गुमनाम हर बशर की पहचान बनके जी जो हैं उदास उनकी मुस्कान बनके जी।   गूंगी हुई है सरगम, घायल हैं साज़ सब, हर हाल में तू इनका सम्मान बनके जी।   जो मन को मुग्ध कर दे, हलचल मचा दे जो, ऐसी तू शंख-मुरली की तान बनके जी।   […]

मुश्क़िल है, मुश्क़िलात की तह तक नहीं जाती कोई भी बात, बात की तह तक नहीं जाती।   जलता है ख़ूब आग में, वो जानती है, पर- सूरज की बात, रात की तह तक नहीं जाती।   जाती है रोज़ ज़िन्दगी ही मौत की ज़द में, क्यों मौत इस हयात […]

कभी रहे हम भीड़ में भइया, कभी रहे तन्हाई में, सारी उम्र गुज़ारी हमने रिश्तों की तुरपाई में।   कभी बांसुरी को समझाया, ढपली के रोके आंसू, कभी संभाला तबले को तो कभी हंसे शहनाई में।   बेटे जैसी बेटी पाली, पत्नी-मां के संग रहे, कुछ से तो नुकसान उठाया, […]

राहों से पूछ लेना, पत्थर से पूछ लेना, मेरा पता किसी भी ठोकर से पूछ लेना।   महलों से, महफिलों से, मत पूछना गगन से, मैं हूं नदी, मुझे तुम सागर से पूछ लेना।   मानो न मानो लेकिन मेरा मुकाम भी है, चाहो तो अपने ही तुम अंदर से […]

इन सियासतदानों के घर में भी ठोकर मारकर, क्या मिलेगा बेवजह कीचड़ में पत्थर मारकर।   तोड़ लो जितना इन्हें, ये सच ही बोलेंगे सदा, खुद ख़ता खा लोगे, आईने में टक्कर मारकर।   दिल बिना भी आंख में आंसू तो आएंगे ज़रूर, किस तरह रोकोगे नदियों को समंदर मारकर। […]

पहले तो होते थे केवल काले, नीले, पीले दिन, हमने ही तो कर डाले हैं अब सारे ज़हरीले दिन।   मां देती थी दूध-कटोरी, पिता डांट के सँग टाॅफी, बड़े हुए तो दूर हो गये मस्ती भरे रसीले दिन।   दिन की ख़ातिर रातें रोतीं आंखें भर-भरके आँसू, लेकिन पत्थर […]

अब तो बदल पुराना सोच पहुंचा कहां ज़माना सोच।   उससे मिलना नहीं अगर तो फिर से एक बहाना सोच।   सन्नाटों के नगर में कैसे उसको आज बुलाना सोच।   रात हुई, बादल फिर आये चलकर कोई ठिकाना सोच।   तेरे साथ रहूंगा, लेकिन मौसम कोई सुहाना सोच।   […]

अजब अनहोनियां हैं फिर अंधेरों की अदालत में उजाले धुन रहे हैं सिर अंधेरों की अदालत में।   पुजारी ने बदल डाले धरम के अर्थ जिस दिन से सिसकता है कोई मंदिर अंधेरों की अदालत में।   सवेरा बांटने के जुर्म में पकड़ा गया जो कल वो सूरज आज है […]

आख़िर में बैठ ही गया तन्हाइयों के साथ चलता भी कैसे वो भला परछांइयों के साथ।   मायूसियां मिलेंगीं तुझे] चाह छोड़ दे] सपना कभी रहा भी है सच्चाइयों के साथ।   मैने सुना था मंज़िलें मिलती ज़रूर हैं मैं चल रहा हूं इसलिये कठिनाइयों के साथ।   मैं चलते-चलते […]

मेरी परवाज़ जब-जब भी कभी अम्बर में होती है कोई उलझी हुई क़ैंची भी मेरे पर में होती है।   भले कुछ भी करो लेकिन हमेशा याद ये रखना पड़ोसी भांप लेते हैं जो अनबन घर में होती है।   तू इक छोटी-सी मछली है, तू बचना ऐसे बगुलों से […]

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