सखियां– मुंशी प्रेमचंद की कहानी | sakhiyaan ji premchand story

सखियां – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | sakhiyaan ji premchand story

डिप्टी श्यामाचरण का भवन आज सुन्दरियों के जमघट से इन्द्र का अखाड़ा बना हुआ था। सेवती की चार सहेलियॉ-रूक्मिणी, सीता, रामदैई और चन्द्रकुंवर-सोलहों सिंगार किये इठलाती फिरती थी। डिप्टी साहब की बहिन जानकी कुंवर भी अपनी दो लड़कियों के साथ इटावे से आ गयी थीं। इन दोनों का नाम कमला और उमादेवी था। कमला का विवाह हो चुका था। उमादेवी अभी कुंवारी ही थी। दोनों सूर्य और चन्द्र थी। मंडप के तले डौमनियां और गवनिहारिने सोहर और सोहाग, अलाप रही थी। गुलबिया नाइन और जमनी कहारिन दोनों चटकीली साडियॉ पहिने, मांग सिंदूर से भरवाये, गिलट के कड़े पहिने छम-छम करती फिरती थीं। गुलबिया चपला नवयौवना थी। जमुना की अवस्था ढल चुकी थी। सेवती का क्या पूछना? आज उसकी अनोखी छटा थी। रसीली आंखें आमोदाधिक्य से मतवाली हो रही थीं और गुलाबी साड़ी की झलक से चम्पई रंग गुलाबी जान पड़ता था। धानी मखमल की कुरती उस पर खूब खिलती थी। अभी स्नान करके आयी थी, इसलिए नागिन-सी लट कंधों पर लहरा रही थी। छेड़छाड़ और चुहल से इतना अवकाश न मिलता था कि बाल गुंथवा ले। महराजिन की बेटी माधवी छींट का लॅहगा पहने, ऑखों में काजल लगाये, भीतर-बाहर किये हुए थी।

रूक्मिणी ने सेवती से कहा-सितो। तुम्हारी भावज कहॉ है ? दिखायी नहीं देती। क्या हम लोगों से भी पर्दा है ?


रामदेई-(मुस्कराकर)परदा क्यों नहीं है ? हमारी नजर न लग जायगी?

सेवती-कमरे में पड़ी सो रही होंगी। देखों अभी खींचे लाती हूं।

यह कहकर वह चन्द्रमा से कमरे में पहुंची। वह एक साधारण साड़ी पहने चारपाई पर पड़ी द्वार की ओर टकटकी लगाये हुए थी। इसे देखते ही उठ बैठी। सेवती ने कहा-यहॉ क्या पड़ी हो, अकेले तुम्हारा जी नहीं घबराता?

चन्द्रा-उंह, कौन जाए, अभी कपड़े नहीं बदले।

सेवती-बदलती क्यों नहीं ? सखियॉ तुम्हारी बाट देख रही हैं।

चन्द्रा-अभी मैं न बदलूंगी।

सेवती-यही हठ तुम्हारा अच्छा नहीं लगता। सब अपने मन में क्या कहती होंगी ?

चन्द्रा-तुमने तो चिटठी पढी थी, आज ही आने को लिखा था न ?

सेवती-अच्छा,तो यह उनकी प्रतीक्षा हो रही है, यह कहिये तभी योग साधा है।


चन्द्रा-दोपहर तो हुई, स्यात् अब न आयेंगे।

इतने में कमला और उपादेवी दोनों आ पहुंची। चन्द्रा ने घूंघट निकाल लिया और र्फश पर आ बैठी। कमला उसकी बड़ी ननद होती थी।

