आज तीन दिन गुजर गये। शाम का वक्त था। मैं यूनिवर्सिटी हाल से खुश-खुश चला आ रहा था। मेरे सैंकड़ों दोस्त मुझे बधाइयॉँ दे रहे थे। मारे खुशी के मेरी बॉँछें खिली जाती थीं। मेरी जिन्दगी की सबसे प्यारी आरजू कि मैं एम0ए0 पास हो जाउँ पूरी हो गयी थी और ऐसी खूबी से जिसकी मुझे तनिक भी आशा न थी। मेरा नम्बर अव्वल था। वाइस चान्सलर ने खुद मुझसे हाथ मिलाया था और मुस्कराकर कहा था कि भगवान तुम्हें और भी बड़े कामों की शक्ति दे। मेरी खुशी की कोई सीमा न थी। मैं नौजवान था, सुन्दर था, स्वस्थ था, रुपये-पैसे की न मुझे इच्छा थी और न कुछ कमी, मॉँ-बाप बहुत कुछ छोड़ गये थे। दुनिया में सच्ची खुशी पाने के लिए जिन चीजों की जरूरत है वह सब मुझे प्राप्त थीं। और सबसे बढ़कर पहलू में एक हौसलामन्द दिल था जो ख्याति प्राप्त करने के लिए अधीर हो रहा था।

घर आया, दोस्तों ने यहॉँ भी पीछा न छोड़ा, दावत की ठहरी। दोस्तों की खातिर-तवाजो में बारह बज गये, लेटा जो बरबस ख्याल मिस लीलावती की तरफ जा पहुँचा जो मेरे पड़ोस में रहती थी और जिसने मेरे साथ बी0ए0 का डिप्लोमा हासिल किया था। भाग्यशाली होगा वह व्यक्ति जो मिस लीला को ब्याहेगा, कैसी सुन्दर है? कितना मीठा गला है! कैसा हँसमुख स्वभाव! मैं कभी-कभी उसके यहॉँ प्रोफेसर साहब से दर्शनशास्त्र में सहायता लेने के लिए जाया करता था। वह दिन शुभ होता था जब प्रोफेसर साहब घर पर न मिलते थे। मिस लीला मेरे साथ बड़े तपाक से पेश आती और मुझे ऐसा मालूम होता था कि मैं ईसामसीह की शरण में आ जाऊँ तो उसे मुझे अपना पति बना लेने में आपत्ति न होगी। वह शैली, बायरन और कीट्स की प्रेमी थी और मेरी रूचि भी बिलकुल उसी के समान थी। हम जब अकेले होते तो अकसर प्रेम और प्रेम के दर्शन पर बातें करने लगते और उसके मुँह से भावों में डूबी हुई बातें सुन-सुनकर मेरे दिल में गुदगदी पैदा होने लगती थी। मगर अफसोस मैं अपना मालिक न था। मेरी शादी एक ऊँचे घराने में कर दी गई थी और अगरचे मैंने अब तब अपनी बीवी की सूरत भी न देखी थी मगर मुझे पूरा-पूरा विश्वास था कि मुझे उसकी संगत में वह आनंद नहीं मिल सकता जो लीला की संगत में सम्भव है। शादी हुए दो साल हो चुके थे मगर उसने मेरे पास एक खत भी न लिखा था। मैंने दो-तीन खत लिखे भी, मगर किसी का जवाब न मिला। इससे मुझे एक शक हो गया था कि उसकी तालीम भी यों ही-सी है।

Also Read: : Story of premchands life in his own words in hindi: कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के अपने जीवन की यह कहानी

