Botanical Garden the place of education research and development : शोभाकारी उद्यानों में पाये जाने वाले हरे-भरे एवं रंग-बिरंगे पुष्प और पेड़-पौधे सभी को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं। यही नहीं, ये उद्यान मानव जीवन से आदिकाल से ही बहुत निकट संबंध रखते हैं। मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक, लगभग सभी कार्य-कलापों एवं संस्कारों में शोभाकारी उद्यानों की उल्लेखनीय भूमिका रही है। सभी देवस्थानों एवं पूजा-प्रतिष्ठानों के अतिरिक्त, बड़े-बड़े नगरों में स्थित राजाप्रसादों से लेकर छोटे-छोटे ग्रामों के गरीब किसानों तक की झोपड़ी तक में शोभाकारी वनस्पतियों के दर्शन होते हैं। वास्तव में शोभाकारी वनस्पतियों और उद्यान मानव जीवन में सौन्यर्दबोध के प्रतीक हैं, लेकिन आज स्वार्थी मनुष्य अपनी भूख मिटाने हेतु इन अमूल्य वनस्पतियों का विनाश करने पर तुला हुआ है। इसी कारणवश अनेक पेड़-पौधों की कुछ प्रजातियां पूर्णतः लुप्त हो गयी हैं तथा कुछ लुप्त होने की कगार पर है। अतः इस अमूल्य धरोहर को बचाये रखना हमारा परम कर्तव्य बन जाता है। इस दिशा में सफलता प्राप्त करने के लिए उपयुक्त जगह है अच्छे वानस्पतिक उद्यानों का विकास करना, उनकी देखभाल करना आदि।

 

वैसे हमारे देश में कई अच्छे वानस्पतिक उद्यान (Botanical Garden) हैं जो विश्व में अपनी विशेषता बनाये हुए हैं। कलकत्ता का शिवपुर स्थित राॅयल वानस्पतिक उद्यान (Royal Botanical Garden Calcutta) विश्व के विशेष उद्यानों में गिना जाता है, तो लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान और, वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून का वानस्पतिक उद्यान, ऊटी का राजकीय वानस्पतिक उद्यान, बंगलौर का लाल बाग, दार्जिलिंग का लोएड वानस्पतिक उद्यान तथा सहारनपुर का बागवानी अनुसंधान संस्थान, भी किसी से कम नहीं है। ये सभी उद्यान अपने-अपने विशेष पेड़-पौधों के संग्रह के लिए प्रसिद्ध हैं। इन सभी उद्यानों ने अपने आसपास के क्षेत्रों से संबंधित सभी नयी नयी फसलों की खेती को प्रोत्साहन दिया है। शोभाकारी पौधों ने जहां एक तरफ सौंदर्य बढ़ाया है, दूसरी तरफ उनकी खेती को भी व्यावसायिक दर्जा इन्हीं उद्यानों की मदद से मिला है। इन उद्यानों की सहायता से किसान नये-नये पौधों की खेती के वैज्ञानिक गुर सीखते हैं तथा अपनी आमदनी बढ़ाने में काफी हद तक सफल हुए हैं।

 

हमारे देश के सभी वानस्पतिक उद्यान न केवल सौन्दर्य का आनन्द प्रदान करते हैं, बल्कि ये वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा, अनुसंधान एवं विकास के प्रतीक हैं। ये सभी उद्यान वैज्ञानिक तौर-तरीकों के आधार पर विकसित किये गये हैं तथा इनका उद्देश्य न केवल सौन्दर्य बढ़ाना है, बल्कि वैज्ञानिक, शैक्षिक एवं सामाजिक विकास को बढ़ाया देना है। आज के हालातों को देखकर अधिक से अधिक वानस्पतिक उद्यानों की स्थापना करना अति अनिवार्य हो गया है। इन उद्यानों की वजह से हमारे देश में अनेक नए नए पेड़ पौधे विदेश से लाए गए हैं तथा उनकी खेती शुरू की गयी है। इस प्रकार इस तरह के बहुत से नए पेड़-पौधों ने हमारे देश में एक क्रांति सी ला दी है। अर्थात हमारे सामाजिक एवं आर्थिक विकास में इन वानस्पतिक उद्यानों की भागीदारी को नकारा नहीं जा सकता। इसी प्रकार शिक्षा के क्षेत्र में भी ये उद्यान कम नहीं है। हर वर्ष कितने ही विद्यार्थी वनस्पति शास्त्र में इन उद्यानों में शिक्षा ग्रहण करते हैं एवं वनस्पति शास्त्र की विभिन्न शाखाओं में स्नातकोत्तर एवं शोध द्वारा डाक्टरेट की उपाधि हासिल करते हैं।

