक सिखा देना चाहिए। उनकी बातें सुनते हुए जल्दी ही मैं ऊंधने लगता। क्योंकि मौन रहकर ही उन्हें नकारा जा सकता था। बातचीत मे उनसे उलझना उनके विलास को बढ़ावा देना था।


इसी ऊंघ के रास्ते से मुझमें हबीब की याद ने प्रवेश किया था। यह उनके चेहरे की याद नहीं थी। याद थी हबीब के घर के उस सूने कमरे की,  जो सीधा मुझे हबीब के हृदय की धड़कने सुना रहा था। हबीब के घर का वह कमरा इस तरह से खाली था। उसमें केवल एक उघारी बेंच पड़ी रहती थी। उसी तरह खाली और उघारी थी खुली आलमारी। पुराने काठ की काली पड़ गई खिड़कियां । लोहे के काले सींखचे। गल गए काठ के दरवाजे। याद आई उस उदासी की जो एजाज साब की गंभीरता में थी। उस सन्नाटे की जो घर के हर चप्‍पे में था, हर आदमी में था। याद आई हबीब की अम्मीजान की जिन्‍हें हम बच्चों ने कभी नहीं देखा। लेकिन जिनकी मौजूदगी दरवाजे की आड़ में, छींट वाले सूती परदे के पीछे और बंद खिड़कियों के मौन में हमेशा देखते रहे,  जानते रहे। क्यों नहीं मिल पाए उनकी अम्मीजान से हम? जब वे इतनी अच्छी सेवैंया बना भर-भर कटोरे खिलाती थीं,  तो अपने हाथों से क्यों नहीं दुलारा इमें उन्होंने ? क्या सिर्फ इसी शर्म से कि हबीब ने कभी अपने पिता को नहीं देखा था। पिता भी ऐसे जो हबीब के जन्म के बाद ही, हरा-भरा परिवार छोड़़कर पाकिस्‍तान चले गए। वहीं बस गए। दूसरा निकाह कर लिया। चार बच्चे कर लिए। वे फिर कभी लौटकर नहीं आए। कुछ सालों तक पैसा जरूर घर भेजा। पर बाद में तो खत आना भी बंद हो गए।

याद आई हबीब की सटीक गेंदबाजी की स्पिन और करारे करीनेदार शाट्स, उस सन्नाटे को तोड़ते हुए जो उनके घर की डसे हुए था। अचानक मेरी ऊंघ में एक ख्याल या सवाल कौंधा। मैं विस्मय से गाड़ी में बैठे साथी का चेहरा ताकने लगा। उस समय वे स्वयं से कहते हुए एक पूरी कौम को बर्खास्त कर रहे थे। ‘क्या हुआ, ऐसे क्यों,  ताक रहे हो?’ उन्‍होंने पूछा। मैं चुप रहा। मन में उठा सवाल उनसे पूछ नहीं पाया। क्‍योंकि मुझे साफ दिख गया था कि वक्‍त आने पर हबीब के पिता की तरह, वे भी कोई काम कर सकते हैं। मैं उन्‍हें ताकता रह गया।

 

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Title: famous writer jawahar goyal ki hindi story habeeb ka ghar in Hindi  | In Category: कहानी kahani

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