आह! क्या मैं इस लड़की के साथ जिन्दगी बसर करने पर मजबूर हूँगा?…इस सवाल ने मेरे तमाम हवाई किलों को ढा दिया जो मैंने अभी-अभी बनाये थे। क्या मैं मिस लीला से हमेशा के लिए हाथ धो लूँ? नामुमकिन है। मैं कुमुदिनी को छोड़ दूँगा, मैं अपने घरवालों से नाता तोड़ लूँगा, मैं बदनाम हूँगा, परेशान हूँगा, मगर मिस लीला को जरूर अपना बनालूँगा।
इन्हीं खयालों के असर में मैंने अपनी डायरी लिखी और उसे मेज पर खुला छोड़कर बिस्तर पर लेट रहा और सोचते-सोचते सो गया।

सबेरे उठकर देखता हूँ तो बाबू निरंजनदास मेरे सामने कुर्सी पर बैठे हैं। उनके हाथ में डायरी थी जिसे सह ध्यानपूर्वक पढ़ रहे थे। उन्हें देखते ही मैं बड़े चाव से लिपट गया। अफसोस, अब उस देवोपम स्वभाववाले नौजवान की सूरत देखनी न नसीब होगी। अचानक मौत ने उसे हमेशा के लिए हमसे अलग कर दिया। कुमुदिनी के सगे भाई थे, बहुत स्वस्थ, सुन्दर और हँसमुख, उम्र मुझसे दो ही चार साल ज्यादा थी, उँचे पद पर नियुक्त थे, कुछ दिनों से इसी शहर में तबदील होकर गए थे। मेरी और उनकी दोस्ती हो गई थी। मैंने पूछा-क्या तुमने डायरी पढ़ ली?
निरंजन- हॉँ।
मैं- मगर कुमुदिनी से कुछ न कहना।
निरंजन- बहुत अच्छा; न कहूँगा।
मैं इस वक्त किसी सोच में हूँ। मेरा डिप्लोमा देखा?
निरंजन- घर से खत आया है, पिताजी बीमार हैं, दो-तीन दिन में जाने वाला हूँ।
मैं- शौक से जाइए, ईश्वर उन्हें जल्द स्वस्थ करे।
निरंजन- तुम भी चलोगे, न मालूम कैसा पड़े, कैसा न पड़े।
मैं मुझे तो इस वक्त मांफ कर दो।

निरंजनदास यह कहकर चले गये। मैंने हजामत बनायी, कपडे बदले और मिस लीलीवती से मिलने का चाव मन में लेकर चला। वहॉँ जाकर देखा तो ताला पडा हुआ था। मालूम हुआ कि मिस लीला साहिबा की तबीयत दो-तीन दिन से खराब थी। आबहवा बदलने के लिए नैनीताल चली गई थी। अफसोस, मैं हाथ मसलकर रह गया। क्या लीला मुझसे नाराज थी? उसने मुझे क्यो खबर न दी। लीला क्या तू बेवफा है, तुझसे बेवफाई की उम्मीद न थी। फौरन पक्का इरादा कर लिया कि आज की डाक से नैनीताल चल दूँ। मगर घर आया तो लीला का खत मिला। कॉँपते हुए हाथो से खोला, लिखा था-मैं बीमार हूँ, मेरे जीने की कोई उम्मीद नही है, डाक्टर कहते है कि प्लेग है। जब तक तुम आओगे, शायद मेरा किस्सा तमाम हो जायेगा। आखिरी वक्त तुमसे न मिलने का सख्त सदमा है। मेरी याद दिल में कायम रखना। मुझे सख्त अफसोस है कि तुमसे मिलकर नहीं आयी। मेरा कुसूर माफ करना और अपनी अभागिनी लीला को भुला मत देना। खत मेरे हाथ से छूटकर गिर पडा। दुनिया आंखों में अंधेरी हो गई, मुंह से एक ठंडी आह निकली। बिना एक क्षण गंवाए मेंने बिस्तर बाधां और नैनीताल चलने को तैयार हो गया। घर से निकला ही था कि प्रोफेसर बोस से मुलाकात हो गई। कॉलेज से चले आ रहे थे, चेहरे पर शोक लिखा हुआ था। मुझे देखते ही उन्होंने जेब से एक तार निकालकर मेरे सामने फेंक दिया। मेरा कलेजा धक् से हो गया। आंखों मे अंधेरा छा गया, तार कौन उठाता है, हाय मारकर बैठ गया। लीला, तू इतनी जल्द मुझसे जुदा हो गई।

