मैनपुरी षड्यन्त्र (1918) और काकोरी षड्यंत्र (1925) में मुख्य भूमिका निभाने वाले भारतीय क्रान्तिकारी राम प्रसाद बिस्मिल ने हिंदी व उर्दू के कवि थे, जो कि राम, अज्ञात और बिस्मिल उपनाम से कवितायें लिखा करते थे, परन्तु इन्हें प्रसिद्धि “बिस्मिल उपनाम से ही मिली। चूंकि बिस्मिल कवि होने के साथ साथ क्रान्तिकारी भी थे, अत: उन्होंने कई ऐसी पंक्तियाँ भी लिखीं जो किसी मुर्दे में भी देश भक्ति की भावना जागृत कर सकती थीं ऐसी ही उनकी कुछ पंक्तियाँ निम्न हैं –

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजु ए-कातिल में है?”

स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित किताब सत्यार्थ प्रकाश से बिस्मिल काफी प्रेरित थे तथा इतनी ही नहीं बिस्मिल आर्य समाज से भी जुड़े हुए थे। 11 जून 1897 को शाहजहाँपुर में राम प्रसाद बिस्मिल का जन्म हुआ था। हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन का संस्थापन करने वाले बिस्मिल की शुरुआती शिक्षा घर पर ही हुयी थी, जिसके चलते उन्होंने हिंदी अपने पिता से तथा उर्दू सिखाने उनके घर एक मौलवी आया करते थे। घर पर शिक्षा लेने के बावजूद वो हिंदी – उर्दू में इतने निपुण हो चुके थे कि जब उन्होंने हिंदी-उर्दू में कविता या शायरी लिखनी शुरू की तो भगत सिंह उनकी कलम के मुरीद हो गए।

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इतना ही नहीं इंग्लिश किताब कैथरीन और बंगाली किताब बोल्शेविकों की करतूत का हिंदी रूपांतर बिस्मिल ने किया था। उन्होंने इंग्लिश-भाषा के ज्ञान को बढ़ाने के लिए एक स्कूल में दाखिला भी लिया था, परन्तु उनके इस कार्य से उनके पिता नाराज़ हो गये अत: उन्होंने स्कूल छोड़ आर्य समाज, शाहजहाँपुर में सम्मिलित हो गये और यही ने उन्होंने कवितायें लिखने के अपने ज्ञान को और विकसित किया।

क्रान्तिकारी गतिविधियों के चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर सजा-ए-मौत का फरमान जारी किया था । 16 दिसम्बर 1927 को बिस्मिल ने अपनी आत्मकथा पूर्ण करके उसे जेल से बाहर भिजवा दिया था। 18 दिसम्बर 1927 को माता-पिता से उन्होंने अन्तिम मुलाकात की थी  और उसके अगले दिन 19 दिसम्बर 1927 को सुबह 6 बजकर 30 मिनट पर गोरखपुर की जिला जेल में उन्हें फाँसी दे दी गयी। बिस्मिल के बलिदान का समाचार सुनकर बहुत बड़ी संख्या में जनता जेल के फाटक पर एकत्र हो गयी। जेल का मुख्य द्वार बन्द ही रक्खा गया और फाँसीघर के सामने वाली दीवार को तोड़कर बिस्मिल का शव उनके परिजनों को सौंप दिया गया। शव को डेढ़ लाख लोगों ने जुलूस निकाल कर पूरे शहर में घुमाते हुए राप्ती नदी के किनारे राजघाट पर उसका अन्तिम संस्कार किया था ।

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