राॅयल बोटेनिक गार्डन कलकत्ता
भारत में जब वानस्पतिक उद्यानों की बात शुरू होती है तो सबसे पहले कलकत्ता का राॅयल बोटेनिक गार्डन या भारतीय वानस्पतिक उद्यान का नाम आता है। यह विश्व प्रसिद्ध उद्यान हमारे देश का सबसे पुराना उद्यान है। दुनिया के बड़े उद्यानों में भारत के इसी उद्यान की गिनती की जाती है। यह उद्यान हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरे एशिया में सबसे पुराना है। इसकी स्थापना का कार्य सन् 1787 में लेफ्टीनेट कर्नल रार्बट क्याड् ने शुरू किया था। विश्व प्रसिद्ध यह उद्यान कलकत्ता से कुछ मील की दूरी पर हुगली नदी के किनारे बसा हुआ है तथा इसका क्षेत्रफल करीब 112 हेक्टेयर है। इस जगह का असली नाम शिबपुर है। कर्नल राबर्ट उस समय ईस्ट इंडिया कम्पनी की सेना में एक आॅफिसर की हैसियत से काम करते थे। इस उद्यान की स्थापना का उद्ेश्य सिर्फ मसालों वाले पेड़-पौधों की भारत में खेती करना था क्योंकि यह अंग्रेजी कम्पनी उस समय हमारे देश में राज्य कर रही थी तथा इसका अपना उद्देश्य बस इन्हीं चीजों का व्यापार करना था जिनसे उसे ज्यादा से ज्यादा मुनाफा होता था। इसी प्रकार अन्य पेड़ों को भी इस उद्यान में लगाया गया, जैसे टीका के पेड़ों की लकड़ी की उन्हें अपने जहाज आदि बनाने में जरूरत पड़ती थी, टीक के पेड़ भी इस उद्यान में लगाये गये। रार्बट क्याडू करीब छह वर्षों तक इस उद्यान में संयोजक रहे। उस दौरान इसका उद्देश्य सिर्फ आर्थिक लाभ कमाना ही रहा।

इसके बाद सन् 1793 में इस उद्यान की बागडोर विश्वविख्यात वनस्पति विज्ञानी डा. विलियम राक्सबर्ग के हाथों में चली गयी तथा डा. राक्सबर्ग की वजह ये यह उद्यान वैज्ञानिक वानस्पतिक उद्यान के रूप में बदल गया। डा. राक्सबर्ग हमारे देश में मद्रास स्थित कम्पनी में वनस्पति वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत थे तथा उन्हें भारत की वानस्पतिक सम्पदा का पूर्ण ज्ञान था। इसी योग्यता का उन्होंने पूरा लाभ उठाया। डा. राक्सबर्ग ने इस उद्यान में एक हर्बेरियम की स्थापना की तथा हर्बेरियम में पूरी दुनिया से सूखे एवं जीवित पेड़ पौधों को लेकर एकत्र किया। हरे, जीवित पेड़-पौधे तथा सूखे पेड़ और अन्य फूल पत्तियों को हर्बेरियम में सजाने का उद्देश्य कवेल विद्यार्थियों को उनके बारे में ज्ञान प्रदान करना था जिससे सभी विद्यार्थी एक स्थान पर पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सकें।

 