2

मैं रोता हुआ घर आया और चारपाई पर मुंह ढॉँपकर खूब रोया। नैनीताल जाने का इरादा खत्म हो गया। दस-बारह दिन तक मैं उन्माद की – सी दशा मैं इधर – धर घूमता रहा। दोस्तो की सलाह हुई कि कुछ रोज के लिए कहीं घूमने चले जाओ। मेरे दिल में भी यह बात जम गई। निकल खडा हुआ और दो महीने तक विंध्याचल, पारसनाथ वगैरह पहाडियों मे आवारा फिरता रहा। ज्यों-त्यों करके नयी-नयी जगहों और दृश्यों की सैर से तबियत का जरा तस्कीन हुई। मैं आबू में था जब मेरे नाम तार पंहुचा कि मैं कॉलेज की असिस्टैण्ट प्रोफेसरी के लिए चुना गया हूँ। जी तो न चाहता था कि फिर इस शहर में आऊं, मगर प्रिन्सीपल के खत ने मजबूर कर दिया। लाचार, लौटा और अपने काम में लग गया। जिन्दादिली नाम को न बाकी रही थी। दोस्तों की संगत से भागता और हंसी-मजाक से चिढ़ मालू होती।

एक रोज शाम के वक्त मैं अपने अंधेरे कमरे में लेटा हुआ कल्पना लोक की सैर कर रहा था कि सामनेवाले मकान से गाने की आवाज आई। आह, क्या आवाज थी, तीर की तरह दिल में चुभी जाती थी, स्वर कितना करुण था इस वक्त मुझे अन्दाजा हुआ कि गाने में क्या असर होता है। तमाम रोंगटे खडे हो गये। कलेजा मसोसने लगा और दिल पर एक अजीब वेदना-सी छा गई। आंखों से आंसू बहने लगे। हाय, यह लीला का प्यारा गीत था:
पिया मिलन है कठिन बावरी।

मुझसे जब्त न हो सका, मैं एक उन्माद की-सी दशा में उठा और जाकर सामनेवाले मकान का दरवाजा खटखटाया। मुझे उस वक्त यह चेतना न रही कि एक अजनबी आदमी के मकान पर आकर खड़े हो जाना और उसके एकांत में विघ्न डालना परले दर्जे की असभ्यता है।

3

एक बुढिया ने दरवाजा खोल दिया और मुझे खड़े देखकर लपकी हुई अंदर गई। मैं भी उसके साथ चला गया। देहलीज तय करते ही एक बड़े कमरे में पहुंचा। उस पर एक सफेद फर्श बिछा हुआ था। गावतकिये भी रखे थे। दीवारों पर खूबसूरत तसवीरें लटक रही थीं और एक सोलह-सत्रह साल का सुंदर नौजवान जिसकी अभी मसें भीग रही थीं मसनद के करीब बैठा हुआ हारमोनियम पर गा रहा था। मैं कसम खा सकता हूं कि ऐसा सुंदर स्वस्थ नौजवान मेरी नजर से कभी नहीं गुजरा। चाल-ढाल से सिख मालूम होता था। मुझे देखते ही चौंक पडा और हारमोनियम छोडकर खडा हो गया। शर्म से सिर झुका लिया और कुछ घबराया हुआ-सा नजर आने लगा। मैंने कहा-माफ कीजिएगा, मैंने आपको बडी तकलीफ दी। आप इस फन के उसताद मालूम होते हैं। खासकर जो चीज अभी आप गा रहे थे, वह मुझे पसन्द है।

