• भारत में व्हाट्सऐप के करीब 40 करोड़ यूजर्स हैं, जबकि जियो के 38 करोड़ ग्राहक

  • 22 अप्रैल को लॉकडाउन के बीच रिलायंस जियो और फेसबुक में ई-रिटेल शॉपिंग में उतरने को बड़ी डील

  • वर्ष 2027 तक यह कारोबार 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है

–डा. जयंतीलाल भंडारी

इन दिनों पूरा देश और पूरी दुनिया सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (MSME) क्षेत्र के करीब चार लाख उद्यमियों के द्वारा एक साथ कोविड-19 की चुनौतियों के बीच कारोबार को फिर से खड़ा करने को लेकर हाल ही में लिए गए उस सबसे बड़े ऑनलाइन कारोबार पाठ्यक्रम के महत्त्व को समझते हुए दिखाई दे रही है, जिसका नाम गिनीज बुक ऑफ  वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया है। गौरतलब है कि देश के छोटे उद्योग कारोबार ने भी कोविड-19 के संकट के बीच ऑनलाइन कारोबार की अहमियत को समझ लिया है। इन दिनों कोविड-19 की चुनौतियों के बीच देशभर में ऑनलाइन खरीददारी के बढ़ते हुए दौर में ई-कॉमर्स कंपनियां जहां तेजी से कारोबार बढ़ाते हुए दिखाई दे रही हैं, वहीं ई-कॉमर्स कंपनियां रोजगार देने के लिए तेजी से नई नियुक्तियां करते हुए भी दिखाई दे रही हैं। हाल ही में विश्व प्रसिद्ध ग्लोबल डेटा एजेंसी स्टेटिस्टा के द्वारा लॉकडाउन और कोविड-19 के बाद जिंदगी में आने वाले बदलाव के बारे में जारी की गई वैश्विक अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 46 प्रतिशत लोगों का मानना है कि वे अब भीड़भाड़ में नहीं जाएंगे। ऐसे में भारत में भी उपभोक्ताओं की आदत और व्यवहार में भारी बदलाव के मद्देनजर ऑनलाइन खरीददारी छलांगे लगाकर बढ़ते हुए दिखाई दे रही है।

स्थिति यह है कि कोविड-19 के बीच भारत में खुदरा कारोबार (रिटेल ट्रेड) के ई-कॉमर्स बाजार की चमकीली संभावनाओं को मुठ्ठियों में करने के लिए दुनियाभर की बड़ी-बड़ी ऑनलाइन कंपनियों के साथ-साथ भारत के व्यापारिक संगठनों के द्वारा भी स्थानीय किराना दुकानों व कारोबारियों को ऑनलाइन जोडऩे के प्रयास की नई रणनीति बनाई जा रही है। गौरतलब है कि विगत 22 अप्रैल को लॉकडाउन के बीच रिलायंस जियो और फेसबुक में ई-रिटेल शॉपिंग में उतरने को बड़ी डील हुई है। फेसबुक ने जियो प्लेटफॉर्म्स में 5.7 अरब डॉलर लगाकर 9.9 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदने की घोषणा की है। अब रिलायंस का जियोमार्ट और फेसबुक का व्हाट्सऐप प्लेटफॉर्म मिलकर भारत के करीब तीन करोड़ खुदरा कारोबारियों और किराना दुकानदारों को पड़ोस के ग्राहकों के साथ जोड़ने का काम करेंगे। इनके लेन-देन डिजिटल होने से पड़ोस की दुकानों से ग्राहकों को सामान जल्द मिलेगा और छोटे दुकानदारों का कारोबार भी बढ़ेगा।

