History of artificial Color in hindi :रंग (Colours) हजारों वर्षों से हमारे जीवन में अपनी जगह बनाए हुए हैं। बिना रंगों के हमारा जीवन भी नीरस सा हो जाएगा। जहां आजकल कृत्रिम रंगों (Artificial colours) का उपयोग जोरों पर है वहीं प्रारंभ में लोग प्राकृतिक रंगों (Naturall Colours)को ही उपयोग में लाते थे। उल्लेखनीय है कि मोहन जोदड़ों और हड़प्पा की खुदाई में सिंधु घाटी सभ्यता की जो चीजें मिलीं उनमें ऐसे बर्तन और मूर्तियां भी थीं, जिन पर रंगाई की गई थी। उनमें एक लाल रंग का कपड़े का टुकड़ा भी मिला।

विशेषज्ञों के अनुसार इस पर मजीठ या मजिष्‍ठा की जड़ से तैयार किया गया रंग (Colours) चढ़ाया गया था। हजारों वर्षों तक मजीठ की जड़ और बक्कम वृक्ष की छाल लाल रंग (Red colours) का मुख्‍य स्रोत थी। पीपल, गूलर और पाकड़ जैसे वृक्षों पर लगने वाली लाख की क्रिमियों की लाह से महाउर रंग तैयार किया जाता था। पीला रंग (Yellow colour) और सिंदूर हल्दी से प्राप्‍त होता था।  रंगों के बारे में रोचक जानकारी जानने के लिए पढ़े हमारी पोस्ट रंगों के बारे में अचरज भरी बातें जिन्हें नहीं जाना तो कुछ नहीं जाना

ऐसा बना बैंगनी रंग (Villoet colour)

करीब सौ साल पहले पश्चिम में हुई औद्योगिक क्रांति के फलस्‍वरूप कपड़ा उद्योग का तेजी से विकास हुआ। रंगों की खपत बढ़ी। प्राकृतिक रंग सीमित मात्रा में उपलब्ध थे। इसलिए बढ़ी हुई मांग की पूर्ति प्राकृतिक रंगों से संभव नहीं थी। ऐसी स्थिति में कृत्रिम रंगों (Artificial colours) की तलाश आरंभ हुई। उन्हीं दिनों रॉयल कॉलेज ऑफ केमिस्ट्री, लंदन में विलियम पार्कीसन एनीलीन से मलेरिया की दवा कुनैन बनाने में जुटे थे। तमाम प्रयोग के बाद भी कुनैन तो नहीं बन पायी, लेकिन बैंगनी रंग (Villoet colour) जरूर बन गया।

कृत्रिम रंग (Artificial Colour) को कहा जाता था मोव (Mauve)

महज संयोगवश 1856 में तैयार हुए इस कृत्रिम रंग को मोव (Mauve) कहा गया। आगे चलकर 1860 में माजेंटा, 1862 में एनलोन ब्ल्यू और एनलोन ब्लैक, 1865 में बिस्माई ब्राउन, 1880 में काटन ब्लैक जैसे रासायनिक रंग अस्तित्व में आ चुके थे। शुरू में यह रंग तारकोल से तैयार किए जाते थे। बाद में इनका निर्माण कई अन्य रासायनिक पदार्थों के सहयोग से होने लगा।

नील बनाने के लिए मिला नोबेल पुरस्कार (Nobel Prize)

जर्मन रसायनशास्त्री एडोल्फ फोन ने 1865 में कृत्रिम नील के विकास का कार्य अपने हाथ में लिया। कई असफलताओं और लंबी मेहनत के बाद 1882 में वे नील की संरचना निर्धारित कर सके। इसके अगले वर्ष रासायनिक नील भी बनने लगे। इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बइयर साहब को 1905 का नोबेल पुरस्कार भी प्राप्‍त हुआ था।

जब बांटे गए मुफ्त रंग

मुंबई का रंग का धंधा करने वाली कामराजजी नामक फर्म ने सबसे पहले 1867 में मजेंटा का आयात किया था। 1872 में जर्मन रंग विक्रेताओं का एक दल एलिजिरिन नामक रंग लेकर यहां आया था। इन लोगों ने भारतीय रंगरेंजों के बीच अपना रंग चलाने के लिए तमाम हथकंडे अपनाए।

आरंभ में उन्होंने नमूने के रूप में अपने रंग मुफ्त बांटे। नाममात्र की कीमत पर उधार बेचे। बाद में अच्छा खासा ब्याज वसूला। वनस्पति रंगों के मुकाबले रासायनिक रंग काफी सस्ते थे। इनमें तात्कालिक चमक-दमक भी खूब थी। यह आसानी से उपलब्ध भी हो जाते थे। इसलिए हमारी प्राकृति रंगों की परंपरा यह रंग आसानी से कब्जा जमाने में कामयाब हो गए।

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