इसी दौरान डा. राक्सबर्ग का संपर्क दक्षिण भारत में कार्यरत वनस्पति वैज्ञानिक श्री केनिंग तथा वनस्पति जगत के जनक लिनियस से हुआ। डा. राक्सबर्ग की कार्य-कुशलता से खुश होकर ईस्ट इंडिया कम्पनी ने वानस्पतिक उद्यान के विस्तार के लिए आर्थिक मदद दी। इस प्रकार डा. राक्सबर्ग ने सन् 1814 में भारतीय पेड़ों की करीब 3,500 जातियों का एक केटलाग प्रकाशित किया। इसका नाम हार्टस बेगांलेन्सिस रखा गया। दुर्भाग्यवश डा. राक्सबर्ग उसी दौरान बीमार पड़ गये तथा सन 1815 में वे दुनिया से चल बसे। डा. राक्सबर्ग ने कई अन्य प्रकाशन भी शुरू किए थे जो उनके अपने किए कार्य पर आधारित थे। ये थे: फ्लोरा इंडिका, प्लांटा कोरोमंडलियाना आदि। डा. मित्रा ने जो इस उद्यान के निदेशक रहे, अपने कार्यकाल में इन प्रकाशनों की बहुत सी प्रतियां बनवाकर दुनिया के सभी वानस्पतिक उद्यानों को उपलब्ध करायी, ताकि सभी उनके अमूल्य कार्य का यथावत लाभ उठा सकें।

डा. राक्सवर्ग के बाद श्री बुचानन हैमिलटन की बारी आयी, लेकिन इन्होंने उद्यान में कोई खास कार्य नहीं किया तथा थोड़े से समय के बाद डा. नैथानिल वैलिच ने उद्यान की जिम्मेदारी संभाली। सन् 1817 में उद्यान का पद भार संभालने के बाद 30 साल तक इन्होंने उद्यान की प्रगति के लिए दिन रात कार्य किया। उन्होंने उद्यान के हर्बेरियम में हजारों तरह के नए-नए नमूने इकट्ठे किए तथा सभी पेड़-पौधों की एक सूची तैयार की जो आज भी उद्यान के पुस्तकालय में संदर्भ के रूप में प्रयोग की जाती है। यह सूची ‘‘वैलिचस केटलाग’’ के नाम से पुस्तकालय में उपलब्ध है। डा. वैलिच के बाद फालकानर तथा थामसन ने बारी बारी से उद्यान की सत्ता का कार्यभार संभाला। ये दोनों व्यक्ति जाने-माने वैज्ञानिक थे। इन्होंने उद्यानों में काफी प्रगति की। डा. थामसन के बाद सन् 1861 में थोड़े से समय के लिए डा. थामस एन्डरसन ने उद्यान के निदेशक का कार्यभार संभाला। डा. थामस ने उद्यान में आर्थिक वनस्पति विज्ञान को बढ़ावा दिया तथा चिनचोना जैसी फसलों को विदेशों से लाकर भारत मंे पैदा करने का काम उन्होंने शुरू किया। इन्होंने इस उद्यान को विभिन्न फसलों की स्थापना केन्द्र बना दिया। और उन्हीं के प्रयासों के फलस्वरूप सिक्किम राज्य में चिनचोना की खेती व्यावसायिक रूप से होने लगी। अपने विशेष कार्य में लीन डा. थामस किसी बीमारी से पीड़ित हो गये तथा चल बसे। इस घटना के बाद श्री सी.बी. क्लार्क उद्यान के प्रभारी बने तथा उन्होंने सन् 1871 तक यह कार्यभार संभाला। सन् 1871 में ही उद्यान की सत्ता डा. जार्ज किंग के हाथों में चली गयी जो वास्तव में एक अच्छे गार्डन-डिजाईनर तथा बागवानी वैज्ञानिक थे। डा. जार्ज का कार्य करने का ढंग बहुत ही वैज्ञानिक तौर-तरीकों पर आधारित था लेकिन दुर्भाग्यवश सन् 1864 में हुगली नदी में आए भारी तूफान ने इनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया। हजारों पेड़-पौधे, झाड़िया व अन्य सामग्री उस तूफान में बह गयी। इस तूफान से करीब आधा पेड़-पौधों का संग्रह बहकर नष्ट हो गया। कुछ समय के बाद एक दूसरा तूफान आया जिसने 750 पेड़ों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार डा. जार्ज ने नष्ट हुए उद्यान में कृत्रिम रूप से लेक आदि का विकास किया तथा उद्यान में भू-सौन्दर्यकरण की ओर ध्यान दिया।