कमला-अरे, अभी तो इन्होंने कपड़े भी नहीं बदले।

सेवती-भैया की बाट जोह रही है। इसलिए यह भेष रचा है।


कमला-मूर्ख हैं। उन्हें गरज होगी, आप आयेंगे।

सेवती-इनकी बात निराली है।

कमला-पुरूषों से प्रेम चाहे कितना ही करे, पर मुख से एक शब्द भी न निकाले, नहीं तो व्यर्थ सताने और जलाने लगते हैं। यदि तुम उनकी उपेक्षा करो, उनसे सीधे बात न करों, तो वे तुम्हारा सब प्रकार आदर करेगें। तुम पर प्राण समर्पण करेंगें, परन्तु ज्यो ही उन्हें ज्ञात हुआ कि इसके हृदय में मेरा प्रेम हो गया, बस उसी दिन से दृष्टि फिर जायेगी। सैर को जायेंगें, तो अवश्य देर करके आयेगें। भोजन करने बैठेगें तो मुहं जूठा करके उठ जायेगें, बात-बात पर रूठेंगें। तुम रोओगी तो मनायेगें, मन में प्रसन्न होंगे कि कैसा फंदा डाला है। तुम्हारे सम्मुख अन्य स्त्रियों की प्रशंसा करेंगें। भावार्थ यह है कि तुम्हारे जलाने में उन्हें आनन्द आने लगेगा। अब मेरे ही घर में देखों पहिले इतना आदर करते थे कि क्या बताऊं। प्रतिक्षण नौकरो की भांति हाथ बांधे खड़े रहते थे। पंखा झेलने को तैयार, हाथ से कौर खिलाने को तैयार यहॉ तक कि (मुस्कराकर) पॉव दबाने में भी संकोच न था। बात मेरे मुख से निकली नहीं कि पूरी हुई। मैं उस समय अबोध थी। पुरुषों के कपट व्यवहार क्या जानूं। पटी में आ गयी। जानते थे कि आज हाथ बांध कर खड़ी होगीं। मैने लम्बी तानी तो रात-भर करवट न ली। दूसरे दिन भी न बोली। अंत में महाशय सीधे हुए, पैरों पर गिरे, गिड़गिड़ाये, तब से मन में इस बात की गांठ बॉध ली है कि पुरूषों को प्रेम कभी न जताओं।


सेवती-जीजा को मैने देखा है। भैया के विवाह में आये थे। बड़ं हॅसमुख मनुष्य हैं।

कमला-पार्वती उन दिनों पेट में थी, इसी से मैं न आ सकी थी। यहॉ से गये तो लगे तुम्हारी प्रशंसा करने। तुम कभी पान देने गयी थी ? कहते थे कि मैने हाथ थामकर बैठा लिया, खूब बातें हुई।

सेवती-झूठे हैं, लबारिये हैं। बात यह हुई कि गुलबिया और जमुनी दोनों किसी कार्य से बाहर गयी थीं। मॉ ने कहा, वे खाकर गये हैं, पान बना के दे आ। मैं पान लेकर गयी, चारपाई पर लेटे थे, मुझे देखते ही उठ बैठे। मैने पान देने को हाथ बढाया तो आप कलाई पकड़कर कहने लगे कि एक बात सुन लो, पर मैं हाथ छुड़ाकर भागी।

कमला-निकली न झूठी बात। वही तो मैं भी कहती हूं कि अभी ग्यारह-बाहरह वर्ष की छोकरी, उसने इनसे क्या बातें की होगी ? परन्तु नहीं, अपना ही हठ किये जाये। पुरूष बड़े प्रलापी होते है। मैने यह कहा, मैने वह कहा। मेरा तो इन बातों से हृदय सुलगता है। न जाने उन्हें अपने ऊपर झूठा दोष लगाने में क्या स्वाद मिलता है ? मनुष्य जो बुरा-भला करता है, उस पर परदा डालता है। यह लोग करेंगें तो थोड़ा, मिथ्या प्रलाप का आल्हा गाते फिरेगें ज्यादा। मैं तो तभी से उनकी एक बात भी सत्य नहीं मानती।

इतने में गुलबिया ने आकर कहा-तुमतो यहॉ ठाढी बतलात हो। और तुम्हार सखी तुमका आंगन में बुलौती है।

सेवती-देखों भाभी, अब देर न करो। गुलबिया, तनिक इनकी पिटारी से कपड़े तो निकाल ले।

कमला चन्द्रा का श्रृगांर करने लगी। सेवती सहेलियों के पास आयी। रूक्मिणी बोली-वाह बहि, खूब। वहॉ जाकर बैठ रही। तुम्हारी दीवारों से बोले क्या ?

सेवती-कमला बहिन चली गयी। उनसे बातचीत होने लगीं। दोनों आ रही हैं।

रूक्मिणी-लड़कोरी है न ?

सेवती-हॉ, तीन लड़के हैं।

रामदेई-मगर काठी बहुत अच्छी है।

चन्द्रकुंवर-मुझे उनकी नाक बहुत सुन्दर लगती है, जी चाहता है छीन लूं।

सीता-दोनों बहिने एक-से-एक बढ़ कर है।

सेवती-सीता को ईश्वर ने वर अच्छा दिया है, इसने सोने की गौ पूजी थी।

रूक्मिणी-(जलकर)गोरे चमड़े से कुछ नहीं होता।

सीता-तुम्हें काला ही भाता होगा।

सेवती-मुझे काला वर मिलता तो विष खा लेती।

रूक्मिणी-यो कहने को जो चाहे कह लों, परन्तु वास्तव में सुख काले ही वर से मिलता है।