नौजवान ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से मेरी तरफ देखा और सर नीचा कर लिया और होंठों ही में कुछ अपने नौसिखियेपन की बात कही। मैंने फिर पूछा-आप यहाँ कब से हैं?
नौजवान-तीन महीने के करीब होता है।
मैं-आपका शुभ नाम।
नौजवान-मुझे मेहर सिंह कहते हैं।
मैं बैठ गया और बहुत गुस्ताखाना बेतकल्लुफी से मेहर सिंह का हाथ पकडकर बिठा दिया और फिर माफी मांगी। उस वक्त की बातचीत से मालूम हुआ कि वह पंजाब का रहने वाला है और यहां पढने के लिए आया हुआ है। शायद डॉक्टरों ने सलाह दी थी कि पंजाब की आबहवा उसके लिए ठीक नहीं है। मैं दिल में तो झेंपा कि एक स्कूल के लड़के के साथ बैठकर ऐसी बेतकल्लुफी से बातें कर रहा हूँ, मगर संगीत के प्रेम ने इस खयाल को रहने न दिया ! रस्मी परिचय क बाद मैंने फिर प्रार्थना की कि वही चीज छेडिए। मेहर सिंह ने आंखें नीची करके जवाब दिया कि मैं अभी बिल्कुल नौसिखिया हूं।
मैं-यह तो आप अपनी जबान से कहिये।

मेहरसिंह-(झेंपकर) आप कुछ फरमायें, हारमोनियम हाजिर है।
मैं-इस फन में बिल्कुल कोरा हूं वर्ना आपकी फरमाइश जरुर पूरी करता।
इसके बाद मैंने बहुत आग्रह किया मगर मेहर सिंह झेंपता ही रहा। मुझे स्वभावत: शिष्टाचार से घृणा है। हालांकि इस वक्त मुझे रुखा होने का कोई हक न था मगर जब मैंने देखा कि यह किसी तरह न मानेगा तो जरा रुखाई से बोला-खैर, जाने दीजिए। मुझे अफसोस है कि मैंने आप का बहुत वक्त बर्बाद किया। माफ कीजिए। यह कहकर उठ खड़ा हुआ। मेरी रोनी सूरत देखकर शायद मेहर सिंह को उस वक्त तरस आ गया, उसने झेंपते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला-आप तो नाराज हुए जाते हैं।
मैं-मुझे आपसे नाराज होने का हक हासिल नहीं।
मेहरसिंह-अच्छा बैठ जाइए, मैं आपकी फरमाइश पूरी करुंगा। मगर मैं अभी बिलकुल अनाड़ी हूं।
मैं बैठ गया और मेहरसिंह ने हारमोनियम पर वही गीत अलापना शुरु किया:
पिया मिलन है कठिन बावरी।

कैसी सुरीली तान थी, कैसी मीठी आवाज, कैसा बेचैन करने वाला भाव ! उसके गले में वह रस था जिसका बयान नहीं हो सकता। मैंने देखा कि गाते-गाते खुद उसकी आंखों में आंसू भर आये। मुझ पर इस वक्त एक मोहक सपने की-सी दशा छाई हुई थी। एक बहुत मीठा नाजुक, दर्दनाक असर दिल पर हो रहा था जिसे बयान नहीं किया जा सकता। एक हरे-भरे मैदान का नक्शा आंखों के सामने खिंच गया और लीला, प्यारी लीला इस मैदान पर बैठी हुई मेरी तरफ हसरतनाक आंखों से ताक रही थी। मैंने एक लम्बी आह भरी और बिना कुछ कहे उठ खड़ा हुआ। इस वक्त मेहर सिंह ने मेरी तरफ ताका, उसकी आंखों में मोती के कतरे डबडबाये हुए थे और बोला-कभी-कभी तशरीफ लाया कीजिएगा।
मैंने सिफ इतना जबाव दिया- मैं आपका बहुत कृतज्ञ हूं।