हालांकि डा. जार्ज कलकत्ता के राॅयल बोटेनिक गार्डन के मुख्य बागवानी डिजाईनर के नाम से जाना जाते हैं लेकिन उनका योगदान एक उत्कृष्ट वनस्पति वैज्ञानिक के रूप में भी कम नहीं है। यह वानस्पतिक उद्यान आज भी उन्हीं का दिया हुआ रूप है। सन 1887 में डा. जार्ज ने ‘‘एनल्स आॅफ द राॅयल बोटेनिक गार्डन’’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो आज भी वनस्पति जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसके बाद सन् 1890 में डा. जार्ज ने ‘‘बोटेनिकल सर्वे आॅफ इंडिया’’ नामक महान कार्य का श्री गणेश किया, जो आज भी इस क्षेत्र में सिर्फ एक मात्र वैज्ञानिक संस्था है। डा. जार्ज के बाद कई वैज्ञानिकों ने विकास की दिशा में कई कार्य किए लेकिन आज जो भी है वह सिर्फ डा. जार्ज द्वारा की गयी मेहनत का फल है। उनके बाद सर डेविड प्रेन, जो बाद में क्यु स्थित राॅयल बोटेनिक गार्डन के निदेशक बने, ने कुछ समय तक इस उद्यान का कार्यभार संभाला था। उनके बाद के.बिसवास उद्यान के पहले भारतीय निदेशक बने। बाद में डा. डी चटर्जी तथा डा. मित्रा जैसे महान वैज्ञानिकों ने इस उद्यान का कार्यभार संभाला और अनेक विकास कार्य किये।

राॅयल बोटेनिक गार्डन….आज
कलकत्ता का विश्व प्रसिद्ध भारतीय वानस्पतिक उद्यान विभिन्न वनस्पतियों के समूह के संग्रह के लिए अपनी तरह का अलग ही उद्यान है। उद्यान में भारत, म्यांमार और मलेशिया की सम्पूर्ण वनस्पतियां विद्यमान है। हमारे देश में चाय, चिनचोना तथा महोगनी नामक कितने ही पौधों की खेती का काम इसी उद्यान से शुरू हुआ। वास्तव में सामान्य वनस्पति जगत का विज्ञान एवं वनस्पतियों के वर्गीकरण के विज्ञान का जन्मदाता यही उद्यान है। वनस्पतियों की खोज का कार्य भी इसी उद्यान से शुरू हुआ तथा यही कारण है कि ऐसी सभी खोजों का श्रेय भी इसी उद्यान को जाता है। विभिन्न जगहों के वनस्पति समूहों का लेखा-जोखा भी इसी उद्यान में पाया जाता है।
इस उद्यान की प्रमुख विशेषता दुनिया के सबसे पुराने वट वृक्ष से शुरू होती है। इस वृक्ष की उम्र 220 से भी ज्यादा है। यह वृक्ष करीब डेढ़ हेक्टेयर जमीन को अपनी छाया से ढके रखता है। इस प्रकार दुनिया के सबसे बूढ़े वृक्ष की चैड़ाई करीब 456 मीटर हो गयी है। इसकी ऊंची टहनियां तथा लम्बा चैड़ा आकार बहुत ही अच्छा एवं मन को लुभाने वाला है। इस बरगद के महान वृक्ष की 1,125 से भी ज्यादा हवाई जड़ें पृथ्वी को छूती हुई बहुत ही आकर्षक लगती हैं। इस उद्यान में यह महान वृक्ष सबसे ज्यादा आकर्षण का बिन्दु है।