सेवती-सुख नहीं धूल मिलती है। ग्रहण-सा आकर लिपट जाता होगा।

रूक्मिणी-यही तो तुम्हारा लड़कपन है। तुम जानती नहीं सुन्दर पुरुष अपने ही बनाव-सिंगार में लगा रहता है। उसे अपने आगे स्त्री का कुछ ध्यान नहीं रहता। यदि स्त्री परम-रूपवती हो तो कुशल है। नहीं तो थोडे ही दिनों वह समझता है कि मैं ऐसी दूसरी स्त्रियों के हृदय पर सुगमता से अधिकार पा सकता हूं। उससे भागने लगता है। और कुरूप पुरूष सुन्दर स्त्री पा जाता है तो समझता है कि मुझे हीरे की खान मिल गयी। बेचारा काला अपने रूप की कमी को प्यार और आदर से पूरा करता है। उसके हृदय में ऐसी धुकधुकी लगी रहती है कि मैं तनिक भी इससे खटा पड़ा तो यह मुझसे घृणा करने लगेगी।

चन्द्रकुंव-दूल्हा सबसे अच्छा वह, जो मुंह से बात निकलते ही पूरा करे।

रामदेई-तुम अपनी बात न चलाओं। तुम्हें तो अच्छे-अच्छे गहनों से प्रयोजन है, दूल्हा कैसा ही हो।

सीता-न जाने कोई पुरूष से किसी वस्तु की आज्ञा कैसे करता है। क्या संकोच नहीं होता ?

रूक्मिणी-तुम बपुरी क्या आज्ञा करोगी, कोई बात भी तो पूछे ?

सीता-मेरी तो उन्हें देखने से ही तृप्ति हो जाती है। वस्त्राभूषणों पर जी नहीं चलता।

इतने में एक और सुन्दरी आ पहुंची, गहने से गोंदनी की भांति लदी हुई। बढ़िया जूती पहने, सुगंध में बसी। ऑखों से चपलता बरस रही थी।

रामदेई-आओ रानी, आओ, तुम्हारी ही कमी थी।

रानी-क्या करूं, निगोडी नाइन से किसी प्रकार पीछा नहीं छूटता था। कुसुम की मॉ आयी तब जाके जूड़ा बॉधा।

सीता-तुम्हारी जाकिट पर बलिहारी है।

रानी-इसकी कथा मत पूछो। कपड़ा दिये एक मास हुआ। दस-बारह बार दर्जी सीकर लाया। पर कभी आस्तीन ढीली कर दी, कभी सीअन बिगाड़ दी, कभी चुनाव बिगाड़ दिया। अभी चलते-चलते दे गया है।

यही बातें हो रही थी कि माधवी चिल्लाई हुई आयी-‘भैया आये, भैया आये। उनके संग जीजा भी आये हैं, ओहो। ओहो।

रानी-राधाचरण आये क्या ?

सेवती-हॉ। चलू तनिक भाभी को सन्देश दे आंऊ। क्या रे। कहां बैठे है ?

माधवी-उसी बड़े कमरे में। जीजा पगड़ी बॉधे है, भैया कोट पहिने हैं, मुझे जीजा ने रूपया दिया। यह कहकर उसने मुठी खोलकर दिखायी।

रानी-सितो। अब मुंह मीठा कराओ।

सेवती-क्या मैने कोई मनौती की थी ?

यह कहती हुई सेवती चन्द्रा के कमरे में जाकर बोली-लो भाभी। तुम्हारा सगुन ठीक हुआ।

चन्द्रा-कया आ गये ? तनिक जाकर भीतर बुला लो।

सेवती-हॉ मदाने में चली जाउं। तुम्हारे बहनाई जी भी तो पधारे है।

चन्द्रा-बाहर बैठे क्या यकर रहे हैं ? किसी को भेजकर बुला लेती, नहीं तो दूसरों से बातें करने लगेंगे।

अचानक खडाऊं का शब्द सुनायी दिया और राधाचरण आते दिखायी दिये। आयु चौबीस-पच्चीस बरस से अधिक न थी। बडे ही हॅसमुख, गौर वर्ण, अंग्रेजी काट के बाल, फ्रेंच काट की दाढी, खडी मूंछे, लवंडर की लपटें आ रही थी। एक पतला रेशमी कुर्ता पहने हुए थे। आकर पंलंग पर बैठ गए और सेवती से बोले-क्या सितो। एक सप्ताह से चिठी नहीं भेजी ?

सेवती-मैनें सोचा, अब तो आ रहें हो, क्यों चिठी भेजू ? यह कहकर वहां से हट गयी।

चन्द्रा ने घूघंट उठाकर कहा-वहॉ जाकर भूल जाते हो ?

राधाचरण-(हृदय से लगाकर) तभी तो सैकंडों कोस से चला आ रहा हूँ।

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Title: sakhiyaan munshi premchand ki kahani in Hindi  | In Category: प्रेमचंद की कहानियां premchand hindi stories

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