4

धीरे-धीरे मेरी यह हालत हो गयी कि जबतक मेहर सिंह के यहां जाकर दो-चार गाने न सुन लूं जी को चैन न आता। शाम हुई और जा पहुंचा। कुछ देर तक गानों की बहार लूटता और तब उसे पढ़ाता। ऐसे जहीन और समझदार लड़के को पढ़ाने में मुझे खास मजा आता था। मालूम होता था कि मेरी एक-एक बात उसके दिल पर नक्श हो रही है। जब तक मैं पढ़ाता वह पूरी जी-जान से कान लगाये बैठा रहता। जब उसे देखता, पढ़ने-लिखने में डूबा हुआ पाता। साल भर में अपने भगवान् के दिये हुए जेहन की बदौलत उसने अंग्रेजी में अच्छी योग्यता प्राप्त कर ली। मामूली चिट्ठियां लिखने लगा और दूसरा साल गुजरते-गुजरते वह अपने स्कूल के कुछ छात्रों से बाजी ले गया। जितने मुदर्रिस थे, सब उसकी अक्ल पर हैरत करते और सीधा ने चलन ऐसा कि कभी झूठ-मूठ भी किसी ने उसकी शिकायत नहीं की। वह अपने सारे स्कूल की उम्मीद और रौनक था, लेकिन बावजूद सिख होने के उसे खेल-कूद में रूचि न थी। मैंने उसे कभी क्रिकेट में नहीं देखा। शाम होते ही सीधे घर पर चला आता और पढ़ने-लिखने में लग जाता।

मैं धीरे-धीरे उससे इतना हिल-मिल गया कि बजाय शिष्य के उसको अपना दोस्त समझने लगा। उम्र के लिहाज से उसकी समझ आश्चर्यजनक थी। देखने में १६-१७ साल से ज्यादा न मालूम होता मगर जब कभी भी रवानी में आकर दुर्बोध कवि-कल्पनाओं और कोमल भावों की उसके सामने व्याख्या करता तो मुझे उसकी भंगिमा से ऐसा मालूम होता कि एक-एक बारीकी को समझ रहा है। एक दिन मैंने उससे पूछा-मेहर सिंह, तुम्हारी शादी हो गई?
मेहर सिंह ने शरमाकर जवाब दिया- अभी नहीं।
मैं-तुम्हें कैसी औरत पसन्द है?
मेहर सिंह- मैं शादी करुंगा ही नहीं।
मैं-क्यों?
मेहर सिंह- मुझ जैसे जाहिल गंवार के साथ शादी करना कोई औरत पसंद न करेगी।
मैं-बहुत कम ऐसे नौजवान होंगे जो तुमसे ज्यादा लायक हों या तुमसे ज्यादा समझ रखते हों।
मेहर सिंह ने मेरी तरफ अचम्भे से देखकर कहा-आप दिल्लगी करते हैं।
मैं-दिल्लगी नहीं, मैं सच कहता हूं। मुझे खुद आश्चर्य होता है कि इतने दिनों में तुमने इतनी योग्यता क्योंकर पैदा कर ली। अभी तुम्हें अंग्रेजी शुरु किए तीन बरस से ज्यादा नहीं हुए।
मेहर सिंह –क्या मैं किसी पढ़ी-लिखी लेडी को खुश रख सकूंगा।
मैं- (जोश से) बेशक !