उद्यान का सौन्दर्यीकरणः यद्यपि उद्यान का सौन्दर्यीकरण अंग्रेजी ढंग से किया गया है। उद्यान में तरह-तरह की वनस्पतियों, पेड़-पौधों व वृक्षों को बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से सजाया गया है। आज इस उद्यान में करीब 15,000 जीवित पेड़-पौधे हैं। ये करीब 2,500 जातियों के नमूने हैं। इन सभी पेड़-पौधों को उनके भौगोलिक वर्गीकरण के अनुसार बांटा गया है। उद्यान में 26 झीलें हैं तथा 26 विभिन्न प्रकार के वृक्षों से आच्छादित मार्ग हैं। ये सभी मार्ग झीलों से होते हुए दो अच्छी पौधशालाओं तथा कोमल वनस्पतियों के दो रक्षाग्रहों से जुड़े हैं। झीलों में नौकाविहार की सुविधा उपलब्ध है, अनेकों पर्यटक इन झीलों में नौकाविहार करके प्राकृतिक सौंदर्य का पूर्ण आनंद लेते हैं। भू-सौन्दर्यीकरण के अनुसार सुसज्जित वृक्षों से आच्छादित मार्ग पर्यटकों को छाया के आनन्द का अनुभव देते हैं। उद्यान में सड़कें भी सौन्दर्य विज्ञान के अनुसार बनायी तथा सजायी गयी हैं। उद्यान में बनी करीब 10 मील लम्बी सड़क पार करने के बाद भी पता ही नहीं चलता कि इतना लम्बा सफर कैसे तय हो गया।

उद्यान का पाम हाउस
राॅयल बोटेनिक गार्डन का पाम-हाउस बहुत ही सुंदर है। इस हाउस की रचना सौन्दर्य को मुख्य आधार मानकर की गयी है। यह तारों के जाल से ढका हुआ अति सुन्दर लगता है। इसी प्रकार इस उद्यान में एक छोटा पाम-हाउस तथा एक अन्य पाम-हाउस है। ये दोनों भी अति सुन्दर पौधों से भरे हैं तथा अपने अच्छे खासे पेड़-पौधों के संग्रह के लिए प्रसिद्ध हैं। बड़े पाम-हाउस में तरह-तरह के आरोही पादपों की सुन्दर-सुन्दर पत्तियां, फर्न एवं छाया में रहने वाले पौधे विद्यमान हैं। कुछ अनोखे एवं असाधारण पाम भी इस पाम-हाउस में पाये जाते हैं। पाम-हाउस में विभिन्न लताएं भी सुन्दरता बढ़ाने में अपना योगदान देती है। विभिन्न लताओं वाले पौधों में ‘‘पौराना पैनिकुलेटा’’ की लहलहाती बेल अपने सफेद फलों के साथ आकर्षित करती हैं। इसकी यह बेल पूरे एक पाम हाउस की छत को पूर्ण रूप से ढके हुए, बर्फ से ढकी पहाड़ी की तरह लगती है।

पाम या ताड़ के पौधों का संग्रह बहुत ही सुन्दरतापूर्वक सजाया गया हैं। इस हाउस में पाम की करीब 40 जातियां पाई जाती हैं जिनमें से कुछ जातियां अपने सुन्दर रूप के लिए प्रसिद्ध हैं। पाम के पेड़ों में हाफेनी थिबेका नामक पाम अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध है। यह शााखादार पेड़ांे की तरह फलता-फूलता पाम है जो पाम-हाउस में दूर से चमकता है। कुछ विदेशी पाम संग्रह भी पाम-हाउस की शोभा बढ़ाने में कम नहीं है। इस प्रकार इस वानस्पतिक उद्यान में पाम संग्रह अपनी अलग विशेषता बनाए हुए हैं। अतः यह कहना बिल्कुल तर्कसंगत है कि उद्यान का पामेटम विश्वख्याति का है।