भारत में व्हाट्सऐप के करीब 40 करोड़ यूजर्स हैं, जबकि जियो के 38 करोड़ ग्राहक हैं। इसी तरह जहां एमेजॉन, फ्लिपकार्ट-वालमार्ट और स्नैपडील जैसी अधिकांश ई-कॉमर्स कंपनियों ने भारत में किराना और ऑफलाइन स्टोर को अपने साथ जोड़ने की नई पहल शुरू की है, वहीं ऑफलाइन रिटेल एसोसिएशन कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने भी उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के साथ मिलकर देश के कारोबारियों के लिए राष्ट्रीय ई-कॉमर्स बाजार तैयार करने की रणनीति तैयार करने का संकेत दिया है। सीएआईटी का कहना है कि इस रणनीति के तहत एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जाएगी, जहां स्थानीय किराना दुकानें ऑनलाइन ऑर्डर लेने में सक्षम हो सकेंगी और दूरदराज तक निर्बाध किफायती आपूर्ति और डिजिटल भुगतान दोनों ही सुनिश्चित हो सकेंगे। निश्चित रूप से कोविड-19 ने भारत में ई-कॉमर्स बाजार की डगर को चमकीला बना दिया है। डेलॉय इंडिया और रिटेल एसोसिएशन ऑफ  इंडिया की रिपोर्ट 2019 में बताया गया था कि भारत का ई-कॉमर्स बाजार वर्ष 2021 तक 84 अरब डॉलर का हो जाएगा, जो कि 2017 में महज 24 अरब डॉलर था। लेकिन अब कोविड-19 के बाद जिस तरह ई-कॉमर्स बढ़ने की संभावना दिखाई दे रही है, उससे अनुमान किया गया है कि वर्ष 2027 तक यह कारोबार 200 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। निःसंदेह ई-कॉमर्स ने देश में खुदरा कारोबार में क्रांति ला दी है। देश में इंटरनेट के उपयोगकर्ताओं की संख्या इस समय करीब 57 करोड़ से भी अधिक होने के कारण देश में ई-कॉमर्स की रफ्तार तेजी से बढ़ रही है। कोविड-19 के बीच भी भारतीय अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने और दुनिया की सर्वाधिक करीब 1.9 प्रतिशत विकास दर के स्तर की संभावना के पीछे भी एक कारण भारत का ई-कॉमर्स बाजार है। कोविड-19 के बाद आगामी वित्त वर्ष 2021-22 में भारतीय अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने की जो संभावना वैश्विक संगठनों ने बताई है, उसके पीछे भी ई-कॉमर्स की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि देश में खुदरा कारोबार में जैसे-जैसे विदेशी निवेश बढ़ा, वैसे-वैसे ई-कॉमर्स की रफ्तार बढ़ती गई। अब कोविड-19 के परिदृश्य में इस समय देश में ई-कॉमर्स नीति में बदलाव की जोरदार जरूरत अनुभव की जा रही है। केंद्र सरकार पिछले एक वर्ष से वर्तमान ई-कॉमर्स नीति को बदलने की डगर पर आगे बढ़ते हुए दिखाई भी दी है। ई-कॉमर्स नीति में बदलाव के लिए केंद्र सरकार के उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग के द्वारा विचार मंथन हेतु नई ई-कॉमर्स नीति का मसौदा विभिन्न पक्षों को विचार-मंथन के लिए जारी किया जा चुका है। इस मसौदे में ऐसी कुछ बातें खास तौर पर कही गई हैं जिनका संबंध ई-कॉमर्स की वैश्विक और भारतीय कंपनियों के लिए समान अवसर मुहैया कराने से है ताकि छूट और विशेष बिक्री के जरिए बाजार को न बिगाड़ा जा सके।

मसौदे में कहा गया है कि यह सरकार का दायित्व है कि ई-कॉमर्स से देश की विकास आकांक्षाएं पूरी हों तथा बाजार भी विफलता और विसंगति से बचा रहे। इस मसौदे के तहत ई-कॉमर्स कंपनियों के द्वारा ग्राहकों के डेटा की सुरक्षा और उसके व्यावसायिक इस्तेमाल को लेकर तमाम पाबंदी लगाए जाने का प्रस्ताव है। इस मसौदे में ऑनलाइन शॉपिंग से जुड़ी कंपनियों के बाजार, बुनियादी ढांचा, नियामकीय और डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसे बड़े मुद्दे शामिल हैं। इस मसौदे में यह मुद्दा भी है कि कैसे ऑनलाइन शॉपिंग कंपनियों के माध्यम से निर्यात बढ़ाया जा सकता है। निश्चित रूप से अब कोविड-19 के मद्देनजर नई ई-कॉमर्स नीति के तहत सरकार के द्वारा भारत के बढ़ते हुए ई-कॉमर्स बाजार में उपभोक्ताओं के हितों और उत्पादों की गुणवत्ता संबंधी शिकायतों के संतोषजनक समाधान के लिए नियामक भी सुनिश्चित किया जाना होगा। सरकार के द्वारा नई ई-कॉमर्स नीति के तहत देश में ऐसी बहुराष्ट्रीय ई-कॉमर्स कंपनियों पर उपयुक्त नियंत्रण करना होगा जिन्होंने भारत को अपने उत्पादों का डंपिंग ग्राउंड बना दिया है। यह पाया गया है कि कई बड़ी विदेशी ई-कॉमर्स कंपनियां टैक्स की चोरी करते हुए देश में अपने उत्पाद बड़े पैमाने पर भेज रही हैं। ये कंपनियां इन उत्पादों पर गिफ्ट या सैंपल का लेबल लगाकर भारत में भेज देती हैं। नई ई-कॉमर्स नीति में अनुमति मूल्य, भारी छूट और घाटे के वित्तपोषण पर लगाम लगाने की व्यवस्था करनी होगी, जिससे सबको काम करने का समान अवसर मिल सके। हम उम्मीद करें कि सरकार नई ई-कॉमर्स नीति को अंतिम रूप देने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ेगी।

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