Sundarban National Park Tourism: अनूठे सौंदर्य की विरासत है सुंदर वन जो करती है लोगो को अपनी ओर आकृषित

Sundarban National Park Tourism (2020) Tiger Reserve, Wildlife Sanctuary

Sundarban National Park Tourism (2020) Tiger Reserve, Wildlife Sanctuary : ‘‘सारे तीरथ बार-बार, गंगासागर एक बार’’– यह कहावत शायद इसलिए बनी थी कि पश्चिम बंगाल में गंगा के डेल्टाई क्षेत्र में बसे तीर्थ ‘‘गंगासागर’’ तक पहुंचना पहले काफी मुश्किल काम था। इसलिए परंपरा यह बन गई कि दूसरे तीर्थों की सैर के लिए आप चाहें हर साल जाएं लेकिन गंगासागर जीवन में सिर्फ एक बार! फिर तीरथ तो तीरथ, एक बार नहाए और जीवन भर का पाप कट गया। लेकिन इसी डेल्टाई क्षेत्र में स्थित विश्व की दुर्लभ विरासत- सुंदरवन (Sundarban) के साथ ऐसी कोई शर्त या मान्यता नहीं जुड़ी है। यहां तो वन्य प्राणियों से विशेष स्नेह रखने वाले वन्य प्रेमी लोग एक बार जाते हैं तो फिर बार-बार जाते हैं। आखिर सुंदरवन का अनूठा सौंदर्य है ही ऐसा, जो वन्य जीवन की छटा देखने के लिए लालायित लोगों को सदैव एक आमंत्रण देता प्रतीत होता है।

सुंदरवन (Sundarban) दरअसल 54 ऐसे द्वीपों का समूह जो पश्चिम बंगाल (west bengal) के दक्षिणी छोर पर यहां-वहां अवस्थित हैं। गंगा के मुहाने पर पसरे सुंदरवन के जंगल को दो अलग-अलग भौगोलिक परिस्थितियों की उपज माना जा सकता है। यहां एक ओर तो हिमालय के क्षेत्र से अथाह जलराशि बहाकर लाने वाली दो प्रमुख नदियां-गंगा और ब्रह्मपुत्र बंगाल की खाड़ी में विलीन होती हैं तो दूसरी ओर तिब्बत का वह पठार है जो यहां के लिए हर साल मानसून का सृजन करता है। इन विभिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां की जलवायु में ऐसी उमस भरी हुई है जो जंगल की विविध वनस्पतियों के फलने फूलने में अपना योगदान देने के साथ-साथ वन्य जीवों की रिहायश के तौर पर इस वन-प्रांत को विकसित करने में सहायक है। जब वनस्पतियों की बात चली है तो हम आपको बता दें कि कभी यहां ‘‘सुंदर’’ यानी हिरीटिओरा फाॅम्स नामक वृक्षों की ऐसी बहुलता थी कि बस, उन्हीं के जंगलों के नाम पर इस डेल्टाई क्षेत्र को ‘‘सुंदरवन’’ कहा जाने लगा। यह बात ओर है कि मनुष्य की बढ़ती आबादी की खातिर ‘‘सुंदरी’’ के जंगल शहीद हो गए। बताते हैं कि अब तो नाममात्र के लिए सुंदरी के आठ-दस पेड़ इस जंगल में बच पाए हैं।

वैसे संरक्षण की दृष्टि से देखें तो हमें पता चलता है कि सुंदरवन के 2,585 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल को, बाघों को संरक्षित करने वाली योजना-‘‘प्रोजेक्ट टाइगर’’ के अधीन सन् 1973 में ही शामिल कर लिया गया था। इसमें से 1330 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को बाकायदा राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दे दिया गया था ताकि यहां के वन्य जीवन की भली-भांति परवरिश हा सके। वन्य जीवन को संरक्षण देने के ये प्रयास कुछ हद तक सफल भी रहे क्योंकि यहां के बाघों की संख्या, जोकि एक समय केवल 60 रह गई थी, अब बढ़कर 269 तक पहुंच गई है। इस राष्ट्रीय उद्यान का 905 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पानी से घिरा हुआ है जिसमें विविध प्रकार के जलीय जीव-जंतु पाए जाते हैं।


