राम प्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ  की दोस्ती के किस्से आज तक मशहूर है और दोनों दोस्तों ने भारतीय स्वतंत्रता अभियान के स्वतंत्रता सेनानी के रूप में अपनी जान को देश के नाम पर कुर्बान कर दिया था। आपको बता दें कि बिस्मिल और अशफ़ाक़ न सिर्फ अच्छे दोस्त थे, बल्कि उस वक़्त के मशहूर उर्दू कवि यानी कि शायरों में से एक थे। जहाँ पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का उपनाम बिस्मिल था, वही अशफ़ाक़ ने “हसरत” उपनाम को अपनाया था।

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की शायरी बेहद असरदार थी, इनके शब्द किसी का भी ध्यान अपनी और खीचनें में सक्षम थे ऐसी ही कुछ पंक्तियाँ उनकी इस प्रकार है –  

किये थे काम हमने भी, जो कुछ भी हमसे बन पाए,

ये बातें तब की हैं आज़ाद थे और था शबाब अपना.

मगर अब तो को कुछ भी है उम्मीदें बस वो तुम से हैं,

जवान तुम हो लबे-बीम आ चुका है आफताब अपना

 

इन पक्तियों को पढ़ स्वयं ही मुख से वाह निकल आये तो इसमें ताज्जुब की बात नहीं है, यही जादू था अश्फाक की कलम का। मगर आज़ादी के दीवाने व कलम के इस जादूगर को 20 वीं शताब्दी में ब्रिटिश राज ने फ़ासी पर चढ़ा दिया था।

अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की जीवनी : उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में पठान परिवार से सम्बन्ध रखने वाले शफीक उल्लाह खान के घर में 22 अक्टूबर 1900 को पुत्र प्राप्ति हुयी, नाम रखा गया अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ। इनके परिवार के अधिकांश लोग मिलिट्री में थे तथा इनकी माँ की तरफ से भी इनके बहुत से रिश्तेदार पुलिस में थे या फिर सरकारी कार्यालयों में कार्यरत थे, जो कि उस वक़्त ब्रिटिश सरकार के अधीन थे। इनकी माता का नाम मजहूर-उन-निसा बेगम था तथा  चार भाइयो में ये सबसे छोटे थे। अशफ़ाक़ के बड़े भाई रियासत उल्लाह खान और पंडित बिस्मिल सहकर्मी थे तथा वही अशफ़ाक़ को बिस्मिल की बहादुरी के किस्से सुनाते थे। बड़े भाई की बातों का अशफ़ाक़ पे इतना असर हुआ कि वो बिस्मिल से मिलने का मन ही मन फैसला कर चुके थे। इन दोनों की मुलाकात का जरिया बनी उर्दू कविता अर्थात शायरी। अशफ़ाक़ ने कई बार कोशिश की मगर वो बिस्मिल से नहीं मिल पाए, परन्तु प्रयास करने वाली की कभी हार नहीं होती वाली कहावत यहाँ सत्यार्थ हो गयी।

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इतने प्रयासों के बाद वर्ष 1922 में इन दोनों की पहली मुलाकात नॉन-कोऑपरेशन (असहयोग आन्दोलन) अभियान के दौरान हुयी।  इस वक़्त शाहजहाँपुर के लोगो को अभियान से जुड़ने और इस अभियान के बारे में बताने के लिए बिस्मिल शाहजहाँपुर आये हुए थे और इसी सभा में अशफ़ाक़ पहली बार बिस्मिल से मिले। अशफ़ाक़ ने अपना परिचय बिस्मिल को देते हुए बताया कि वो उनके दोस्त के छोटे भाई हैं। वक़्त के साथ साथ यह मुलाकात एक अटूट दोस्ती में बदल गयी। दोस्ती का आलम ऐसा था कि अब अशफ़ाक़ जब भी कुछ लिखते तो उसे बिस्मिल को जरुर दिखाते और बिस्मिल भी अशफ़ाक़ की कमियों को समझाते। चूँकि दोनों शायर थे अत: ऐसे भी कई मौके आये जब इन दोनों ने एक ही मंच पर मुशायरा किया।

चूँकि उस वक़्त देश ब्रिटिश सरकार के अधीन थी अत: क्रांतिकारियों गतिविधियाँ होती रहती थी। ऐसी ही एक घटना थी काकोरी कांड, जिसमे इन दोनों शायरों ने जुनूनी क्रन्तिकारी की भूमिका निभायी थी। दरअसल क्रांतिकारियों का मानना था कि सिर्फ अहिंसा के दम पर आज़ादी के सपने नहीं देखे जा सकते, यदि देश को आज़ाद कराना है तो ब्रिटिश सरकार से लोहा लेना पड़ेगा, जिसके लिए बम, पिस्तौल और दूसरे हथियारों का उनके पास होना बेहद आवश्यक है, जो कि ब्रिटिश साम्राज्य बढती दमनकारी नीतियों को कम करने के लिए अतिआवश्यक था। असहयोग आंदोलन की विफलता के बाद कुछ क्रांतिकारियों ने अहिंसा के पथ को छोड़ ब्रिटिश सरकार को अपनी ताकत दिखाना चाहते थे, मगर इनके सामने समस्या थी धन की कमी।

एक दिन पंडित राम प्रसाद बिस्मिल शाहजहाँपुर से लखनऊ का सफ़र ट्रेन द्वारा तय कर रहे थे। बिस्मिल ने देखा कि हर एक स्टेशन मास्टर गार्ड को पैसो से भरा एक बैग दे रहा था, जिसे एक कैबिन में रखा जा रहा था, जो कि लखनऊ में हायर ब्रिटिश अधिकारी के लिए भेजा जा रहा था। बिस्मिल को क्रांतिकारियों की धन की कमी दूर होती नज़र आने लगी और उन्होंने ब्रिटिश सरकार का धन लूट इस धन का प्रयोग उन्हीं के खिलाफ करने की पूरी योजना तैयार कर ली और इस तरह काकोरी ट्रेन लूट की नींव रखी गयी।

अब था कि बिस्मिल के इस सपने को पूरा कैसे किया जाए, अत: 8 अगस्त 1925 को शाहजहाँपुर में एक सभा का आयोजन किया गया और निर्णय लिया गया कि सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर में जाने वाली ब्रिटिशों की तिजोरी को लूट लिया जायेगा। 9 अगस्त 1925  को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी “आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन” को चेन खींच कर रोका गया तथा क्रान्तिकारी पण्डित बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद व 6 अन्य सहयोगियों की मदद से समूची ट्रेन में मौजूद सरकारी खजाना लूट लिया गया । 6 अन्य क्रान्तिकारी राजेन्द्र लहिरी, सचिन्द्र नाथ बक्षी, मुकुन्दी लाल, मन्मथ नाथ और मुरारी लाल थे। इन क्रान्तिकारियों के पास पिस्तौलों के अतिरिक्त जर्मनी के बने चार माउजर भी थे, जो देखने में आटोमेटिक रायफल की तरह लगते थे। इन माउजरों की मारक क्षमता अधिक होती थी उन दिनों ये माउजर आज की एके-47 रायफल की तरह चर्चित हुआ करते थे।

मगर जल्द ही इनकी गिरफ़्तारी हो गयी, और इन पर सरकार बनाम राम प्रसाद बिस्मिल व अन्य के नाम से ऐतिहासिक मुकदमा चलाया गया।

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