5

गर्मी का मौसम था। मैं हवा खाने शिमले गया हुआ था। मेहर सिंह भी मेरे साथ था। वहां मैं बीमार पड़ा। चेचक निकल आई, तमाम जिस्म में फफोले पड़ गये। पीठ के बल चारपाई पर पड़ा रहता। उस वक्त मेहर सिंह ने मेरे साथ जो-जो एहसान किये वह मुझे हमेशा याद रहेंगे। डाक्टरों की सख्त मनाही थी कि वह मेरे कमरे में न आवे। मगर मेहर सिंह आठों पहर मेरे ही पास बैठा रहता। मुझे खिलाता-पिलाता, डठाता-बिठाता। रात-रात भर चारपाई के करीब बैठकर जागते रहना मेहर सिंह ही का काम था। सगा भाई भी इससे ज्यादा सेवा नहीं कर सकता था। एक महीना गुजर गया। मेरी हालत रोज-ब-रोज बिगड़ती जाती थी। एक रोज मैंने डॉक्टर को मेहर सिंह से कहते हुए सुना कि इनकी हालत नाजुक है। मुझे यकीन हो गया कि अब न बचूंगा, मगर मेहर सिंह कुछ ऐसी दृढ़ता से मेरी सेवा-सुश्रूषा में लगा हुआ था कि जैसे वह मुझे जबर्दस्ती मौत के मुहं से बचा लेगा। एक रोज शाम के वक्त मैं कमरे में लेटा हुआ था कि किसी के सिसकी लेने की आवाज आई। वहां मेहर सिंह को छोड़कर और कोई न था। मैंने पूछा-मेहर सिंह, मेहर सिंह, तुम रोते हो !

मेहर सिंह ने जब्त करके कहा-नहीं, रोऊं क्यों, और मेरी तरफ बड़ी दर्द-भरी आंखों से देखा।
मैं-तुम्हारे सिसकने की आवाज आई।
मेहर सिंह- वह कुछ बात न थी। घर की याद आ गयी थी।
मैं-सच बोलो।

मेहर सिंह की आंखें फिर डबडबा आईं। उसने मेज पर से आइना उठाकर मेरे सामने रख दिया। हे नारायण ! मैं खुद अपने को पहचान न सका। चेहरा इतना ज्यादा बदल गया था। रंगत बजाय सुर्ख के सियाह हो रही थी और चेचक के बदनुमा दागों ने सूरत बिगाड़ दी थी। अपनी यह बुरी हालत देखकर मुझसे भी जब्त न हो सका और आंखें डबडबा गईं। वह सौन्दर्य जिस पर मुझे इतना गर्व था बिलकुल विदा हो गया।

6

मैं शिमले से वापस आने की तैयारी कर रहा था। मेहर सिंह उसी रोज मुझसे विदा होकर अपने घर चला गया था। मेरी तबियत बहुत उचाट हो रही थी। असबाब सब बंध चुका था कि एक गाड़ी मेरे दरवाजें पर आकर रुकी और उसमें से कौन उतरा ? मिस लीला ! मेरी आंखों को विश्वास न हो रहा था, चकित होकर ताकने लगा। मिस लीलावती ने आगे वढ़कर मुझे सलाम किया और हाथ मिलाने को बढ़ाया। मैंने भी बौखलाहट में हाथ तो बढ़ा दिया पर अभी तक यह यकीन नहीं हुआ था कि मैं सपना देख रहा हूं या हकीकत है। लीला के गालों पर वह लाली न थी न वह चुलबुलापन बल्कि वह बहुत गम्भीर और पीली-पीली-सी हो रही थी। आखिर मेरी हैरत कम न होते देखकर उसने मुस्कराने की कोशिश करते हुए कहा-तुम कैसे जेण्टिलमैन हो कि एक शरीफ लेडी को बैठने के लिए कुर्सी भी नहीं देते !

मैंने अंदर से कुर्सी लाकर उसके लिए रख दी, मगर अभी तक यही समझ रहा था कि सपना देख रहा हूं।
लीलावती ने कहा-शायद तुम मुझे भूल गए।
मैं-भूल तो उम्र भर नहीं सकता मगर आंखों को एतबार नहीं आता।
लीला- तुम तो बिलकुल पहचाने नहीं जाते।
मैं-तुम भी तो वह नहीं रहीं। मगर आखिर यह भेद क्या है, क्या तुम स्वर्ग से लौट आयीं !
लीला-मैं तो नैनीताल में अपने मामा के यहाँ थी।
मैं-और वह चिट्ठी मुझे किसने लिखी थी और तार किसने दिया था ?
लीला-मैंने ही।