वन्य जीवः
जब भी सुंदरवन के वन्य जीवन की बात की जाती है तो जेहन में सबसे पहले सिर्फ एक ही नाम उभरता है, वह है-शाही बाघ यानी राॅयल बंगाल टाइगर का। पैंथरा टिग्रिस अर्थात बंगाल के इस शानदार बाघ से सिर्फ सुंदरवन ही नहीं बल्कि समूचा संसार खौफ खाता है। सुंदरवन में तो बाघ के इस आतंक को चप्पे-चप्पे पर महसूस किया जा सकता है। कहते हैं कि यदि आप सुंदरवन में घूम रहे हैं तो कोई न कोई बाघ आपको जरूर देख रहा है। यही वजह है कि इस इलाके में रहने वाले 50 हजार मछुआरे जब मछली पकड़ने के लिए अपनी डोंगी लेकर निकलते हैं तो उनमें से अधिकांश अपने सिर के पीछे बाघ की शक्ल वाला मुखौटा लगाना नहीं भूलते हैं। ऐसी मान्यता है कि सामान्य परिस्थितियों में एक बाघ दूसरे बाघ पर हमला नहीं करता है इसलिए मुखौटे वाले बाघ के भ्रम के कारण मछुआरे बच जाते हैं। लेकिन बाघ से डरना यहां की एक वास्तविकता है। ‘‘झींगा’’ मछली पकड़ने निकले मछुआरों से बाघ की भिड़न्त हो जाना यहां एक मामूली बात मानी जाती है। कभी-कभी दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। सुंदरवन के जंगल व इसकी भीतरी नहरों के किनारों पर लगे वृक्षों पर लटकते हुए अनगिनत कपड़े इस बात के गवाह है कि यहां कोई आदमी बाघ का शिकार बन गया था। यहां बाघ का डर इस कदर व्याप्त है कि जंगल में प्रवेश करने से पहले स्थानीय निवासी और मछुआरे जंगल की देवी ‘‘वनबीबी’’ या देवता- ‘‘दक्रिवनराय’’ की पूजा जरूर करते हैं। इन लोगों का मानना है कि पूजा करने से ये वन देवी व देवता बाघ से उनकी रक्षा करते हैं।

सुंदरवन के बाघ की कुछ विशेषताएं भी हैं। जैसे डील-डौल में तगड़ा और दिखने में सुंदर होने के साथ-साथ यह एक कुशल तैराक भी होताा है। वैसे तो बाघ को दूसरे जंगलों में तालाबों या नहरों में तैरता हुए देखा जा सकता है लेकिन विशेषज्ञ बताते हैं कि सुंदरवन का बाघ इस क्षेत्र में भी महारथी है क्योंकि यहां से जनाव दस किलोमीटर तक पानी में तैरते हुए इधर से उधर आराम से चले जाते हैं।

सिर्फ बाघ ही नहीं, बल्कि सुंदरवन दूसरे वन्य प्राणियों से भी आबाद है। इसके विभिन्न द्वीपों पर चीतल, काकड़ और बार्किंग डियर के अनेक झुण्ड विचरते रहते हैं। मधुमक्खी के छत्ते से शहद निकालने में बाघ से होड़ करने वाला जीव-भालू यहां की एक अन्य विशेषता है। शहद के लोभ में भालू यदकदा ऐसे आदमियों पर आक्रमण कर भी बैठते हैं जो उनके प्रिय भोजन पर डाका डालने आते हैं। एक विशेष बात और आपको बता दें कि तैरते हुए नदी से मछलियां पकड़ना और नहर किनारे लगे वृक्षों पर लगे मधुमक्खी के छत्ते पर हाथ साफ कर देना यहां के राॅयल बंगाल टाइगर का भी खास शगल है। जंगली सूअर, गोह और जंगली बिल्लियां जैसे दूसरे जीव भी सुंदरवन की धरती को आबाद किए हुए हैं।

सुंदरवन पक्षियों के मामले में भी खासा समृद्ध है। कई प्रवासी पक्षी यहां यदाकदा अपना डेरा डालते हैं तो कुछ स्थानीय पक्षी ऐसे हैं जो आमतौर पर केवल यहीं पाए जाते हैं। जैसे सफेद समुद्री गरुड़ सुंदरवन की खासियत है। इसी तरह हरा कबूतर अपनी गुटर-गूं से इस वन-प्रांत को हमेशा गुंजायमान रखता है। इसी तरह किंगफिशर, जिसकी यहां 7 प्रजातियां पाई जाती हैं, भी यहां मछली पकड़ने की ताक में हर वक्त दिखाई दे जाता है। बाहर से आने वाले पक्षियों में पेलीकन, प्लोवर और विम्वर्लस ही प्रमुख हैं जो सुंदरवन को कुछ समय के लिए अपना घर बनाते हैं।