शोभाकारी बगीचा
वानस्पतिक उद्यान में फूलों वाले पेड़-पौधों का बगीचा अपना अलग महत्व रखता है। ये सभी पेड़-पौधे जब पश्चिम बंगाल की सुनहरी शरद ऋतु में खिलते हैं तो दृश्य देखने लायक होता है। खासकर उन पौधों पर फूल खिलते हैं जो यूरोपीय देशों में ग्रीष्म ऋतु में फूलते हैं अतः यूरोप की ग्रीष्म ऋतु का दृश्य बंगाल की शरद ऋतु में देखने को मिलता है। इन फूलों वाले शोभाकारी पेड़-पौधों की खेती की वैज्ञानिक जानकारी की शिक्षा इसी उद्यान में उपलब्ध करायी जाती है। इनके वैज्ञानिक गुर आम आदमियों, प्राइवेट संस्थाओं एवं सरकारी संस्थानों को सिखाये जाते हैं, जिससे हमारे देश में फूलों की खेती को प्रतिवर्ष बढ़ावा मिलता है। फूलों के बगीचे में कुछ विदेशी किस्म के फूलदार पेड़ों का भी संग्रह है जैसा कि हम जानते हैं कलकत्ता की जलवायु अपने आम में विशेष प्रकार की है, उस जलवायु में फूलों वाले पौधों को उगाकर नई-नई किस्मों का चयन का कार्य भी इस उद्यान में किया जाता है। उदाहरण के तौर पर गुलाब की कुछ किस्मों का उद्यान के वैज्ञानिकों के कठिन परिश्रम के बाद इस उद्यान में उगाया गया है। इस वैज्ञानिक कदम से गुलाब की खेती कलकत्ता जैसी जलवायु वाले सभी क्षेत्रों में की जाने लगी है।

 

उद्यान की पौधशाला
राॅयल बोटेनिक गार्डन की महान पौधशाला एशिया में सबसे अच्छी मानी जाती है। हालांकि इस पौधशाला का मुख्य उद्देश्य उद्यान के सभी पेड़-पौधों गमलो, बगीचों आदि के देखरेख के लिए आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना है, परन्तु प्रतिवर्ष कितने ही तरह के पेड़-पौधे, बीज, पौध आदि आम आदमी, सरकारी तथा गैर सरकारी संस्थाओं को भी बांटे जाते है। ये सभी चीजें बहुत सस्ते दामों पर उपलब्ध होती हैं।

कैक्टस एवं गूदेदार पौधे
गूदेदार पौधों से भरा एक विशेष बगीचा भी उद्यान की विशेषता है इस बगीचे में यूफाॅरबियेसी तथा कैक्टेसी कुल के अनेक पौधों का संग्रह किया गया है। कैक्टेसी कुल का अनोखा वंशज पैरिस्चिया गूदेदार पौधों तथा कैक्टस के पौधों से भरे बगीचे में अलग ही दिखता है। इस पौधे की पत्तियां आकर्षण का केन्द्र है। यह कैक्टस होते हुए भी पत्तीदार पौधा है।

उद्यान की जलीय लिलियां
जलीय उद्यान कलकत्ता के वानस्पतिक उद्यान की शोभा को चार-चांद लगा देता है। यह जलीय उद्यान शीतलता एवं ताजगी प्रदान करने के साथ-साथ विभिन्न जलीय लिलियों का दृश्य भी दिखता है। जलीय लिलियों का सबसे बड़ा कुल निम्फेसी है। इस कुल की विक्टोरिया अमेजोनिका नामक लिली उद्यान में आने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। उद्यान में अनेक झील और तालाब बनाये गये हैं जो जलीय लिलियों से भरे हुए बहुत सुन्दर लगते हैं। ये तालाब एवं झीलें जार्ज किंग के जमाने की बनी हुई हैं। लिलियों के भारी संग्रह में ‘विक्टोरिया अमेजोनिका’ की लम्बी-लम्बी तथा चैड़ी-चैड़ी पत्तियां जो पांच वर्ष के बच्चे के वजन सहन कर लेती हैं, बहुत ही आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं। इनके महकते दूध जैसे सफेद रंग के फूल जलीय उद्यान की शोभा बढ़ाते हैं। जुलाई से दिसम्बर माह तक ये लिलियां खिलती हैं। जलीय लिलियों का ऐसा संग्रह अन्य दूसरे उद्यान में न होने की वजह से वैज्ञानिकों का अनुसंधान केन्द्र भी यहीं है। यहां वैज्ञानिक खोज करके जलीय लिलियों की नई-नई किस्मों का विकास करते रहते हैं।