मैं-क्यों? तुमने मुझे यह धोखा क्यों दिया? शायद तुम अन्दाजा नहीं कर सकतीं कि मैंने तुम्हारे शोक में कितनी पीड़ा सही है।
मुझे उस वक्त एक अनोखा गुस्सा आया-यह फिर मेरे सामने क्यों आ गयी ! मर गयी थी तो मरी ही रहती !
लीला-इसमें एक गुर था, मगर यह बातें तो फिर होती रहेंगी। आओ इस वक्त तुम्हें अपनी एक लेडी फ्रेंड से इण्ट्रोड्यूस कराऊँ, वह तुमसे मिलने की बहुत इच्छुक है।
मैंने अचरज से पूछा-मुझसे मिलने को ! मगर लीलावती ने इसका कुछ जवाब न दिया और मेरा हाथ पकड़करी गाड़ी के सामने ले गयी। उसमें एक युवती हिन्दुस्तनी कपड़े पहने बैठी हुई थी। मुझे देखते ही उठ खड़ी हुई और हाथ बढ़ा दिया। मैंने लीला की तरफ सवाल करती हुई आंखों से देखा।

लीला-क्या तुमने नहीं पहचाना ?
मैं-मुझे अफसोस है कि मैंने आपको पहले कभी नहीं देखा और अगर देखा भी हो तो घुंघट की आड़ से क्योंकर पहचान सकता हूं।
लीला-यह तुम्हारी बीवी कुमुदिनी है !
मैंने आश्चर्य के स्वर में कहा- कुमुदिनी यहां !
लीला-कुमुदिनी, मुंह खोल दो और अपने प्यारे पति का स्वागत करो।

कुमुदिनी ने कांपते हुए हाथों से जरा-सा घूंघट उठाया। लीला ने सारा मुंह खोल दिया और ऐसा मालूम हुआ कि जैसे बादल से चांद निकल आया। मुझे खयाल आया, मैंने यह चेहरा कहीं देखा है। कहां? आह, उसकी नाक पर भी तो वही तिल है, उंगली में वही अंगूठी भी है।
लीला-क्या सोचते हो, अब पहचाना ?
मैं-मेरी कुछ अक्ल काम नहीं करती। हूबहू यही हुलिया मेरे एक प्यारे दोस्त मेहर सिंह का है।
लीला-(मुस्कराकर) तुम तो हमेशा निगाह के तेज बनते थे, इतना भी नहीं पहचान सकते !

मैं खुशी से फूल उठा-कुमुदिनी मेहर सिंह के भेस में ! मैंने उसी वक्त उसे गले से लगा लिया और खूब दिल खोलकर प्यार किया। इन कुछ क्षणों में मुझे जो खुशी हुई उसके मुकाबिले में जिंदगी-भर की खुशियां हेच हैं। हम दोनों आलिंगन-पाश में बंधे हुए थे। कुमुदिनी, प्यारी कुमुदिनी के मुंह से आवाज न निकलती थी। हां, आंखों से आंसू जारी थे।
मिस लीला बाहर खड़ी कोमल आंखों से यह दृश्य देख रही थी। मैंने उसके हाथों को चूमकर कहा-प्यारी लीला, तुम सच्ची देवी हो, जब तक जियेंगे तुम्हारे क़ृतज्ञ रहेंगे।

लीला के चेहरे पर एक हल्की-सी मुसकराहट दिखायी दी। बोली-अब तो शायद तुम्हें मेरे शोक का काफी पुरस्कार मिल गया।

 

प्रेमचंद की अन्य कहानियां 

सभ्यता का रहस्य – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Sabhyata ka Rahasya premchand ki hindi kahaniya

दूसरी शादी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | doosri shaadi hindi story by munshi premchand

समस्या – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | samasya hindi story by munshi premchand

सौत – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Saut munshi premchand ki kahani

बूढ़ी काकी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | boodhi kaki premchand hindi stories

विरजन की विदा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | virajan kee vida Premchand Hindi story