जलीय जीव-जन्तुओं की दृष्टि से सुंदरवन में काफी-कुछ देखने लायक है। दरअसल, चारों तरफ पानी ही पानी होने की वजह से यहां की दलदली जमीन ऐसे जीव-जन्तुओं के लिए विशेष आश्रयस्थली बन गई है। जो पानी के ही बाशिंदे हैं। यहां की नहरों में करीब 120 प्रकार की मछलियां पाई जाती हैं। जिनमें से प्रमुख ‘‘प्लैटिनिस्ता गंगैटिक’’ नामक भारतीय डाॅल्फिन। यह अति दुर्लभ डाॅल्फिन सुंदरवन के पश्चिमी इलाके में पानी से अठखेलियां करती देखी जा सकती है। इसी तरह यहां के जल में मगरमच्छों की भी भरमार है। संुदरवन के अंदर भगवतपुर में एक ‘‘मगरमच्छ’’ प्रजनन केंद्र भी बनाया गया है जहां मगरमच्छों की प्रजाति के विकास के लिए प्रयास चलते रहते हैं। शार्क मछली, केकड़े और कछुए यहां के कुछ अन्य जल-जीव हैं जो अपनी विविधता से लोगों को मुग्ध कर देते हैं।


कछुए की कुछ विशिष्ट प्रजातियों को बचाने के लिए यहां कई प्रयास चल रहे हैं। सुंदरवन के भीतर स्थित 140 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले सोजनेखाली वन्य प्राणी विहार में ओलीव नामक प्रजाति के समुद्री कछुए को लुप्त होने से बचाने की कोशिशें की जा रही हैं। इसी तरह रिडली समुद्री कछुआ भी विलुप्तता के कगार पर हैं। इसलिए सुंदरवन में उसके संरक्षण के भी प्रयास किए जा रहे हैं।

 

वनस्पति
डेल्टाई इलाका होने की वजह से यहां जलीय वनस्पतियों की भरमार है। वैसे कुल मिलाकर यहां वृक्षों की 334 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें ‘‘सुंदरी’’ और मंग्रोंव नामक वृक्ष उल्लेखनीय है। ‘‘सुंदरी’’ के सदाबहार जंगल तो अब सुंदरवन के लिए इतिहास की वस्तु बन जाने के कगार पर खड़े हैं किंतु ‘‘मैंग्रोव’’ की छटा यहां के लिए एक वरदान ही है जिसमें जंगल का स्वरूप बच पाने की उम्मीद है। इसके अतिरिक्त इस राष्ट्रीय उद्यान में एक ओर खजूर के जहां-तहां उगे पेड़ अलग ही सौंदर्य की सृष्टि करते हैं तो दूसरी ओर ‘‘जनवा’’ और ‘‘कनेर’’ के फूलदार पेड़ उस खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं। जंगल के बीच दलदली इलाके में खिलने वाली रक्तवर्णी या लाल कमल तो जैसे यहां कोई कविता रचने के लिए आ बसे हैं। सच में, प्राकृतिक सुषमा भी सुंदरवन की एक अनोखी विशेषता है जो बहुत कम राष्ट्रीय उद्यानों को नसीब हुई है।

कैसे पहुंचे
हालांकि सुंदरवन राॅयल बंगाल टाइगर की उपस्थिति से ‘‘विश्व विरासत’’ होने की बदौलत पूरे संसार में विख्यात है लेकिन यहां पहुंचना बहुत आसान नहीं है। दिल्ली से 1547, मुंबई से 2186 और कलकत्ता से 106 किलोमीटर दूर स्थित इस राष्ट्रीय उद्यान का नजदीकी हवाई अड्डा दमदम है।


कलकत्ता से सुंदरवन पहुंचने के रास्ते में कई पड़ाव हैं। इनमें पहला पड़ाव है-पोर्ट केनिंग, जहां तक रेल मार्ग की सुविधा उपलब्ध है। इसके बाद सोनाखाली नामक स्थान तक पहुंचने के लिए सड़क परिवहन का इस्तेमाल किया जाता है। सुंदरवन चूंकि तीन ओर से अथाह जल से घिरा हुआ है अतः सोनाखाली से राष्ट्रीय उद्यान तक का सफर स्टीमर बोट यानी ‘‘फेरी’’ से करना होता है। सोनाखाली से फेरी में सवार होकर गोसाबा तक जाना पड़ता है। गोसाबा में कई नदियां मिलती हैं जिनमें प्रमुख हैं- हुगली, बड़तल्ल, संतमुखी, ठाकुरन विद्या और मातला। गोसाबा से दूसरी फेरी में सवार होकर सोजनेवाली तक पहुंचना होता है जो सुंदरवन का मुख्य पड़ाव है और राॅयल बंगाल टाइगर का असली नजारा यहीं मिलता है।

सुंदरवन जाने का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिसंबर से फरवरी तक माना जाता है क्योंकि इस समय रेत पर धूप सेंकते हुए बंगाल टाइगर के अलावा कई प्रवासी पक्षियों को भी आसानी से देखा जा सकता है। यहां ठहरने के लिए एक टूरिस्ट बंगला सोजनेखाली में है, जहां आवास की उपयुक्त सुविधाएं उपलब्ध है।

 

 

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Title: sundarban national park tourism 2020 tiger reserve wildlife sanctuary in Hindi  | In Category: यात्रा yatra

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