देहरादून 14 मार्च (एजेंसी) आज यानी कि 14 मार्च को चैत्र मास की संक्रान्ति है, जिसे भारतीय कलैंडर का प्रथम दिन माना जाता है। बता दे कि इसी दिन उत्तर भारत में स्थित उत्तराखण्ड राज्य में फूलदेई नामक एक लोक पर्व मनाया जाता है, जिसे बसन्त ऋतु के आगमन का त्यौहार माना जाता है। बता दे कि इस दिन छोटे बच्चे सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली या फ्यूंली, बुरांस आदि जंगली फूलो के साथ साथ कई अन्य प्रकार के फूलों को चुनकर थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते और नारियल के साथ सजाकर घर की देहरी पर लोकगीतों को गाते है तथा देहरी का पूजन करते हैं-

फूल देई, छम्मा देई,

देणी द्वार, भर भकार,

ये देली स बारम्बार नमस्कार,

फूले द्वार, फूल देई-छ्म्मा देई।’

वहीँ पौराणिक मान्यता के अनुसार स्कन्द पुराण के नागर खण्ड में इस पर्व के बारे में बताया गया है, जिसके अनुसार एक बार असुरों ने धरती के साथ साथ स्वर्ग पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। इससे विचलित तथा अपने राज्य से विहीन देवराज इन्द्र ने  निर्जन हिमालय में असुरों के विनाश हेतु मृत्यु के देवता भगवान शंकर की आराधना शुरू की। इंद्र देव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर प्रकट हुए और उन्होंने प्रसन्न हो कर कहा –केदारयामि यानी कि किसका वध करूँ ? तब इन्द्र ने कहा प्रभु आप प्रसन्न हैं तो इन बलशाली 5 असुरों का आप वध कर दें। इस बात को सुनकर भगवान शंकर ने कहा कि तुमने पांच ही असुरों का वध करने के लिए कहा, सभी के लिए क्यों नहीं? इन्द्र ने इस सवाल का जवाब देते हुए कहा कि इन 5 के मरने पर असुर जाति मृत ही समझो अत: व्यर्थ का खून खराबा क्यों करना।

इंद्र की इस बात से प्रसन्न हो भगवान शिव ने कहा कि हे इन्द्र ! मैं तुम पर प्रसन्न हूँ, तुम मुझसे और वरदान मांग सकते हो। तब इन्द्र ने कहा भगवान आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं तो आप आज से हमेशा इस स्थान पर निवास करें। चूँकि आपने ने यहां पर पहला शब्द केदार का उच्चाण किया इसलिए आप यहाँ केदार नाम से जाने जाए। तब भगवान तथास्तु कह कर वहीँ अन्तर्ध्यान हो गए।  इसके बाद से इन्द्र इस स्थान पर मन्दिर बना कर नित्य आराधना करने लगे और यह स्थान केदार नाम से विख्यात हुआ।

पौराणिक कथाओं के अनुसार वृश्चिक संक्रांति के दिन इन्द्र ने देखा कि मन्दिर बर्फ के नीचे पूरी तरह लापता है, अथक प्रयास के बावजूद इन्द्र को मन्दिर या शिव के दर्शन नहीं हुए। इससे इन्द्र दुखी हुए, हालाँकि इसके बावजूद इंद्र दार हिमालय में भगवान शिव के पूजन हेतु आते रहे। समय बदला, मीन संक्रांति के दिनों का आगमन हुआ,  बर्फ पिघलने पर इन्द्र को भगवान शंकर के मन्दिर के दर्शन हुए। मंदिर देख इंद्र प्रसन्न हुए, उन्होंने स्वर्ग से सभी लोगों अप्सराओं व यक्ष-गन्धर्वों को उत्सव मनाने का आदेश दिया जिससे सारे हिमालय में भगवान शंकर की आराधना में अप्सराएं जगह जगह मार्गों एवं हर घर में पुष्प वृष्टि करने लगी। तब से केदार हिमालय में यह उत्सव परम्परा आज तक जारी है। आज भी मीन संक्रांति के दिन परियों और अप्सराओं की प्रतीक छोटी–छोटी बेटियां हर घर में फूलों की वर्षा करती हैं। वहीँ कुछ स्थानों पर केवल संक्रांति के दिन, कुछ जगहों पर 8 दिन, कुछ जगहों पर पूरे महीने घरों में फूल डाल कर यह उत्सव मनाया जाता है।

 

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