झांकी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Jhaanki hindi story by premchand

कमलाचरण के मित्र – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Kamlacharan ke mitra hindi story by premchand

गुल्ली डंडा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | gulli danda hindi story by premchand

कायापलट – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | kaayaapalat premchand hindi kahani

स्वामिनी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | swamini premchand ki hindi kahaniya

ईर्ष्या – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Eershya hindi story by munshi premchand

ठाकुर का कुंआ – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | thakur ka kuan munshi premchand ki kahani

सुशीला की मृत्यु – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | susheela ki mrityu premchand hindi stories

 देवी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Devi premchand hindi stories

सोहाग का शव – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | sohag ka shav hindi story by premchand

पैपुजी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Paipuji hindi story by premchand

आत्म संगीत – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Atam sangeet hindi story by premchand

क्रिकेट मैच – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | cricket match premchand hindi kahani

एक्ट्रेस – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Actress hindi story by munshi premchand

इस्तीफा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Isteefa munshi premchand story

विक्रमादित्य का तेग़ा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Vikramaditya ka tega munshi premchand story

तिरसूल – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | trishul munshi premchand story

सांसारिक प्रेम और देशप्रेम – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Sansarik Prem Aur Desh Prem premchand story

बड़े भाई साहब – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | bade bhai sahab premchand story

सखियां– मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Sakhiyaan Premchand story

शान्ति – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Shanti ji premchand story

निष्ठुरता और प्रेम – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | nishthurta aur prem premchand story

नशा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Nasha premchand ki hindi kahaniya

नए पड़ोसी से मेलजोल – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Naye padosi se mel jol premchand ki hindi kahaniya

कवच – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | kavach premchand ki hindi kahaniya

मतवाली योगिनी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Matwali yogini premchand ki hindi kahaniya

मुबारक बीमारी : प्रेमचंद | Mubarak Bimari : Premchand

आखिरी मंजिल – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Aakhiri manzil munshi premchand story

आत्माराम – प्रेमचंद | Aatmaram by Munshi Premchand in Hindi

बड़े घर की बेटी – प्रेमचंद | Bade Ghar ki beti Premchand

दो बैलों की कथा: प्रेमचंद | Do bailon ki katha : Premchand

नमक का दारोगा – प्रेमचंद | Namak Ka Daroga : Premchand

वफा का खंजर – प्रेमचंद | Wafa Ka Khanjar by Premchand

वासना की कडि़यां : मुंशी प्रेमचंद | Vasna ki kadiya : Premchand

मुंशी प्रेम चंद की कहानी ‘स्त्री और पुरुष’ | Stri aur Purush hindi stories by premchand

कथाकार मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘दंड’ | Dand hindi kahani by Munshi Premchand

कथाकार मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘खुदी’ | Khudi Hindi Story by Premchand

आखिरी तोहफा : प्रेमचंद | Premchand Hindi Story Aakhari toahafa

मिलाप: प्रेमचंद की कहानी | Milaap hindi story by Munshi Premchand

बड़े घर की बेटी – प्रेमचंद | Bade Ghar ki beti Premchand

स्वांग – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | svaang munshi premchand story

दुख दशा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Dukh dasha munshi premchand story

कप्तान साहब – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Kaptan Sahab premchand story

प्रतापचन्द्र और कमलाचरण – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Pratapchand aur kamlacharan premchand story

बन्द दरवाजा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | band darwaja premchand story

मोटे राम शास्त्री जी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | Mote ram shastri ji premchand story

विदाई – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | vidaa ji premchand story

पर्वत यात्रा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी | parvat yatra premchand story

Read all Latest Post on खेल sports in Hindi at Khulasaa.in. Stay updated with us for Daily bollywood news, Interesting stories, Health Tips and Photo gallery in Hindi
Hindi News से जुड़े अन्य अपडेट लगातार हासिल करने के लिए khulasaa.in को फेसबुक और ट्विटर पर ज्वॉइन करें