• एक माह में ही 20 लाख रुपये की ठगी का मामला उजागर

नई दिल्ली, 13 जनवरी (एजेंसी)। बुध विहार पुलिस ने तीन युवकों को गिरफ्तार कर लकी ड्रॉ के नाम पर 500 लोगों से ठगी का मामला उजागर किया है। गिरोह ने फर्जी कॉल सेंटर के जरिए एक माह में अब तक 20 लाख रुपये की रकम ठगी है। पुलिस ने मंगलवार को अवैध कॉल सेंटर पर छापा मारकर दस मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, इंटरनेट डिवाइस और रजिस्टर आदि बरामद किए हैं।

डीसीपी पीके मिश्रा ने बताया कि बुध विहार थाने में तैनात एसआई पंचम को सूचना मिली थी कि शर्मा कॉलोनी में एक माह से अवैध कॉल सेंटर चल रहा है, जहां से लोगों के साथ ठगी की जा रही है। कार्रवाई के लिए एसएचओ खेमेंद्र पाल सिंह की देखरेख में इंस्पेक्टर सुधीर कुमार, एसआई पंचम और हेडकांस्टेबल त्रिभुवन झा की टीम बनाई गई। टीम ने मंगलवार को कॉल सेंटर पर जब छापा मारा तब वहां पांच युवतियां और तीन युवक फोन पर बातें कर रहे थे। पता चला कि वे ठगी के लिए लोगों को कॉल कर उन्हें लकी ड्रॉ में विजेता होने का झांसा दे रहे थे। पुलिस की पूछताछ में आरोपियों की पहचान भूपेश, मोहित और प्रशांत के तौर पर हुई।

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जांच में मालूम हुआ कि फर्जी कॉल सेंटर एक माह से किराए के मकान में चल रहा था। आरोपी भूपेश, मोहित और प्रशांत ने बताया कि उन्होंने अब तक 500 लोगों से ठगी की है। इन्होंने पांच युवतियों को सात हजार रुपये प्रति माह के वेतन पर रखा था। आरोपी इन्हें कमीशन भी देते थे। गिरफ्तार आरोपी भूपेश ने बीकॉम और मोहित ने बीए की पढ़ाई की है। भूपेश, मोहित और प्रशांत पहले कॉल सेंटर में काम कर चुके हैं। नौकरी छोड़कर तीनों फर्जी कॉल सेंटर खोलकर ठगी का धंधा करने लगे।

जांच में सामने आया है कि यह गिरोह ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़ और अन्य राज्यों में लोगों को शिकार बनाता था। इसके लिए आरोपी उस राज्य में प्रचलित मोबाइल नंबर की सीरीज निकालकर बात करते थे। फिलहाल, पुलिस गिरोह के शिकार हुए लोगों से संपर्क करने का प्रयास कर रही है। आरोपियों ने बताया कि फर्जी कॉल सेंटर में वेतन पर काम करने वाली युवतियां लोगों को कॉल कर लकी ड्रॉ में महंगे मोबाइल या जूते आदि जीतने का झांसा देती थीं। इसके बदले वे कुछ शुल्क जमा करने को कहती थीं।

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यह शुल्क सामान की डिलीवरी होने पर देना था, जिससे पीड़ित आसानी से जाल में फंस जाते थे। आरोपी जीपीओ के जरिए डिब्बे में समान वजन की कोई चीज रखकर भेज देते हैं। कोरोना काल में डिलीवरी का डिब्बा आम तौर पर लोग तुरंत नहीं खोलते थे और भरोसा कर भुगतान कर देते थे।

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