उद्यान के कुछ विशेष आकर्षण
इस वानस्पतिक उद्यान में दो सौ वर्ष से ज्यादा पुराने बरगद के वृक्ष के अलावा अन्य वृक्ष भी बहुत महत्वपूर्ण हैं, जैसे ‘टेरिगोटा एलेटा’ का पुष्पी पेड़ बहुत सुन्दर है, तीन वृक्ष बुरी नामक पाम या ‘कोरिफा अटन’ के है। जो अपने जीवनकाल में 40 से 50 वर्ष बाद सिर्फ एक बार फूल पैदा करते हैं। कैनन बाल के पेड़, केन्डल स्टिक ट्री, डबल कोकोनट पाम, जिसे ‘कोको द मर’ भी कहते हैं। सिनेमोन या दाल-चीनी, सेन्डल ट्री या चन्दन का पेड़, आयल-पाम, कैम्फर, नटमैग तथा विभिन्न प्रकार के बांस आदि अपनी-अपनी विशेषताओं के लिए कम नहीं है। उद्यान की जलीय लिलियां भी दुनिया में अपनी धाक बनाये हुए हैं।

उद्यान में दो पौधधर हैं तथा एक पुराने समय से आज तक पूर्ण पुस्तकालय है। वनस्पति विज्ञान का यह सबसे पुराना एवं विश्व प्रसिद्ध पुस्तकालय है। इन सभी के साथ-साथ वनस्पति विज्ञान के सभी विषयों से संबंधित प्रयोगशालाएं भी उद्यान की महिमा बढ़ाती है।

 

वानस्पतिक उद्यान की अन्य गतिविधियां
इस उद्यान में विद्यार्थियों को पढ़ाने के लिए एक गार्डन में जिस ‘स्टुडैन्टस सिस्टम गार्डन’ नाम से जाना जाता है। इस गार्डन को अच्छी तरह सजाया गया है। इस गार्डन में विद्यार्थियों को पौधों के वर्गीकरण संबंधी विज्ञान पढ़ाया जाता है। गार्डन से कुछ ही दूरी पर एक अन्य गार्डन है जिसमें विद्यार्थियों को प्रयोगात्मक ज्ञान दिया जाता है। इन सभी के अतिरिक्त गार्डन में व्यावसायिक फसलें भी लगायी गयी हैं। अतः विद्यार्थी प्रयोग करके व्यावसायिक बोध भी हासिल करते हैं। कुछ शोभाकारी पेड़-पौधों तथा सब्जियों की खेती भी इस गार्डन का महत्वपूर्ण भाग है। इस उद्यान में अन्य बागवानी फसलों के ऊपर भी खोजकार्य तथा फसल-सुधार कार्यक्रम चलते रहते हैं। गार्डन में अनाज वाली फसलों पर भी खोज कार्य होते रहते हैं।

वानस्पतिक उद्यान कलकत्ता के लिए एक आभूषण
कलकत्ता शहर के लिए विश्व प्रसिद्ध हमारा वानस्पतिक उद्यान एक आभूषण है। उद्यान में कार्यरत वैज्ञानिक एवं अन्य कर्मचारी इस आभूषण को निखारने में दिन-दूूनी रात चैगुनी मेहनत करते रहते हैं। जहां एक तरफ इस उद्यान से शोभाकारी पौधों की खेती को बढ़ावा मिला है, कई बागवानी फसलों की खेती को प्रोत्साहन मिला है वहीं दूसरी तरफ उद्यान ने हमारे देश की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति सुधारने में काफी मदद की है। अनेकों व्यावसायिक फसलों की खेती बड़े पैमाने पर इसी उद्यान की मदद से शुरू की गयी जैसे, रबड़, वैनिला, दालचीनी, गोरक अम्ली, कैरब या खरनुब, लौंग, मैंगस्टा आदि। कितने ही लकड़ी देने वाले वृक्षों को हमारे देश में लाया गया जिनकी मदद से भू-संरक्षण एवं पर्यावरण सुधार कार्यों में काफी सफलता मिली। इस प्रकार इस उद्यान ने विज्ञान और शोभाकारी पेड़-पौधों में सफलता हासिल करने के साथ-साथ मानव जाति को रोजगार दिया तथा हमारे देश के सामाजिक आर्थिक विकास में उच्च स्तरीय भूमिका निभायी है। अतः शिक्षा, अनुसंधान एवं चहुं-मुखी विकास में राॅयल बोटेनिक गार्डन एक अमूल्य आभूषण है जिसकी देखरेख करना हम सभी का परम कर्तव्य है।

 

 

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