होम खासखबर अर्थ जगत महिला जगत खाना खजाना मनोरंजन आलेख फिल्म समीक्षा यात्रा धर्म कर्म ज्योतिष चालीसा आरती संग्रह करियर लाइफस्टाइल साक्षात्कार स्वास्थ्य अजब गजब वीडियो साहित्य कहानी प्रेमचंद की कहानियां कविता गजल फोटो गैलरी खेत खलिहान विविध सुविचार रोचक जानकारी विज्ञान जीवनी हमारे कॉलमनिस्ट

Ramdhari singh dinkar poem krishna ki chetavani वर्षों तक वन में घूम-घूम, बाधा-विघ्नों को चूम-चूम, सह धूप-घाम, पानी-पत्थर, पांडव आये कुछ और निखर। सौभाग्य न सब दिन सोता है, देखें, आगे क्या होता है। मैत्री की राह बताने को, सबको सुमार्ग पर लाने को, दुर्योधन को समझाने को, भीषण विध्वंस […]

बहिन आज फूली समाती न मन में । तड़ित आज फूली समाती न घन में ।। घटा है न झूली समाती गगन में । लता आज फूली समाती न बन में ।। कही राखियाँ है, चमक है कहीं पर, कही बूँद है, पुष्प प्यारे खिले हैं । ये आयी है […]

Jallianwala bagh mein basant subhadra kumari chauhan यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते, काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते। कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से, वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे। परिमल-हीन पराग दाग़ सा बना पड़ा है, हा! यह प्यारा बाग़ खून से सना […]

देख कर बाधा विविध, बहु विघ्न घबराते नहीं। रह भरोसे भाग के दुख भोग पछताते नहीं। काम कितना ही कठिन हो किन्तु उकताते नहीं। भीड़ में चंचल बने जो वीर दिखलाते नहीं। हो गये एक आन में उनके बुरे दिन भी भले। सब जगह सब काल में वे ही मिले […]

साजन! होली आई है! सुख से हँसना जी भर गाना मस्ती से मन को बहलाना पर्व हो गया आज- साजन ! होली आई है! हँसाने हमको आई है! साजन! होली आई है! इसी बहाने क्षण भर गा लें दुखमय जीवन को बहला लें ले मस्ती की आग- साजन! होली आई […]

सिर पर आग, पीठ पर पर्वत, पांव में जूते काठ के क्या कहने इस ठाठ के यह तस्वीर नई है भाई, आज़ादी के बाद की जितनी कीमत खेत की कल थी, उतनी कीमत खाद की सब धोबी के कुत्ते निकले, घर के हुए न घाट के क्या कहने इस ठाठ […]

भले डांट घर में तू बीबी की खाना भले जैसे -तैसे गिरस्ती चलाना भले जा के जंगल में धूनी रमाना मगर मेरे बेटे कचहरी न जाना   कचहरी न जाना कचहरी न जाना   कचहरी हमारी तुम्हारी नहीं है कहीं से कोई रिश्तेदारी नहीं है अहलमद से भी कोरी यारी […]

हमारे पड़ोस में एक नयी नयी बहू आई. गर्मी के दिन थे, एक दिन छत पर से उसकी आवाज़ आई – अम्मा जी ! बाबू जी की खटिया मैंने खड़ी कर दी, आपकी भी कर दूँ ?. दरअसल उसका आशय था, छत पर बिछी चारपाइयों के खड़ा करने से, लेकिन […]

जब देखो तब बड़की भौजी हँसती रहती है हँसती रहती है कामों में फँसती रहती है । झरझर झरझर हँसी होंठ पर झरती रहती है घर का खाली कोना भौजी भरती रहती है ।।   डोरा देह कटोरा आँखें जिधर निकलती है बड़की भौजी की ही घंटों चर्चा चलती है […]

शंकर की पुरी, चीन ने सेना को उतारा चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा हो जाय पराधीन नहीं गंग की धारा गंगा के किनारों ने शिवालय को पुकारा। चालीस करोड़ों को हिमालय ने पुकारा।   अम्बर के तले हिन्द की दीवार हिमालय सदियों से रहा शांति की मीनार हिमालय अब […]