घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफेद गमछा। मंच पर मुशायरों के दौरान जब वह ठेठ गंवई अंदाज में हुंकारते थे तो सुनने वालों का कलेजा चीर कर रख देते थे। जाहिर है कि जब शायरी में आम आवाम का दर्द बसता हो, शोषित-कमजोर लोगों को […]

सौ में सत्तर आदमी फ़िलहाल जब नाशाद* है दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आज़ाद है कोठियों से मुल्क के मेआर* को मत आंकिए असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पे आबाद है जिस शहर में मुंतजिम* अंधे हो जल्वागाह के उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है ये […]

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